Gadar History And Story Of The Upcoming Movie: भारत में एक बार फिर गदर की चर्चा है। मामला बालीवुड फिल्म गदर-2 के ट्रेलर का है। जिसने एक बार फिर तारा सिंह और शकीना की कहानी की याद दिला दी है। लेकिन फिल्म का नाम रखने की प्रेरणा जहां से फिल्म मेकर को शायद मिली है, वह कहानी बेहद रोंगटे खड़ी करने वाली है। जिसमें देश भक्ति और जोश का ऐसा संगम था कि अगर वह प्लानिंग सफल हो गई होती तो अंग्रेज भारत को 32 साल पहले ही छोड़ कर (1915) चले गए होते। यह उस दौर की बात है जब साल 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद भारत को आजाद कराने की अमेरिका में सबसे बड़ी प्लानिंग की गई। जिसे इतिहास में 'गदर' आंदोलन के नाम से जाना जाता है।
गदर पार्टी का गठन अमेरिका में किया गया था।
क्या था गदर आंदोलन
गदर का मतलब विद्रोह होता है। भारत को कैसे अंग्रेजों से आजाद कराया जाय, इसको लेकर अमेरिका में प्लानिंग की गई। इसी मकसद से गदर पार्टी का अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में 25 जून 1913 को गठन किया गया। जिसने 'युगान्तर आश्रम' नाम से एक संस्था भी बनाई। जिसका काम विदेशों में रह रहे भारतीयों को एकजुट करना और उन्हें अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह के लिए तैयार करना था। गदर पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष सोहन सिंह भकना थे।
गदर के नेताओं ने इसके लिए दुनिया भर में फैले प्रवासियों भारतीयों को अपने साथ जोड़ा। और उन्हें भारत लौंटने के लिए कहा जिससे कि ब्रिटिश हकुमत के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह किया जा सके। इस मुहिम के लिए जापान, चीन, अफगानिस्तान से भी सपोर्ट लेने की कोशिश की गई। और करीब 8 हजार लोग विद्रोह के लिए भारत लौट रहे थे और उनके पहुंचने की तारीख 1916 तक तय की गई थी। गदर आंदोलन को प्रमुख सोहन सिंह भकना, करतार सिंह सराभा, लाला हरदयाल ने केवल दुनिया में लोकप्रिय बनाया बल्कि भारत में भी जन समर्थन हासिल किया।
21 फरवरी तय की गई विद्रोह का दिन
गदर आंदोलन के नेताओं ने भारत में सेना में विद्रोह की प्लानिंग की थी। जिससे कि एक झटके में अंग्रेज घुटने टेक दे। इसके लिए मेरठ, मियां मीर, फिरोजपुर, लाहौर और दिल्ली,कोहाट, बन्नू और दीनापुर की छावनियों में विद्रोह की प्लानिंग की गई। लेकिन अंग्रेजों को इस प्लानिंग की भनक लग गई और गदर पार्टी के नेताओं के भारत की जमीन पर पहुंचने से पहले ही गिरफ्तार कर लिया गया। और 82 गदर नेताओं के ऊपर मुकदमा चलाया। जिसमें 13 सितम्बर 1915 को 24 गदर नेताओं को मौत की सजा सुनाई गई बाकी नेताओं को उम्र कैद की सजा सुनाई गई। इसके 25 अक्टूबर 1915 को लाहौर कांस्प्रेसी केस चलाया गया। इसमें 7 गदर आंदोलन के साथियों को फांसी की सजा दी गई और45 को उम्र कैद की सजा मली। गदर आंदोलन भले ही सफल नहीं हुआ लेकिन इसने देश भक्ति की जो लौ जलाई उसने भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव जैसे क्रान्तिकारियों को स्वतन्त्रता संग्राम में कूदने के लिए प्रेरित किया।
