आजकल फिटनेस का भूत ऐसा सवार हुआ है कि हम हर छोटी-बड़ी चीज की गिनती करने लगे हैं। दिनभर में कितने कदम चले, कितनी कैलोरी खाई, कितना प्रोटीन लिया, हर बात का हिसाब रखा जाता है। पर क्या सच में सेहतमंद रहने का यही अकेला तरीका है?
क्या सेहतमंद रहने के लिए जरूरी है तकलीफ से गुजरना? (Photo: Rujuta Diwekar fb)
सेलिब्रिटी न्यूट्रिशनिस्ट रुजुता दिवेकर कहती हैं कि वजन कम कराने वाली कंपनियों ने हमारे दिमाग में यह बात बैठा दी है कि जब तक डाइट में तकलीफ न हो, तब तक वो सही डाइट नहीं है। जबकि सच्चाई यह है कि हमारे घर का पुराना पारंपरिक खाना बिना किसी गिनती के भी शरीर को पूरा पोषण देता आया है। तंदुरुस्त रहने के लिए खुद को भूखा मारना या हर वक्त तनाव लेना बिल्कुल जरूरी नहीं है।
बकौल रुजुता दिवेकर, भारत के हर कोने में खाने की अपनी एक पुरानी और बेहतरीन परंपरा रही है। जैसे बंगाल में चावल के साथ सही मात्रा में दाल, सब्जी और मछली खाई जाती है। यह पीढ़ियों से चला आ रहा आजमाया हुआ तरीका है। इस तरह मिलाकर खाने से शरीर को सही पोषण मिलता है, खाना आसानी से पचता है और पेट भी दुरुस्त रहता है।
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रुजुता दिवेकर का कहना है कि हमारी रोज की थाली सिर्फ पेट भरने का जरिया नहीं है, उसमें सेहत का पूरा संतुलन छिपा है। इसलिए हमें ऐसे डाइट एक्सपर्ट्स की जरूरत है जो विदेशी डाइट प्लान थोपने के बजाय यह समझें कि हमारे घरों में पारंपरिक रूप से क्या खाया जाता है और उसी हिसाब से हमें सलाह दें।
आज की भागदौड़ और बदलती जिंदगी में ऐसा खान-पान चाहिए जो हम जिंदगीभर अपना सकें। सिर्फ किसी शादी, पार्टी या कुछ हफ्तों में वजन घटाने वाली डाइट काम नहीं आती।
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इसके अलावा, अपनों के साथ बैठकर खाना खाने और खुशियां बांटने से आपसी रिश्ते भी मजबूत होते हैं। अच्छी सेहत सिर्फ कैलरी के जोड़-घटाव का नाम नहीं है, इसमें हमारा परिवार, संस्कृति और प्यार से खाने की आदत भी जुड़ी है। इसलिए आगे बढ़ने के साथ-साथ अपनी थाली की पुरानी और सही समझ की तरफ लौटना ही असली सेहत का राज है।
