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लोकसभा में ज्यादा वोट पाकर भी क्यों फेल हो गया महिला आरक्षण बिल? 10 पॉइंट्स में समझें पूरी कहानी

Women Reservation Bill: महिला आरक्षण बिल 2026 लोकसभा में पर्याप्त समर्थन मिलने के बावजूद पास नहीं हो सका, क्योंकि यह एक संविधान संशोधन था और इसके लिए दो-तिहाई यानी विशेष बहुमत जरूरी था। बिल को 298 वोट मिले, जबकि पास होने के लिए 352 वोट चाहिए थे। यह पिछले 12 वर्षों में नरेंद्र मोदी सरकार का पहला ऐसा संविधान संशोधन बिल है जो सदन में गिर गया। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि आखिर ये बिल लोकसभा में पारित क्यों नहीं हो पाया।

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लोकसभा में पास नहीं हो पाया महिला आरक्षण बिल। AI IMAGE
Authored by: Piyush Kumar
Updated Apr 18, 2026, 07:56 IST

Women Reservation Bill: "मैं सभी सांसदों से यही कहूंगा कि आप अपने घर में मां-बहन-बेटी-पत्नी सभी का स्मरण करते हुए अपनी अंतरात्मा को सुनिए। ये संशोधन सर्वसम्मति से पारित होगा, तो देश की नारीशक्ति और सशक्त होगी। देश का लोकतंत्र और सशक्त होगा।" 131वां संविधान संशोधन बिल 2026 यानी महिला आरक्षण पर मुहर नहीं सका।

पिछले 12 सालों में यह पहला मौका है जब मोदी सरकार का कोई संविधान संशोधन बिल सदन में गिरा है। देश की आधी आबादी को उनका राजनीतिक हक दिलाने के लिए शुक्रवार शाम लोकसभा में वोटिंग हुई। सरकार ने इस बिल को पारित कराने के लिए हर मुमकिन कोशिश की, लेकिन यह बिल पारित कराने के लिए जरूरी आंकड़ा, 352 से 54 वोट पीछे रह गई। कुल मौजूद सदस्य 352 में बिल के खिलाफ 230 वोट पड़े और कहानी यहीं पर समाप्त हो गई।

आखिर यह बिल पास क्यों नहीं सका?

चलिए पहले संवैधानिक और संसदीय नियमों को समझते हैं। दरअसल, यह बिल एक संविधान संशोधन से जुड़ा था और ऐसे किसी भी संशोधन को पास करने के लिए साधारण बहुमत नहीं बल्कि विशेष बहुमत की जरूरत होती है। विशेष बहुमत का मतलब है कि सदन में मौजूद और वोटिंग करने वाले कुल सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई सांसदों का समर्थन जरूरी होता है।

इस मामले में कुल 528 सांसदों ने मतदान किया था, जिसके हिसाब से बिल को पास होने के लिए 352 वोट चाहिए थे, लेकिन इसे केवल 298 वोट ही मिल सके। इसी कारण यह आवश्यक आंकड़ा हासिल नहीं कर पाया और बिल गिर गया।

लोकसभा की फाइल फोटो।

लोकसभा की फाइल फोटो।

विपक्ष क्यों है नाराज?

इस पूरे मामले में एक और बड़ा मुद्दा परिसीमन यानी डिलीमिटेशन को लेकर भी सामने आया। सरकार चाहती थी कि लोकसभा की सीटों का पुनर्निर्धारण करके महिला आरक्षण को लागू किया जाए, जबकि विपक्ष ने इसका विरोध किया। विपक्ष का तर्क था कि परिसीमन के जरिए कुछ राज्यों को फायदा और कुछ को नुकसान हो सकता है, इसलिए इसे तुरंत लागू करना उचित नहीं होगा। इसी मुद्दे पर विपक्ष एकजुट हो गया और बिल को पर्याप्त समर्थन नहीं मिल सका।

गौरतलब है कि इससे पहले 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम पास किया गया था, जिसमें महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान है, लेकिन इसे लागू करने के लिए जनगणना और परिसीमन की शर्त रखी गई थी। नया बिल इसी प्रक्रिया को तेजी से लागू करने के उद्देश्य से लाया गया था, लेकिन संसद में जरूरी समर्थन नहीं मिलने के कारण यह सफल नहीं हो पाया।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी की फोटो।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी की फोटो।

दक्षिण भारतीय राज्यों में प्रतिनिधित्व घटने का डर

दक्षिण भारत के राज्यों को नए परिसीमन और लोकसभा सीटों की संख्या 850 तक बढ़ने के प्रस्ताव से अपनी राजनीतिक ताकत घटने का डर सता रहा है। जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले इन राज्यों का मानना है कि उत्तर भारत में सीटें बढ़ने से केंद्र में उनका प्रभाव कम हो जाएगा। इसी क्षेत्रीय असंतुलन की आशंका ने विपक्षी दलों को इस मुद्दे पर एकजुट होने के लिए प्रेरित किया।

सीएम सिद्धारमैया, एम के स्टालिन और रेवंत रेड्डी की फाइल फोटो।

सीएम सिद्धारमैया, एम के स्टालिन और रेवंत रेड्डी की फाइल फोटो।

क्या वाकई दक्षिण भारत को होता नुकसान?

दरअसल, अमित शाह ने लोकसभा में अपने संबोधन के दौरान दक्षिण के राज्यों की चिंता दूर करते हुए निम्न बातें कहीं -

  • कर्नाटक के पास वर्तमान में 28 लोकसभा सीटें हैं, जो कुल 543 का 5.15% है। विधेयक के बाद सीटें बढ़कर 42 होंगी और हिस्सा 5.44% हो जाएगा। इससे साफ है कि राज्य को कोई नुकसान नहीं होगा।
  • आंध्र प्रदेश की 25 सीटें अभी 4.60 फीसद हिस्सेदारी देती हैं। विधेयक लागू होने के बाद सीटें 38 हो जाएंगी और प्रतिशत 4.65% तक बढ़ेगा। यानी राज्य की हिस्सेदारी में हल्की बढ़ोतरी ही देखने को मिलेगी।
  • तेलंगाना की मौजूदा 17 सीटें 3.13% प्रतिनिधित्व देती हैं। नई व्यवस्था में सीटें बढ़कर 26 हो जाएंगी और प्रतिशत 3.18% होगा। इससे स्पष्ट है कि राज्य का प्रतिनिधित्व घटने के बजाय थोड़ा बढ़ेगा।
  • तमिलनाडु के पास अभी 49 सीटें (7.18%) हैं। प्रस्तावित बदलाव के बाद यह 59 सीटें और 7.23% हिस्सेदारी हो जाएगी। इससे यह साफ है कि राज्य को किसी भी तरह का नुकसान नहीं होगा।
  • केरल की 20 सीटें अभी 3.68 फीसद हिस्सेदारी देती हैं। विधेयक के बाद सीटें 30 हो जाएंगी, जबकि प्रतिशत 3.67% रहेगा। यानी प्रतिनिधित्व लगभग स्थिर रहेगा और कोई बड़ा नुकसान नहीं होगा।

विपक्ष का मजबूत और एकजुट फ्लोर कोऑर्डिनेशन

पिछले 12 वर्षों में पहली बार विपक्ष इतना संगठित और रणनीतिक नजर आया। मल्लिकार्जुन खरगे, अखिलेश यादव और ममता बनर्जी जैसे नेताओं के बीच बेहतर तालमेल देखने को मिला। विपक्ष ने एकजुट होकर परिसीमन को “चुनावी नक्शा बदलने की साजिश” करार दिया और वोटिंग के दौरान सरकार को कड़ी चुनौती दी।

सरकार की नंबर गेम पर अति-आत्मविश्वास?

सरकार को भरोसा था कि वह छोटे दलों और निर्दलीय सांसदों का समर्थन जुटाकर जरूरी संख्या हासिल कर लेगी। लेकिन अंतिम समय में समाजवादी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस जैसे दलों के सख्त रुख ने समीकरण बिगाड़ दिए। भाजपा के रणनीतिकार आवश्यक आंकड़ा जुटाने में नाकाम रहे और गृह मंत्री की अपीलों का भी विपक्षी एकता पर खास असर नहीं पड़ा, जिससे बिल पारित नहीं हो सका।

परिसीमन और सीट बढ़ाने पर सरकार की रणनीति क्या थी?

सरकार इस प्रस्ताव के जरिए लोकसभा की कुल सीटों को 543 से बढ़ाकर करीब 850 करने की तैयारी में थी। केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू के अनुसार, यह कदम 2029 के आम चुनावों से पहले महिला आरक्षण को प्रभावी तरीके से लागू करने के लिए जरूरी माना जा रहा था।

महिला आरक्षण लागू करने के पीछे क्या तर्क था?

सरकार का कहना था कि मौजूदा सीटों के ढांचे में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण लागू करना व्यावहारिक रूप से कठिन होगा। इसलिए पहले सीटों की संख्या बढ़ाना जरूरी है, ताकि सभी वर्गों के प्रतिनिधित्व को संतुलित रखते हुए महिलाओं को आरक्षण दिया जा सके। इसी उद्देश्य से तीन परस्पर जुड़े विधेयक तैयार किए गए थे।

बिल गिरने के बाद क्या हुआ?

चूंकि मुख्य संविधान संशोधन बिल ही संसद में पास नहीं हो पाया, इसलिए उससे जुड़े बाकी दो विधेयकों को भी सरकार ने वापस लेने का फैसला किया। सरकार का दावा था कि सीटों का विस्तार सभी वर्गों को बेहतर प्रतिनिधित्व देने के लिए किया जा रहा था, लेकिन विपक्ष ने इसे राजनीतिक रूप से प्रेरित कदम मानते हुए इसका विरोध किया।

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