Marco Rubio India Visit: अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो भारत की यात्रा पर आ रहे हैं। इस साल उनका यह दूसरा भारत दौरा है। इससे पहले वह मई में भारत आए थे। मई का उनका यह दौरा 23 से 26 मई तक था। इस दौरान वह कोलकाता, आगरा, जयपुर होते हुए अंत में दिल्ली आए और क्वाड के विदेश मंत्रियों की बैठक में शामिल हुए। इस बार भी वह सीधे दिल्ली नहीं आ रहे हैं। वह पहले मुंबई आएंगे और फिर जामनगर जाएंगे। 20 अक्टूबर को ही मुंबई में उनकी मुलाकात अपने भारतीय समकक्ष एस जयशंकर से होगी। रूबियो का यह भारत दौरा कई मायनों में महत्वपूर्ण है। हाल के समय में ट्रेड डील, टैरिफ और बयानबाजी को लेकर दोनों देशों के आपसी रिश्ते में एक तरह का गतिरोध देखने को मिला है। फिलहाल टैरिफ पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 17 अक्टूबर को बड़ी राहत दे दी। रूस से तेल खरीदने पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने वाले अपने कानून से उन्होंने भारत और चीन को राहत दे दी। यानी रूस से तेल खरीदने पर भारत पर टैरिफ लगने का खतरा फिलहाल टल गया है। अपने इस कदम से ट्रंप ने रूबियो के दौरे से पहले माहौल को अनुकूल बनाने की कोशिश की है।
आपसी रिश्ते में आया है एक ठहराव
रूबियो के इस दौरे का एजेंडा क्या है? तो इसमें सबसे अहम है रणनीतिक साझेदारी, क्षेत्रीय मुद्दे और, सबसे ऊपर ऊर्जा सहयोग। जामनगर का नाम गौर करने लायक है, क्योंकि यहां रिलायंस का बड़ा रिफाइनरी परिसर है। यानी इस बार संदेश सिर्फ कूटनीति का नहीं, तेल और निवेश का भी है। कुल मिलाकर इस समय भारत और अमेरिका के रिश्ते एक तरह के ठहराव के दौर से गुजर रहे हैं। पिछले साल अगस्त से भारतीय सामान पर अमेरिकी टैरिफ 50 प्रतिशत तक पहुंच गया था, जिसमें रूसी तेल खरीद पर लगा 25 प्रतिशत का अतिरिक्त शुल्क भी था। फिर फरवरी 2026 में सौदे का ढांचा बना और टैरिफ घटकर 18 प्रतिशत हुआ। भारत ने अगले पांच साल में करीब 500 अरब डॉलर के अमेरिकी माल खरीदने की मंशा जताई। लेकिन कहानी यहीं नहीं रुकी। 20 फरवरी को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने IEEPA वाले टैरिफ रद्द कर दिए। तब से टैरिफ का कानूनी आधार बार-बार बदला है।
ट्रेड डील पर हो सकती है बड़ी घोषणा
टैरिफ ट्रैकर साइटों के मुताबिक अभी ज्यादातर भारतीय सामान पर 10 प्रतिशत का शुल्क लग रहा है। यानी रिश्ते टूटे नहीं हैं, बल्कि समझौता कागज़ पर अधूरा लटका है। ऑपरेशन सिंदूर के बारे में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बयानबाजी हो, मनमाना टैरिफ हो, रूस से तेल खरीदने पर धमकी, डेड इकॉनमी जैसे ट्रंप के बयानों ने रिश्ते में तल्खी लाने का काम किया। ट्रेड डील पर पेच अलग से फंसा है। ट्रेड डील पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का बयान इसी ओर इशारा करता है। सीतारमण ने कहा कि ट्रेड डील पर भारत और अमेरिका के बीच बातचीत आगे नहीं बढ़ पा रही है।
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हालांकि, कुछ दिनों बाद यानी 13 अक्टूबर को विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा कि बातचीत लैंडिंग पॉइंट के करीब है, लेकिन कुछ मुद्दे अभी बाकी हैं। बीते मई में रूबियो ने खुद कहा था कि डील 'वर्ज' पर है। पांच महीने बीत गए। ऐसे में रूबियो के दौरे के समय ट्रेड डील पर कोई घोषणा संभव है, लेकिन पक्का कुछ नहीं। और एक बात और, व्यापार वार्ता अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि का काम है। विदेश मंत्री का दौरा माहौल बनाता है, कलम नहीं चलाता।
भारत ने बढ़ाया अपने व्यापार का दायरा
जाहिर है कि ट्रंप प्रशासन टैरिफ पर यू-टर्न को लेकर भारत को रूसी तेल खरीद पर राहत देना चाहता है लेकिन यह राहत कब तक मिलेगी, क्या यह स्थायी है? ट्रंप के कभी हां और कभी ना वाले रुख को देखते हुए इसके बारे में अभी स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। कुछ एक्सपर्ट मानते हैं कि ट्रेड डील पर अमेरिकी शर्तों और मांगों को देखते हुए भारत ने अपने हाथ पीछे खींचने शुरू कर दिए थे। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल की तरफ से इस तरह का संकेत जाने लगा कि ट्रेड डील करने के लिए भारत उतावला नहीं है। वह अपने किसानों, मत्स्य एवं डेयरी उद्योग के हितों के साथ कोई समझौता नहीं करेगा, चाहे यह डील हो या न हो। साथ टैरिफ वाले अमेरिकी रुख को देखते हुए भारत ने अपने कारोबार के लिए वैकल्पिक बाजार तलाशने शुरू कर दिए। ईयू, न्यूजीलैंड और ब्रिटेन के साथ डील हुई। कनाडा के साथ व्यापार समझौते पर बातचीत चल रही है। दिसंबर में पीएम मोदी कनाडा की यात्रा पर जाने वाले हैं, हो सकता है कि उनकी इस यात्रा के दौरान ट्रेड डील पर हस्ताक्षर हो जाएं। यानी, व्यापार को लेकर भारत अमेरिका पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है।
केवल एक देश पर निर्भर नहीं रहना चाहता भारत
जस्टिन ट्रूडो के समय भारत और कनाडा के रिश्ते में जो एक कड़वाहट आई थी, उसे दोनों देश अब दूर करने की कोशिश कर रहे हैं। आपसी रिश्ते को दोबारा पटरी पर लाने में दोनों देशों को सफलता भी मिली है। कनाडा की विदेश मंत्री अनीता आनंद 13 से 16 अक्टूबर तक भारत की यात्रा पर थीं। जून 2025 के बाद दिल्ली की यह उनकी तीसरी यात्रा थी। इसी दौरान मोदी और कनाडा के प्रधानमंत्री कार्नी की फोन पर बात भी हुई।
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निज्जर विवाद के बाद 2023 में जो रिश्ते पटरी से उतरे थे, वो अब व्यापार और ऊर्जा की पटरी पर लौट रहे हैं। भारत के लिए संदेश साफ है, हर दरवाजा खुला रखो। अमेरिका से ऊर्जा और टेक, कनाडा से निवेश और संसाधन, और चीन-रूस के साथ अपना संतुलन। ट्रंप की टैरिफ राजनीति ने भारत को सिखाया कि एक साझेदार पर टिकना जोखिम है। अब भारत का मंत्र वही है जो उसकी विदेश नीति का रहा है, वह है उसकी रणनीतिक स्वायत्तता।
किस हद तक मतभेदों को सुलक्षा पाएंगे भारत-US?
रूबियो की इस यात्रा के दौरान उनकी जययशंकर के साथ हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती भूमिका, रक्षा सहयोग, तकनीक, महत्वपूर्ण खनिज और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर बातचीत की संभावना जताई जा रही है। रुबियो का जामनगर दौरा भी विशेष महत्व रखता है। यहां रिलायंस इंडस्ट्रीज की विशाल तेल रिफाइनरी स्थित है। ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग और निवेश बढ़ाने की संभावनाओं पर इस दौरे के दौरान ध्यान रहने की उम्मीद है। बीते मार्च में ट्रंप ने कहा था कि रिलायंस इंडस्ट्रीज अमेरिका में 300 अरब डॉलर का निवेश करेगी। कंपनी ब्राउनविले में एक तेल रिफाइनरी स्थापित करेगी। हो सकता है कि जामनगर के दौरे में इस बारे में भी बातचीत हो। कुल मिलाकर, यह यात्रा केवल कूटनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि व्यापार, ऊर्जा और रणनीतिक साझेदारी में प्रगति का अवसर है। हालांकि, इसके वास्तविक परिणाम इस बात पर निर्भर करेंगे कि दोनों देश अपने मतभेदों को किस हद तक सुलझा पाते हैं।
