BJP win in Bengal: लोकतंत्र में किसी पार्टी का चुनाव लड़ना, चुनाव जीतना, किसी पार्टी का बाहर होना और नई सरकार का बनना सामान्य बात है। यह चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा है। बंगाल में भी यही हुआ है। यहां भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने तृणमूल कांग्रेस के 15 साल के शासन का अंत करते हुए उसे सत्ता से बाहर किया है लेकिन इसमें अनोखी बात या नया क्या है। भाजपा के लिए इस जीत के मायने क्या हैं। क्या यह एक राज्य में सामान्य जीत और हार भर है। तो नहीं बंगाल में मिली यह जीत भाजपा के लिए बहुत बड़ी है। इस चुनाव में भाजपा की जीत से राष्ट्रीय सुरक्षा मजबूत हुई है। बंगाल की सीमा बांग्लादेश से लगती है। ममता के शासन के दौरान यहां से जो घुसपैठ हो रही थी, उस पर अब बहुत हद तक रोक लगेगी।
जनसंघ से निकली भाजपा
दूसरा, भाजपा के लिए इस जीत के राजनीतिक मायने बहुत ज्यादा हैं। भाजपा, जनसंघ से निकली हुई पार्टी है। वही जनसंघ जिसकी स्थापना डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने साल 1951 में की। वह बंगाल से थे। राष्ट्रीय सांस्कृतिक एवं हिंदू राष्ट्रवादी चेतना जिसे बंकिम चंद्र चटर्जी ने अपने 'वंदे मातरम' गीत से आगे बढ़ाया और जो भावना भाजपा के वैचारिक विस्तार का आधार बनी। वह भी बंगाल से थे। इस तरह से देखें तो बंगाल से भाजपा का नाता बहुत पुराना है। भाजपा लंबे समय से उस राज्य में जीत हासिल करना चाहती थी जो एक तरह से उसका वैचारिक उत्स था। लेकिन 1953 में मुखर्जी के निधन के बाद वह राज्य में कमजोर हो गई। दरअसल, मुखर्जी के बाद बंगाल में उनके जैसे कद्दावर एवं मजबूत नेता का उभार नहीं हो पाया। मुखर्जी के बाद हिंदू राष्ट्रवादी चेतना बंगाल में कमजोर पड़ती गई। बाद में कांग्रेस और लेफ्ट की सरकारों ने हिंदूवादी राष्ट्रीय विचारधारा को लगातार हाशिए पर रखा और कमजोर किया।
mamata Banerjee
कांग्रेस, लेफ्ट के शासन में सनातन हुआ उपेक्षित
कांग्रेस के 30 साल और लेफ्ट के 34 साल के शासन के दौरान बंगाल में हिंदू और हिंदुत्व दोनों को उपेक्षित रखा गया। 2011 में ममता बनर्जी जब सत्ता में आईं तो वह लेफ्ट से भी चार कदम आगे निकल गईं। हर साल हिंदू पर्व-त्योहारों के समय सांप्रदायिक तनाव और हिंदू धार्मिक जुलूस पर पथराव हुए। सत्ता में बने रहने के लिए ममता ने मुस्लिम तुष्टिकरण की पराकाष्ठा कर दी। उसने बंगाल की डेमोग्राफी बदलने की कोशिश करते हुए बांग्लादेशी घुसपैठियों को संरक्षण दिया। ममता हिंदुओं को दुत्कारने और मुस्लिमों को पुचकारने की नीति पर चलने लगीं। इस अपमान और उपेक्षा को हिंदू अपने अंदर समेटता रहा। और जब मौका मिला तो उसने अपना जनादेश सुना दिया।
mamata vs suvendu
मुस्लिम वोट बैंक जीत की गारंटी नहीं
इतिहास गवाह है हिंदू तुरंत प्रतिक्रिया नहीं देता। वह धीरे-धीरे जागता है। वह तब जागता है जब उसे लगता है कि उसका अस्तित्व खतरे में है। वह बर्दाश्त करने की सीमा तक सहता है, अत्याचार, अपमान को जज्ब करता है लेकिन यह सीमा जब खतरे के स्तर पर जब पहुंच जाती है तो वह जवाब देता है। बंगाल में यही हुआ था। कांग्रेस और लेफ्ट के शासन में हिंदू और सनातन दोनों को दबाया गया। उसे उसका स्वाभाविक हक एवं अधिकार से वंचित रखा गया। अब बंगाल में भाजपा का आना सनातन एवं हिंदू राष्ट्रवादी चेतना की घर वापसी होने जैसा है। यही नहीं, भाजपा ने इस चुनाव में विपक्ष के मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति और उसके मिथक को भी तोड़ा है। अब 30 से 35 प्रतिशत मुस्लिम वोट बैंक जीत की गारंटी नहीं रह गया है। बंगाल और असम में भाजपा ने इसे कर के दिखाया है।
