India Alliance Protest against CEC: मुख्य चुनाव आयुक्त (ECI) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे मांग को लेकर देश की सियासत गर्म है। कांग्रेस की अगुवाई में इंडिया गठबंधन के नेता दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे हैं। मंगलवार, 6 अक्टूबर को इंडिया गठबंधन के सांसदों ने संसद के मकर द्वार से चुनाव आयोग मुख्यालय तक मार्च किया। इसमें कांग्रेस, TMC, सपा, NCP (शरद पवार), शिवसेना (UBT), वाम दल और RJD के नेता शामिल हुए। मांगें तीन थीं: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा, SIR रद्द करना और बैलेट पेपर की वापसी। राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और अखिलेश यादव को मार्च रोके जाने के बाद हिरासत में लिया गया। फिर भी तस्वीर पूरी नहीं थी। AAP और DMK मार्च से दूर रहे, जबकि BJD प्रदर्शन में शामिल हुई। बुधवार को कनॉट प्लेस के सागर रत्ना रेस्टोरेंट में कांग्रेसी सांसद तो जुटे लेकिन इंडिया गठबंधन के ज्यादातर दलों ने इससे दूरी बनाई। बुधवार और गुरुवार का यह प्रदर्शन मोटे तौर पर कांग्रेस के विरोध के तौर पर उभरा। सवाल यह है कि जब मुद्दा चुनावी प्रक्रिया की साख का है, तो पूरा विपक्ष एक मंच पर क्यों नहीं? जवाब यह है कि SIR पर असहमति कम है, असली दिक्कत 'किसके नेतृत्व में और किसकी शर्तों पर' लड़ाई हो, इस पर है। हर पार्टी का अपना राज्य-स्तरीय गणित है।
'साझा मंच' से परहेज कर रही AAP:
AAP ने पहले ही कह दिया था कि वह कांग्रेस के मार्च में नहीं जाएगी। पार्टी का तर्क है कि वह अपना स्वतंत्र अभियान चला रही है और दिल्ली में कांग्रेस के साथ मंच साझा करने से स्थानीय स्तर पर प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ चल रहे उसके अभियान कमजोर पड़ते। राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने कहा कि SIR की गड़बड़ियों के खिलाफ उनकी लड़ाई जारी रहेगी। यानी AAP मुद्दे से नहीं, कांग्रेस की छतरी से बाहर रहना चाहती है। दिल्ली और पंजाब में AAP और कांग्रेस की सीधी टक्कर रही है, इसलिए यह दूरी समझ में आती है
DMK: तमिलनाडु की नई राजनीति
सबसे जटिल मामला DMK का है। 2026 विधानसभा चुनाव के बाद तमिलनाडु में सत्ता बदल चुकी है और मुख्यमंत्री अब विजय की TVK के हैं। DMK इस बात से नाराज है कि कांग्रेस ने उसके प्रतिद्वंद्वी TVK का साथ दिया है। वह तमिलनाडु में SIR के तहत हुई वोटर-डिलीशन पर राहुल गांधी की 'चुप्पी' पर भी सवाल उठा रही है, और खड़गे के उस आह्वान का समर्थन नहीं करती जिसमें SIR के बाद बनी राज्य सरकारें भंग करने की बात थी। DMK का सवाल सीधा है: जिस प्रक्रिया के बाद TVK सत्ता में आई, उस पर कांग्रेस दिल्ली में एक बात और चेन्नई में दूसरी बात कैसे कर सकती है?
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TVK: साथ भी, दूरी भी
TVK की स्थिति और दिलचस्प है। 3 अक्टूबर को वह पहली बार INDIA गठबंधन की राज्य-स्तरीय बैठक में शामिल हुई। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर वह सावधान है। पार्टी का कहना है कि वह SIR के खिलाफ है, पर एक चुनाव आयुक्त को हटाने से बड़ी समस्या हल नहीं होगी। द वीक के विश्लेषण के मुताबिक कांग्रेस SIR रद्द करने की मांग करती है, जिसका मतलब विजय की जीत पर भी सवाल उठना हो सकता है। दूसरी चिंता पहचान की है: विजय को यह भी देखना है कि कांग्रेस के साथ गठजोड़ में TVK की अपनी पहचान न दब जाए। इसलिए मुद्दा साझा है, पर मांगें और तरीका पूरी तरह साझा नहीं।
क्या कांग्रेस को बढ़त मिलने का डर है?
यह सवाल जायज है, पर इसे सिद्ध करने वाला कोई सीधा बयान नहीं है। किसी भी पार्टी ने नहीं कहा कि वह कांग्रेस को आगे बढ़ता नहीं देखना चाहती। हां, पैटर्न साफ है। AAP को दिल्ली-पंजाब में, DMK को तमिलनाडु में और TVK को अपनी पहचान के मोर्चे पर कांग्रेस से प्रतिस्पर्धा है। जब विरोध का चेहरा कांग्रेस बन जाती है, तो इन दलों को डर रहता है कि श्रेय और राजनीतिक लाभ उसी को जाएगा। यानी असली वजह कांग्रेस की बढ़त का डर कम और अपना राजनीतिक स्पेस बचाने की चिंता ज्यादा दिखती है।
कांग्रेस की आगे की क्या है रणनीति?
INDIA गठबंधन ने जिलों में 'सेव डेमोक्रेसी' मार्च और पांच बड़ी रैलियों की घोषणा की है। 15 अक्टूबर को चेन्नई का प्रदर्शन कांग्रेस और TVK, दोनों के लिए बड़ी परीक्षा होगा। देखना होगा कि TVK वहां कितनी खुलकर आती है और DMK इसे कैसे भुनाती है। SIR पर विपक्ष का विरोध साझा है, लेकिन नेतृत्व, मांगें और राज्यों की सियासत अलग-अलग हैं। जब तक कांग्रेस इन दलों के साथ क्षेत्रीय हितों का संतुलन नहीं बैठाती, मंच पर अधूरी तस्वीर बनी रहेगी।
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तीसरा मोर्चा बनाने में जुटी डीएमके!
SIR और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ लगातार आंदोलन कर रहे कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर उनके पूर्व सहयोगी डीएमके ने हमला बोला। डीएमके का कहना है कि पूर्व सीएम एम के स्टालिन के चुनाव क्षेत्र कोलाथुर से एक लाख वोटरों के नाम काटे गए, मगर राजनीतिक फायदे के लिए कांग्रेस ने कभी एक शब्द भी नहीं कहा। साथ ही, मल्लिकार्जुन खरगे की मांग का समर्थन भी नहीं किया। पार्टी का आरोप है कि कांग्रेस उन राज्यों के मुद्दों को नरअंदा करती है, जहां चुनाव के नतीजे उसके नए राजनीतिक सहयोगियों के पक्ष में रहे हैं। तमिलनाडु में SIR के बाद 97.37 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए थे। डीएमके का आरोप है कि एमके स्टालिन के क्षेत्र कोलाथुर से एक लाख ज्यादा वोटरों के नाम काटे गए, इसका असर चुनाव नतीजों पर पड़ा। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में कोलाथुर सीट से पूर्व सीएम स्टालिन टीवीके उम्मीदवार वी.एस. बाबू से 8 हजार से ज्यादा वोटों के अंतर से हार गए थे। चुनाव में डीएमके की हार के बाद कांग्रेस ने तुरंत पाला बदल लिया और टीवीके से दोस्ती कर सरकार में शामिल हो गई। इससे नाराज डीएमके ने इंडिया गठबंधन से भी विदाई ले ली। अब डीएमके राष्ट्रीय राजनीति में तीसरे मोर्चा बनाने में जुटी है।
