Doordarshan History: बात साल 1959 की है। अभी देश को आजाद हुए करीब 12 साल हुए थे। देश के लोगों और नेतृत्व की आंखों में भविष्य को लेकर बड़े-बड़े सपने थे। लेकिन महाभारत के संजय की तरह दिव्य दृष्टि नहीं थी, जो सैकड़ों किमी दूर से सब-कुछ साफ-साफ देख सके। अब सरकार लोगों को संजय की ही तरह दूर-दर्शन की शक्ति देने का मन बना चुकी थी। जिस तरह संजय ने हस्तिनापुर में बैठे-बैठे ही सैकड़ों किमी दूर कुरुक्षेत्र में चल रहे युद्ध का आंखों देखा हाल धृतराष्ट्र को सुनाया था, सरकार वैसे ही देश के लोगों को देश-दुनिया का हाल सुनाना चाहती थी। अपनी योजनाएं उन तक पहुंचाना चाहती थी। इसके लिए सरकार ने 'दूरदर्शन' को माध्यम बनाया। आधुनिक टेलीविजन के आने से देश के लोगों को सरकार ने कुछ-कुछ संजय जैसा ही अनुभव दिया। इससे पहले किसने सोचा था कि घर में रखा एक डिब्बा दूर-दराज की घटनाओं, खेल, समाचार, मनोरंजन और देश-दुनिया की तस्वीरें लोगों के सामने ले आएगा। इसी बदलाव की शुरुआत 1959 में आज ही के दिन यानी 15 सितंबर को दूरदर्शन के प्रयोग के साथ हुई थी।
15 सितंबर 1959 को शुरू हुआ था दूरदर्शन का इतिहास
1959 में एक छोटे प्रयोग से हुई शुरुआत
15 सितंबर 1959 को दिल्ली में सार्वजनिक सेवा के तौर पर टेलीविजन प्रसारण का प्रयोग शुरू किया गया था। उस शुरुआती दौर में संसाधन सीमित थे। एक अस्थायी स्टूडियो और छोटे ट्रांसमीटर से आवाज और तस्वीरें ही प्रसारित की जाती थीं। उस समय शायद किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि यह छोटा एक्सपेरिमेंट आगे चलकर भारत के सबसे बड़े प्रसारण नेटवर्क में बदल जाएगा। 1965 में दूरदर्शन नियमित सेवा के रूप में सामने आया और दिल्ली व आसपास के घरों तक टेलीविजन सिग्नल पहुंचने लगे। इसके बाद तो इसका विस्तार बहुत ही तेजी से हुआ। 1972 तक मुंबई और अमृतसर तक टीवी सेवा पहुंच गई और 1975 तक सात अन्य शहर भी टीवी नेटवर्क से जुड़ गए।
1976 में ऑल इंडिया रेडियो से अलग हुआ दूरदर्शन
शुरुआत में दूरदर्शन ऑल इंडिया रेडियो यानी AIR का एक छोटा सा हिस्सा था। लेकिन दूरदर्शन की क्षमताएं रेडियो से कहीं ज्यादा थीं। इसी को समझते हुए 1 अप्रैल 1976 को इसके लिए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के तहत अलग विभाग बनाया गया। रेडियो से अलग होने के बाद टेलीविजन नेटवर्क के विस्तार और कार्यक्रम निर्माण को नई रफ्तार मिल गई। बाद के दिनों में दूरदर्शन, प्रसार भारती के दो प्रमुख अंगों में शामिल हुआ।
1982 में आया बड़ा बदलाव
दूरदर्शन के इतिहास में साल 1982 बहुत ही अहम रहा। इसी साल दूरदर्शन पर रंगीन प्रसारण और सैटेलाइट के जरिए राष्ट्रीय नेटवर्किंग की शुरुआत भी हुई। 15 अगस्त 1982 को नेशनल प्रोग्राम और कलर टेलीविजन प्रसारण का संचालन हुआ। उसी साल एशियाई खेलों के कवरेज ने दूरदर्शन को देश के बड़े हिस्से तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई। देश के लोगों ने पहली बार टीवी के माध्यम से एशियाई खेलों का लुत्फ लिया।
अब दूरदर्शन सिर्फ न्यूज दिखाने वाला जरिया मात्र नहीं रह गया था। कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति, विज्ञान, मनोरंजन और खेल से जुड़े कार्यक्रमों ने इसे आम भारतीय परिवारों का हिस्सा बना दिया। अलग-अलग राज्यों में क्षेत्रीय केंद्रों और क्षेत्रीय भाषाओं में कार्यक्रमों का विस्तार होने लगा। इसका उद्देश्य सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक विकास को बढ़ावा देना भी था।
दूरदर्शन ने घर-घर तक पहुंच बनाई
'कृषि दर्शन' से रामायण-महाभारत तक
दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों ने अलग-अलग पीढ़ियों पर अपनी गहरी छाप छोड़ी। किसानों के लिए कृषि आधारित कार्यक्रम, बच्चों और युवाओं के लिए शैक्षणिक सामग्री, न्यूज बुलेटिन, म्यूजिक, कल्चर और एंटरटेनमेंट के कार्यक्रम इसके प्रमुख हिस्से बने। बाद के दौर में रामायण (Ramayan) और महाभारत (Mahabharat) जैसे धार्मिक धारावाहिकों ने रविवार की सुबह को भारतीय परिवारों के लिए खास बना दिया।
दूरदर्शन की खासियत यह थी कि उसने महानगरों से लेकर दूरदराज के इलाकों तक भारत की विविधता को एक छोटी सी स्क्रीन पर जगह दी। क्षेत्रीय भाषाओं में प्रसारण ने स्थानीय संस्कृति और परंपराओं को भी राष्ट्रीय मंच दिया। आज भी प्रसार भारती के नेटवर्क में देशभर में दर्जनों दूरदर्शन केंद्र और स्टूडियो मौजूद हैं।
संजय की 'दूरदृष्टि' से डिजिटल दौर तक
महाभारत के संजय के पास दिव्य दृष्टि थी, जिससे वह दूर बैठे युद्ध को देख सकते थे। दूरदर्शन ने तकनीक के जरिए आम भारतीय को ऐसी ही 'दूरदृष्टि' का आधुनिक अनुभव दिया। फर्क सिर्फ इतना था कि संजय की दृष्टि अलौकिक थी और दूरदर्शन की ताकत विज्ञान और संचार तकनीक से आई।
आज मोबाइल, इंटरनेट और ओटीटी के दौर में सूचना पाना कुछ सेकंड का काम है। इसके बावजूद भारतीय टेलीविजन के इतिहास में दूरदर्शन का स्थान अलग है। 15 सितंबर 1959 का वह छोटा प्रयोग न सिर्फ एक टेलीविजन सेवा की शुरुआत था, बल्कि उस दौर के भारत के लिए दुनिया को घर तक लाने वाली एक बड़ी तकनीकी और सामाजिक क्रांति की शुरुआत भी था।
