CJI Surya Kant: भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि मानवाधिकारों की रक्षा केवल उल्लंघन की पहचान करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसके लिए जवाबदेही तय करना, प्रभावित लोगों को उचित राहत देना और भविष्य में ऐसे उल्लंघनों को रोकने के लिए जरूरी बदलाव करना भी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग संविधान की ओर से किए गए वादों का एक महत्वपूर्ण संरक्षक है।
सीजेआई सूर्यकांत
सीजेआई आज विज्ञान भवन में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के 33वें स्थापना दिवस समारोह और ‘जल-जीवन का अमृत’ विषय पर आयोजित एक दिवसीय सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे।
33 वर्षों में 24 लाख से अधिक मामले दर्ज
सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि उनके अनुमान के मुताबिक, आयोग ने पिछले 33 वर्षों में 24 लाख से अधिक मामले दर्ज किए हैं और 23 लाख से ज्यादा मामलों का निपटारा किया है। उन्होंने कहा कि आयोग की निपटारा दर 98 प्रतिशत से अधिक रही है। ये आंकड़े केवल संस्थागत कामकाज नहीं दर्शाते, बल्कि उन मामलों को भी सामने लाते हैं जिनमें गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों को सार्वजनिक ध्यान मिला।
संविधान के वादों को जमीन पर उतारना जरूरी
सीजेआई ने कहा कि भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को गरिमा, समानता, स्वतंत्रता और न्याय का वादा करता है। इन मूल्यों का सम्मान हर दिन और हर जगह होना चाहिए, चाहे वह खेत हो, पुलिस हिरासत, अस्पताल का वार्ड या दूर-दराज का गांव।
उन्होंने कहा कि अदालतों तक पहुंचना हर व्यक्ति के लिए आसान नहीं होता। ऐसे में मानवाधिकार आयोग उन लोगों की आवाज बन सकता है, जो अपनी शिकायत लेकर अदालत तक नहीं पहुंच पाते। आयोग उन स्थानों तक पहुंच सकता है जहां अदालतों का पहुंचना कठिन है और शिकायत मिलने का इंतजार किए बिना भी अपने स्तर पर कार्रवाई कर सकता है।
मानवाधिकार आयोग की ताकत उसकी विश्वसनीयता
सीजेआई ने कहा कि कुछ लोग मानते हैं कि मानवाधिकार आयोग केवल सिफारिश कर सकता है, आदेश देकर उन्हें लागू नहीं करा सकता। लेकिन आयोग की भूमिका को दूसरे नजरिए से देखने की जरूरत है। उन्होंने आयोग की तुलना एक ऐसे प्रकाशस्तंभ से की, जो अन्याय के अंधेरे में भटके लोगों को न्याय और जवाबदेही का रास्ता दिखाता है।
उन्होंने कहा कि किसी मानवाधिकार संस्था का प्रभाव उसके आदेशों को जबरन लागू कराने की शक्ति से नहीं, बल्कि समय के साथ अर्जित उसकी विश्वसनीयता से आता है। हर निष्पक्ष जांच, समय पर हस्तक्षेप और ईमानदार रिपोर्ट उसकी नैतिक विश्वसनीयता को मजबूत करती है।
सीजेआई ने हिरासत में उत्पीड़न और मौत, बंधुआ मजदूरी, सिलिकोसिस जैसी औद्योगिक बीमारियों तथा हाशिए पर रहने वाले समुदायों के अधिकारों से जुड़े मामलों में आयोग के हस्तक्षेप का भी उल्लेख किया।
कमजोर और वंचित लोगों तक पहुंचे अधिकार
सीजेआई ने कहा कि मानवाधिकारों की असली कसौटी यह है कि समाज की कतार में सबसे पीछे खड़े व्यक्ति को कितनी गरिमा और सुरक्षा मिल रही है। उन्होंने ऐसे विचाराधीन कैदियों का जिक्र किया, जिन्हें अपने वकील से मिलने का अवसर नहीं मिला; उन प्रवासी मजदूरों का, जिनके पास जरूरी दस्तावेज नहीं हैं; परिवार द्वारा छोड़ दिए गए बुजुर्गों, दिव्यांग व्यक्तियों का और उन महिलाओं का, जिनका योगदान व्यवस्था की नजरों से ओझल रह जाता है।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग व्यापक समस्याओं की पहचान और मानक तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है, जबकि राज्य मानवाधिकार आयोग स्थानीय परिस्थितियों के ज्यादा करीब होते हैं। वे शिकायतकर्ता की भाषा में उसकी बात सुन सकते हैं और उस स्थान तक पहुंच सकते हैं जहां कथित उल्लंघन हुआ है।
अनुच्छेद 21 के दायरे में गरिमापूर्ण जीवन
सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि समय के साथ मानवाधिकारों का अर्थ व्यापक हुआ है। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा की अवधारणा अब गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार तक विकसित हुई है। स्वास्थ्य, भोजन, आवास, आजीविका और स्वच्छ पर्यावरण को इस गरिमा के लिए आवश्यक माना गया है।
उन्होंने कहा कि जीवन के अधिकार में प्रदूषण-मुक्त पानी और हवा का अधिकार भी शामिल है। इसलिए संवैधानिक जिम्मेदारी केवल इस बात तक सीमित नहीं है कि राज्य क्या करने से बचे, बल्कि यह भी है कि लोगों को गरिमा के साथ जीवन जीने के लिए क्या उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
सुरक्षित पेयजल भी मानवाधिकार का अहम हिस्सा
‘जल-जीवन का अमृत’ विषय पर बोलते हुए सीजेआई ने कहा कि पानी केवल जीवन बनाए रखने का साधन नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा, गरिमा और परिवारों के जीवन की परिस्थितियों से भी जुड़ा है। पानी की तलाश में रोजाना घंटों बिताने वाले व्यक्ति का समय शिक्षा, रोजगार या आराम से दूर हो जाता है। सिंचाई के लिए पानी नहीं मिलने पर किसान का भविष्य प्रभावित होता है।
उन्होंने कहा कि केवल घर तक नल पहुंचा देना पर्याप्त नहीं है। यह भी जरूरी है कि पानी सुरक्षित हो, भरोसेमंद तरीके से उपलब्ध हो और जरूरत के समय मिले। आर्सेनिक, फ्लोराइड या अन्य हानिकारक तत्वों से दूषित पानी जीवन और स्वास्थ्य के लिए खतरा है।
सीजेआई ने कहा कि पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करना किसी एक संस्था की जिम्मेदारी नहीं है। सरकार को जलापूर्ति व्यवस्था का निर्माण और रखरखाव करना चाहिए, अदालतों को संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन पर हस्तक्षेप करना चाहिए और मानवाधिकार आयोगों को शिकायतों की जांच कर व्यवस्था में मौजूद खामियों की पहचान करनी चाहिए।
आने वाली पीढ़ियों के प्रति भी जिम्मेदारी
सीजेआई ने कहा कि मानवाधिकारों की जिम्मेदारी केवल वर्तमान पीढ़ी तक सीमित नहीं है। भूजल स्रोतों का खत्म होना, नदियों का प्रदूषित होना और पेयजल के स्रोतों का दूषित होना आने वाली पीढ़ियों पर ऐसा बोझ डालता है, जिसकी जिम्मेदारी उनकी नहीं है।
उन्होंने कहा कि जल के अधिकार को वर्तमान की जरूरत के साथ-साथ भविष्य के प्रति जिम्मेदारी के रूप में भी समझना होगा। मानवाधिकारों की रक्षा का अर्थ यह सुनिश्चित करना है कि आने वाली पीढ़ियां भी गरिमा के साथ जीवन जी सकें।
NHRC के मोबाइल ऐप और डिजिटलीकरण की सराहना
सीजेआई ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के मोबाइल एप्लीकेशन की शुरुआत और रिकॉर्ड के डिजिटलीकरण की दिशा में उठाए गए कदमों की सराहना की। उन्होंने कहा कि इससे नागरिकों को शिकायत दर्ज करने, उसकी प्रगति जानने और जानकारी हासिल करने में आसानी होगी। इससे उन लोगों के लिए आयोग तक पहुंचना आसान हो सकता है, जिन्हें परंपरागत संस्थागत प्रक्रियाओं तक पहुंचने में कठिनाई होती है।
उन्होंने उम्मीद जताई कि आयोग आने वाले वर्षों में न्याय तक अपनी पहुंच बढ़ाएगा और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए अपनी भूमिका को और मजबूत करेगा।
