Bihar Chunav 2025: बिहार, एक ऐसा राज्य, जिसने इन दिनों राजनीतिक दलों की धड़कनें तेज की हुई हैं। यहां पर वोटिंग संपन्न हो चुकी है और मतदाताओं ने रिकॉर्ड मतदान किया है, पिछले चुनावों की तुलना में 9 फीसदी ज्यादा है और अब सभी की निगाहें 14 नवंबर दिन शुक्रवार पर टिकी हुई हैं, जब नेताओं की किस्मत का फैसला होगा और इसी के साथ तय होगा कि बिहार में फिर से नीतीशे कुमार शासन करेंगे या यह परिपाटी बदलेगी। ऐसा इसलिए, क्योंकि चुनाव में जीत किसी की भी हो, लेकिन नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बनने का रास्ता बना ही लेते हैं। तभी तो बिहार ने सबसे ज्यादा नीतीशे शासन देखा है तो चलिए आज समझते हैं कि बिहार के इतिहास में सबसे ज्यादा समय तक मुख्यमंत्री रहने के बावजूद नीतीश कुमार ने आखिर विधानसभा चुनाव क्यों नहीं लड़ा।
नीतीश कुमार ने आखिरी बार 1985 में विधानसभा चुनाव लड़ा था, लेकिन ऐसा नहीं है कि उन्होंने चुनाव ही नहीं लड़ा। नीतीश कुमार ने 1977, 1980 और 1985 में लगातार तीन विधानसभा चुनावों में हिस्सा लिया, लेकिन 1985 के चुनावों में ही किस्मत ने साथ दिया, जबकि 1977 और 1980 के चुनावों में शिकस्त मिली। इसके बाद उन्होंने स्थानीय राजनीति से खुद को दूर किया और राष्ट्रीय राजनीति की ओर अपना ध्यान केंद्रित किया।
भले ही नीतीश कुमार ने एक ही विधानसभा चुनाव जीता हो, लेकिन उन्होंने लोकसभा चुनाव में असाधारण प्रदर्शन किया और 1989, 1991, 1996, 1998, 1999 और 2004 में लगातार छह लोकसभा चुनावों में कामयाबी हासिल की। उन्होंने 2004 में बाढ़ और नालंदा दो जगहों से संसदीय चुनाव लड़ा था, लेकिन नालंदा सीट ही जीत पाए थे और व्यक्तिगत रूप से लड़ा गया यह उनका आखिरी चुनाव था। इसके बाद उन्होंने कभी भी चुनाव नहीं लड़ा था।
नीतीश कुमार ने नवंबर 2005 में दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी और नौ माह की एक छोटी अवधि को नजरअंदाज कर दिया जाए तो वह अबतक बिहार का शासन संभाल रहे हैं। साल 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने प्रचंड जीत दर्ज की और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्र की सत्ता संभाली, लेकिन राजनीतिक मतभेदों की वजह से नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया जिसके बाद जीतन राम मांझी की ताजपोशी हुई। हालांकि, मांझी और भाजपा की नजदीकियां देख नीतीश कुमार ने वापसी की और 2015 में विधानसभा चुनावों से ठीक पहले मुख्यमंत्री पद संभाला। इसके बाद उन्होंने राजद के साथ गठबंधन कर मजबूत जनादेश हासिल किया और 2017 में एनडीए में वापस आ गए। बिहार में भले ही जनादेश किसी को भी मिला हो, लेकिन नीतीश कुमार ने कभी भी मुख्यमंत्री पद नहीं छोड़ा। उन्हें जब ठीक लगा तो महागठबंधन में आ गए और जब मन खट्टा होने लगे तो घरवापसी कर एनडीए में शामिल हो जाते।
नीतीश कुमार ने साल 2000 में पहली बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, तब वह राज्य विधानमंडल के किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे और उन्होंने आठ दिनों के भीतर ही मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद 2005 में उन्होंने बिना विधानसभा चुनाव लड़े मुख्यमंत्री पद संभाला और बाद में विधान परिषद के रास्ते सत्ता में बने रहे। नीतीश कुमार को यह रास्ता सबसे ज्यादा भाया तभी तो उन्होंने विधानसभा चुनाव लड़ने के बारे में सोचा तक नहीं और इसी रास्ते आगे बढ़ते रहे।
बिहार देश के उन छह राज्यों में से एक है जहां विधान परिषद है, जो मंत्रियों को विधानसभा चुनावों के माध्यम से सीधे निर्वाचित हुए बिना ही पद धारण करने की अनुमति प्रदान करती है। एमएलसी के रूप में नीतीश कुमार का पहला कार्यकाल 2012 में समाप्त हुआ, जिसके बाद वह फिर से निर्वाचित हुए। हालांकि, नीतीश कुमार को अपने इस कदम के चलते आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा।
नीतीश कुमार ने जनवरी 2012 में विधान परिषद के शताब्दी समारोह कार्यक्रम के दौरान कहा था, ''मैंने अपनी इच्छा से विधान परिषद सदस्य बनने का फैसला किया, ना कि किसी मजबूरी में, क्योंकि उच्च सदन एक सम्मानजनक संस्था है।'' उन्होंने कहा था कि वर्तमान छह साल का कार्यकाल पूरा होने पर मैं एक बार फिर विधान परिषद के लिए चुना जाऊंगा।
2015 के विधानसभा चुनावों से पहले उन्होंने एक बार फिर स्पष्ट किया था कि वह व्यक्तिगत रूप से विधानसभा चुनाव नहीं लड़ने वाले हैं। उन्होंने इसके पीछे की वजह भी बताई थी। उन्होंने कहा था कि वह महज एक सीट तक अपना ध्यान सीमित नहीं रखना चाहते हैं। साल 2018 में नीतीश कुमार तीसरी बार विधान परिषद के लिए चुने गए और मार्च 2024 में भी यही हुआ और अब 2030 तक वह विधान परिषद के सदस्य हैं।
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