Child Birth Rate: दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देश भारत की तस्वीर अब बदलने लगी है। कभी जनसंख्या विस्फोट को लेकर चिंतित रहने वाला देश अब घटती जन्मदर जैसी चुनौतियां का सामना कर रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत की कुल प्रजनन दर घटकर प्रति महिला 1.9 बच्चे पर आ गई है। इसका मतलब है कि औसतन एक महिला अब अपने जीवनकाल में पहले की तुलना में कम बच्चे पैदा कर रही है। यह आंकड़ा आबादी को स्थिर रखने के लिए जरूरी जन्मदर से काफी नीचे है, जो लंबी अवधि में जनसंख्या वृद्धि को बनाए रखने के लिए बेहद अहम है। विशेषज्ञों को अब ऐसी चिंताएं सताने लगी है कि अगर यही रुझान जारी रहा तो आने वाले दशकों में भारत की जनसंख्या पहले अपने चरम पर पहुंचेगी और फिर तेजी से गिरावट आएगी। ऐसे में 'युवा भारत' वृद्ध हो सकता है।
असंतुलित राज्यों की कहानी
भारत की कुल प्रजनन दर घटकर प्रति महिला 1.9 बच्चे पर आ गई है, लेकिन जब हम राज्यों के हिसाब से देखते हैं तो कहानी अपने आपमें पेचीदा हो जाती है। देश के कुछ हिस्से तेजी से कम प्रजनन दर वाले समाज में तब्दील हो रहे हैं, जबकि कई राज्य अभी भी राष्ट्रीय औसत से काफी ऊपर हैं। हालांकि, बिहार को अपवाद के तौर पर देखा जा सकता है। बच्चों के जन्म के पैटर्न बदल रहे हैं, शिशु मृत्यु दर घट रही है, लेकिन नवजातों के लिए पहला सप्ताह अब भी सबसे जोखिम भरा बना हुआ है।
शहरी भारत की सामान्य प्रजनन दर (GFR) 2012-14 के 61.2 से घटकर 2022-24 में 51.0 पर आ गई, लेकिन बिहार इस पैटर्न को तोड़ता नजर आता है। शहरी बिहार में यही दर 75.9 से बढ़कर 77.5 हो गई है। वर्ष 2024 में शहरी बिहार का सामन्य प्रजनन दर 80.3 दर्ज किया गया, जबकि पूरे शहरी भारत का औसत 49.8 रहा।
क्यों घट रही जन्मदर?
विशेषज्ञों का मानना है कि जन्मदर में गिरावट के पीछे महिलाओं में शिक्षा का बढ़ता स्तर, तेजी से होता शहरीकरण, बच्चों की परवरिश में होने वाला खर्च इत्यादि कारण हैं। आजकल के लोग बड़ा परिवार संभालने के बजाय किसी एक बच्चे की शिक्षा और भविष्य पर निवेश करने को प्राथमिकता दे रहे हैं। साथ ही एकल परिवारों के चलने ने संयुक्त परिवारों की जगह ले ली है।
1. महिलाओं में शिक्षा का बढ़ता स्तर
मौजूदा समय में शिक्षित महिलाएं कम बच्चे पैदा करने का निर्णय ले रही हैं।
2. बच्चों की परवरिश का बढ़ता खर्च
आज कल के अभिभावक कम बच्चों पर ज्यादा निवेश करना चाहते हैं। निजी स्कूल, कोचिंग और अन्य सुविधाओं की बढ़ती लागत के कारण कई परिवार दूसरे बच्चे की प्लानिंग तक नहीं कर रहे हैं।
3. संयुक्त परिवारों का टूटना
मौजूदा समय में संयुक्त परिवारों की जगह पर एकल परिवारों का चलन बढ़ा है। साल 2001 तक लगभग आधे भारतीय परिवार संयुक्त परिवारों में रहते थे, लेकिन अब करीब 70 फीसदी परिवार एकल परिवार बन चुके हैं।
4. बेटा-बेटी में भेदभाव घटना
मौजूदा समय में लोगों की सोच बेहतर हुई है, लेकिन इसे भी घटती जन्मदर के लिए जिम्मेदार माना जा रहा है। पहले परिवार तब तक बच्चे पैदा करते थे जब तक बेटा न हो जाए, लेकिन अब परिवार बेटियों को भी समान रूप से स्वीकार करते हैं, जो बढ़िया बात है, लेकिन ज्यादा बच्चे प्लान नहीं कर रहे हैं।
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बूढ़ा होने का बढ़ा खतरा
'द इकोनॉमिस्ट' की एक रिपोर्ट के मुताबिक, विशेषज्ञों को इस बात की चिंता सताने लगी है कि भारत 'अमीर बनने से पहले बूढ़ा' हो सकता है। यदि जन्मदर लगातार घटती रही तो बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ेगी, जबकि कामकाजी उम्र की आबादी का अनुपात कम होता जाएगा।
केरल में करीब 20 फीसदी आबादी 60 साल से अधिक उम्र की हो चुकी है और वहां पर वृद्धावस्था से जुड़ी चुनौतियों से निपटने के लिए विशेष विभाग तक बनाया गया है, लेकिन देश के अधिकांश हिस्सों में बुजुर्गों के लिए पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था नहीं है।
बदल रहे राजनीतिक मुद्दे
राजनीतिक दल भी घटती जन्मदर को लेकर चिंतिंत नजर आ रहे हैं। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू और तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एमके स्टालिन लंबे समय से ज्यादा बच्चे पैदा करने की अपील करते रहे हैं। चंद्रबाबू नायडू ने तो राज्य में घटती जनसंख्या को रोकने के प्रयासों के तहत राज्यवासियों से ज्यादा बच्चे पैदा करने की अपील की। इसके लिए सरकार बकायदा प्रोत्साहन राशि तक देने की बात कही है। आंध्र प्रदेश सरकार तीसरे बच्चे के जन्म पर 30,000 रुपये और चौथे बच्चे के जन्म पर 40,000 रुपये देगी।
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संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि भारत की आबादी 2060 के दशक तक बढ़ती रहेगी और उसके बाद धीरे-धीरे कम होने लगेगी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अगर जन्मदर में गिरावट दर्ज होती है तो उसे फिर से बढ़ाना काफी चुनौतीपूर्ण होता है। आर्थिक प्रोत्साहन और सरकारी योजनाएं भी अक्सर ज्यादा असरदार साबित नहीं होती हैं। ऐसे में आने वाले समय में घटती आबादी, बढ़ती बुजुर्ग जनसंख्या जैसी चुनौतियों का डटकर सामना करने के लिए तैयार करना होगा।