World Ovarian Cancer Day: ओवेरियन कैंसर को अक्सर 'साइलेंट कैंसर' कहा जाता है, क्योंकि इसके शुरुआती संकेत इतने सामान्य और हल्के होते हैं कि महिलाएं उन्हें आम पेट की परेशानी समझकर नजरअंदाज कर देती हैं। यही वजह है कि कई मामलों में इस बीमारी का पता तब चलता है, जब कैंसर (ovarian cancer) काफी आगे बढ़ चुका होता है। डॉक्टरों का कहना है कि जागरूकता और समय पर जांच ही इस बीमारी से बचाव का सबसे बड़ा हथियार है।
ओवेरियन कैंसर डे 2026: जानें क्यों से शुरुआत में पकड़ में नहीं आता
सामान्य से दिखने वाले लक्षण बन जाते हैं खतरे की घंटी
सीके बिड़ला हॉस्पिटल, दिल्ली में कंसल्टेंट गायनेकोलॉजिक ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. परमिंदर कौर कहती हैं कि ओवेरियन कैंसर के लक्षण किसी एक बीमारी की तरह साफ-साफ दिखाई नहीं देते। लगातार पेट फूलना, पेट में भारीपन या दर्द, थोड़ी मात्रा में खाना खाने के बाद पेट भर जाना, भूख कम लगना, कब्ज, बार-बार पेशाब आना या पेल्विक एरिया में दर्द जैसे संकेत अक्सर महिलाओं को महसूस होते हैं। लेकिन ये लक्षण गैस, एसिडिटी, अपच या इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोम जैसी सामान्य समस्याओं से भी जुड़े हो सकते हैं। यही कारण है कि महिलाएं इन्हें गंभीरता से नहीं लेतीं।
कई बार पेट की बीमारी समझ लिया जाता है कैंसर
ओवेरियन कैंसर की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि इसके लक्षण पाचन संबंधी परेशानियों जैसे लगते हैं। कई महिलाएं शुरुआत में गायनेकोलॉजिस्ट की जगह गैस्ट्रोएंट्रोलॉजिस्ट के पास पहुंचती हैं। जांच के दौरान अल्ट्रासाउंड या स्कैन में ओवरी में गांठ का पता चलता है। डॉ. परमिंदर कौर के मुताबिक, दुखद बात यह है कि तब तक बीमारी अक्सर एडवांस स्टेज में पहुंच चुकी होती है। आंकड़ों के मुताबिक, करीब 70 प्रतिशत मामलों में ओवेरियन कैंसर स्टेज-3 या स्टेज-4 में डायग्नोज होता है।
स्क्रीनिंग टेस्ट की कमी भी बड़ी वजह
ब्रेस्ट कैंसर की तरह ओवेरियन कैंसर के लिए अभी तक कोई भरोसेमंद रूटीन स्क्रीनिंग टेस्ट उपलब्ध नहीं है, जिससे सामान्य महिलाओं में शुरुआती अवस्था में इस बीमारी का पता लगाया जा सके। यही वजह है कि डॉक्टर महिलाओं को अपने शरीर में होने वाले लगातार बदलावों को नजरअंदाज न करने की सलाह देते हैं। अगर पेट फूलने, मल त्याग की आदत बदलने, लगातार दर्द या पेट में भारीपन जैसी समस्याएं दो हफ्ते से ज्यादा बनी रहें, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी हो जाता है।
पारिवारिक इतिहास बढ़ा सकता है जोखिम
डॉ. परमिंदर कौर का कहना है कि ओवेरियन कैंसर का खतरा केवल उम्र या लाइफस्टाइल से ही नहीं जुड़ा होता, बल्कि परिवार का मेडिकल इतिहास भी इसमें अहम भूमिका निभाता है। जिन महिलाओं के परिवार में ब्रेस्ट या ओवेरियन कैंसर के मामले रहे हों, उनमें BRCA जीन म्यूटेशन होने की संभावना ज्यादा होती है। यह म्यूटेशन दोनों तरह के कैंसर का खतरा बढ़ा सकता है।
ऐसे मामलों में डॉक्टर जेनेटिक टेस्ट और काउंसलिंग की सलाह देते हैं। अगर किसी महिला में BRCA म्यूटेशन पाया जाता है, तो परिवार की अन्य महिलाओं को भी जांच कराने की सलाह दी जाती है, ताकि समय रहते जोखिम को समझा जा सके।
हाई रिस्क महिलाओं के लिए क्या हैं विकल्प
डॉक्टरों के अनुसार, जिन महिलाओं में BRCA म्यूटेशन पॉजिटिव आता है, उनके लिए नियमित निगरानी और भविष्य में जोखिम कम करने वाली रणनीतियों पर चर्चा की जाती है। क्योंकि ओवेरियन कैंसर की कोई भरोसेमंद स्क्रीनिंग उपलब्ध नहीं है, इसलिए हाई रिस्क महिलाओं को फैमिली प्लानिंग पूरी होने के बाद 35 से 40 वर्ष की उम्र के बीच ओवरी और फैलोपियन ट्यूब हटाने की प्रिवेंटिव सर्जरी की सलाह दी जा सकती है। इससे ओवेरियन कैंसर का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है।
जागरूकता ही सबसे बड़ा बचाव
डॉ. परमिंदर कौर कहती हैं कि ओवेरियन कैंसर भले ही साइलेंट कैंसर कहलाता हो, लेकिन शरीर लगातार कुछ संकेत जरूर देता है। जरूरत इस बात की है कि महिलाएं अपने शरीर की छोटी-छोटी परेशानियों को भी समझें और लंबे समय तक बने रहने वाले लक्षणों को हल्के में न लें। समय पर जांच और सही इलाज न सिर्फ बीमारी को शुरुआती चरण में पकड़ सकता है, बल्कि बेहतर रिकवरी की संभावना भी बढ़ा सकता है।
