- रूस के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने की कोशिश में चीन।
- किम जोंग उन को 'पुराने दोस्त' की अहमियत याद दिलाएंगे शी जिनपिंग।
- परमाणु तनाव के बीच दुनिया को शक्ति प्रदर्शन का संदेश।
Xi Jinping North Korea Visit: चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग उत्तर कोरिया जाने वाले हैं। 8 से 9 जून तक चीनी राष्ट्रपति, तानाशाह किम जोंग उन (Kim Jong Un) के मेहमान होंगे। शी जिनपिंग की इस साल की यह पहली विदेश यात्रा है। दोनों देश 14,000 किलोमीटर लंबी सीमा शेयर करते हैं। दोनों देश एक खास रक्षा समझौते से भी बंधे हैं। समझौते के मुताबिक, यह समझौता किसी भी देश पर हमले की स्थिति में पारस्परिक समर्थन की गारंटी देता है। इस वर्ष उस संधि की 65वीं वर्षगांठ है।
वहीं, उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया के बीच बढ़ती शत्रुता के बीच चीन एक मध्यस्थ देश की भूमिका निभाते नजर आ रहा है। हाल ही में शी जिनपिंग ने दोनों देशों से धैर्य बनाने की अपील की थी। चीन ने कई बार कहा है कि कोरियाई प्रायद्वीप के परमाणु निरस्त्रीकरण की आवश्यकता है। हालांकि, उत्तर कोरिया ने दो टूक कहा है कि वो अपनी परमाणु महत्वाकांक्षाओं से पीछे नहीं हटेगा।
शी जिनपिंग और किम जोंग उन की फाइल फोटो। AP
हालांकि, सवाल है कि आखिर शी जिनपिंग उत्तर कोरिया जा क्यों रहे हैं? अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में चीनी राष्ट्रपति के इस दौरे की कई वजहें बताई गई है।
दरअसल, शी जिनपिंग इस दौरे के जरिए उत्तर कोरिया पर अपना पुराना दबदबा फिर से कायम करना चाहता है। दरअसल, यूक्रेन युद्ध के बाद से उत्तर कोरियाई तानाशाह किम जोंग उन का झुकाव तेजी से रूस की तरफ बढ़ा है। उत्तर कोरिया ने रूस को न सिर्फ भारी मात्रा में हथियार दिए हैं, बल्कि यूक्रेन के खिलाफ लड़ने के लिए अपने सैनिक भी भेजे हैं। बदले में रूस उसे कैश, तेल और एडवांस मिसाइल टेक्नोलॉजी दे रहा है।
क्या है चीन की चिंता?
चीन को डर है कि अगर उत्तर कोरिया पूरी तरह रूस के पाले में चला गया, तो इस क्षेत्र (पूर्वोत्तर एशिया) में बीजिंग की चौधराहट कमजोर हो जाएगी। इसलिए शी जिनपिंग खुद प्योंगयांग जाकर किम जोंग उन को यह याद दिलाना चाहते हैं कि उनका असली 'गॉडफादर' कौन है।
8 और 9 जून को उत्तर कोरिया के दौरे पर रहेंगे चीनी राष्ट्रपति। AP
उत्तर कोरिया का 'सुरक्षा कवच' बन चुका चीन
चीन और उत्तर कोरिया (North Korea) के बीच के रिश्ते केवल दो पड़ोसी देशों के सामान्य रिश्ते नहीं हैं, बल्कि यह एक बेहद गहरी भू-राजनीतिक और रणनीतिक मजबूरी है। हाल ही में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के उत्तर कोरिया दौरे की खबरों के बीच यह सवाल और बड़ा हो गया है।
चीन के लिए उत्तर कोरिया की सबसे बड़ी अहमियत एक 'सुरक्षा कवच' या 'बफर जोन' के रूप में है। उत्तर कोरिया की सीमा सीधे चीन से मिलती है, जबकि उत्तर कोरिया के ठीक नीचे स्थित दक्षिण कोरिया में अमेरिकी सेना (लगभग 28,500 सैनिक) और उनके आधुनिक हथियार तैनात हैं।
तानाशाह किम को क्यों पसंद करता है चीन?
दरअसल, चीन कभी नहीं चाहता कि किम जोंग उन की सरकार गिरे और पूरे कोरियाई प्रायद्वीप पर अमेरिका के समर्थक (दक्षिण कोरिया) का कब्जा हो जाए। अगर ऐसा होता है, तो अमेरिकी सेना सीधे चीन की सीमा पर आकर खड़ी हो जाएगी। इसलिए, चीन अपनी सुरक्षा के लिए उत्तर कोरिया को एक दीवार की तरह इस्तेमाल करता है। हाल के दिनों में यूक्रेन युद्ध के बाद से उत्तर कोरिया और रूस के बीच सैन्य संबंध बेहद मजबूत हुए हैं। उत्तर कोरिया ने रूस को सैनिक और हथियार भेजे हैं, जिसके बदले में पुतिन उसे कैश और एडवांस मिसाइल टेक्नोलॉजी दे रहे हैं।
चीन अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उत्तर कोरिया के इस आक्रामक रवैये का इस्तेमाल एक 'सौदेबाजी के हथियार' के रूप में करता है। जब भी अमेरिका चीन पर दबाव बनाने की कोशिश करता है, चीन उत्तर कोरिया के मुद्दे को आगे बढ़ा देता है। अमेरिका अच्छी तरह जानता है कि केवल चीन ही एकमात्र ऐसा देश है जो किम जोंग उन को नियंत्रित या शांत कर सकता है।
किम जोंग उन का 'जूनियर पार्टनर' बनने से इनकार
इस कूटनीतिक शतरंज में किम जोंग उन भी बहुत चालाकी से खेल रहे हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि किम जोंग उन अब चीन के सामने एक 'जूनियर पार्टनर' या 'आश्रित देश' की तरह व्यवहार नहीं करना चाहते। वे रूस के साथ अपनी नई दोस्ती का इस्तेमाल चीन पर दबाव बनाने और आर्थिक रियायतें (जैसे मुफ्त अनाज, ईंधन और व्यापारिक छूट) हासिल करने के लिए एक 'लीवरेज' (हथियार) के रूप में कर रहे हैं।
उत्तर कोरिया को रूस के पाले में जाने से रोकना है चीन का उद्देश्य: एक्सपर्ट
क्या है टाइमिंग का खेल?
दिलचस्प बात है कि इस दौरे के एलान से ठीक एक दिन पहले उत्तर कोरिया ने एक नई सीक्रेट यूरेनियम संवर्धन फैक्ट्री (परमाणु बम का ईंधन बनाने वाला प्लांट) को दुनिया के सामने पेश किया और किम जोंग उन ने देश के परमाणु हथियारों को तेजी से बढ़ाने का आदेश दिया।
न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक, इस कदम की टाइमिंग बेहद खास है। किम जोंग उन शी जिनपिंग के सामने खुद को एक मजबूत 'परमाणु संपन्न देश' के रूप में दिखाना चाहते हैं, ताकि भविष्य में जब अमेरिका के साथ प्रतिबंध हटाने या हथियारों की कटौती को लेकर कोई बातचीत हो, तो उत्तर कोरिया बराबरी के स्तर पर सौदा कर सके।
उत्तर कोरिया के साथ संबंध को और मजबूत बनाना चाहता है चीन। AP
बताते चलें कि यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब पिछले ही महीने (मई में) शी जिनपिंग ने बीजिंग में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मेजबानी की थी। इन दोनों कद्दावर नेताओं से मिलने के तुरंत बाद उत्तर कोरिया जाना यह दिखाता है कि शी जिनपिंग दुनिया को यह संदेश देना चाहते हैं कि वैश्विक कूटनीति का असली केंद्र (Center) बीजिंग ही है, और चीन ही एकमात्र ऐसी ताकत है जो हर गुट से सीधे बात कर सकती है।
