पड़ोसी देश बांग्लादेश द्वारा भारत में अपने राजनयिक मिशनों के लिए दो बंगाली पत्रकारों को प्रमुख मीडिया पदों पर नियुक्त करने के फैसले ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। राजनीतिक और राजनयिक हलकों में यह सवाल तेजी से गूंज रहा है कि क्या ऐसे व्यक्तियों को नई दिल्ली और कोलकाता जैसे संवेदनशील शहरों में ढाका का प्रतिनिधित्व सौंपना सही है, जिन्होंने अतीत में भारत के प्रति बेहद कड़ा और आक्रामक रुख अपनाया है? यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के तख्तापलट के बाद दोनों देश अपने द्विपक्षीय संबंधों को एक बार फिर पटरी पर लाने की कोशिश कर रहे हैं।
1.कौन हैं ये दो चेहरे और क्या हैं इनकी नियुक्तियां?
बांग्लादेश सरकार के लोक प्रशासन मंत्रालय द्वारा जारी हालिया आदेशों और रिपोर्टों के अनुसार, मीडिया विंग में दो प्रमुख नियुक्तियां की गई हैं:
मोहम्मद सैदुर रहमान (Md Saidur Rahman): इन्हें नई दिल्ली स्थित बांग्लादेश उच्चायोग में मिनिस्टर (प्रेस) के रूप में एक वर्ष के लिए अनुबंधित किया गया है। सैदुर रहमान बांग्लादेश के प्रतिष्ठित बंगाली दैनिक अखबार 'द डेली इत्तेफाक' में 'राजनीति और चुनाव संपादक' के रूप में कार्यरत रहे हैं। वे ढाका विश्वविद्यालय पत्रकार संघ के महासचिव और चुनाव व लोकतंत्र रिपोर्टर्स फोरम (RFED) के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। शर्तों के मुताबिक, पद संभालने से पहले उन्हें अपनी सभी व्यावसायिक और सरकारी गतिविधियों से इस्तीफा देना होगा।
उम्मे मारूफा (Umme Marufa): इन्हें कोलकाता स्थित बांग्लादेश उप-उच्चायोग में प्रथम सचिव (प्रेस) के रूप में नामित किया गया है। उम्मे मारूफा बांग्लादेश के प्रमुख बंगाली समाचार चैनल 'News24' में एक विशेष संवाददाता के तौर पर काम करती रही हैं। यद्यपि इनकी नियुक्ति की आधिकारिक घोषणा रिपोर्ट आने तक प्रक्रिया में थी, लेकिन राजनयिक सूत्रों ने उनके चयन की पुष्टि की है।
2. विवाद की असली जड़: भारत-विरोधी सोशल मीडिया पोस्ट्स
इस पूरे मामले के तूल पकड़ने की मुख्य वजह इन दोनों पत्रकारों द्वारा अतीत में अपने सोशल मीडिया हैंडल (विशेषकर फेसबुक) पर साझा किए गए विचार हैं। आलोचकों और भारतीय राजनयिक विश्लेषकों ने इनके बयानों को भारत की संप्रभुता और साझा इतिहास के प्रति शत्रुतापूर्ण (Hostile) माना है।
इतिहास को कटघरे में खड़ा करना और 1971 का मुक्ति संग्राम
विवाद का सबसे बड़ा केंद्र सैदुर रहमान का दिसंबर 2024 का एक फेसबुक पोस्ट है। बांग्लादेश के विजय दिवस (16 दिसंबर) पर जब भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 1971 के मुक्ति संग्राम में प्राण न्यौछावर करने वाले भारतीय वीर सैनिकों के बलिदान को याद किया और इसे भारत की 'ऐतिहासिक जीत' बताया, तो रहमान ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने लिखा: "एक बांग्लादेशी होने के नाते मैं स्पष्ट घोषणा करता हूं कि 1971 हमारा स्वतंत्रता संग्राम था। यह हमारा गौरव और सम्मान है।" इसके आगे उन्होंने 1971 के युद्ध में भारतीय सेना के हस्तक्षेप को 'उतावलापन' करार दिया।
भारत को 'औपनिवेशिक ताकत' बताना
रहमान ने अपने पोस्ट में एक बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया कि 1971 में पाकिस्तान से आज़ादी मिलने के बाद बांग्लादेश वास्तव में स्वतंत्र नहीं हुआ, बल्कि वह भारत की 'औपनिवेशिक पकड़' में चला गया। उन्होंने लिखा कि भारत के इस प्रभाव से मुक्त होकर बांग्लादेश को "पूर्ण स्वतंत्रता" 5 अगस्त 2024 को मिली—यह वही तारीख है जब छात्र आंदोलन के बाद शेख हसीना को प्रधानमंत्री पद छोड़ना पड़ा और वे देश छोड़कर भारत आ गईं।
बिना सबूत के गंभीर आरोप
रहमान की टाइमलाइन पर सिर्फ 1971 के युद्ध को लेकर ही नहीं, बल्कि कई अन्य मुद्दों पर भी भारत को घेरा गया था। फरवरी 2025 में उन्होंने एक पोस्ट में 2009 के प्रसिद्ध 'बांग्लादेश राइफल्स विद्रोह' (जिसमें कई सैन्य अधिकारी मारे गए थे) के पीछे कथित तौर पर भारत का हाथ होने का अंदेशा जताया। इसके अलावा, उन्होंने बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के संस्थापक जियाउर रहमान की हत्या में भी बिना किसी ठोस सबूत या तथ्य के भारतीय संलिप्तता के आरोप लगाए।
3. डिजिटल फुटप्रिंट्स मिटाने की कोशिश और खड़े होते सवाल
जैसे ही भारतीय मीडिया और राजनयिक गलियारों में इन दोनों नियुक्तियों को लेकर सुगबुगाहट तेज हुई, सोशल मीडिया पर एक और हलचल देखने को मिली। सैदुर रहमान और उम्मे मारूफा दोनों के आधिकारिक फेसबुक पेजों से भारत से जुड़े विवादित और तीखे पोस्ट अचानक गायब या डिलीट कर दिए गए।
राजनयिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि इन पोस्ट को हटाने का एकमात्र उद्देश्य दोनों देशों के बीच संभावित राजनयिक गतिरोध को रोकना था, क्योंकि दोनों पत्रकार भारत में बेहद संवेदनशील पदों पर आ रहे हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का तर्क है कि इंटरनेट के इस दौर में डिजिटल फुटप्रिंट्स को पूरी तरह मिटाना असंभव है। भले ही ये पोस्ट अब सार्वजनिक रूप से न दिखें, लेकिन सवाल यह बना हुआ है कि जो व्यक्ति भारत के प्रति इस तरह की नकारात्मक सोच रखता हो, वह भारत सरकार, भारतीय मीडिया और जनता के सामने बांग्लादेश की छवि को निष्पक्ष और सकारात्मक रूप से कैसे पेश कर पाएगा?
4. मामला इतना महत्वपूर्ण और नाजुक क्यों है?
नाजुक दौर से गुजरते द्विपक्षीय संबंध: अगस्त 2024 के राजनीतिक घटनाक्रम के बाद से नई दिल्ली और ढाका के बीच एक अविश्वास की स्थिति बनी हुई है। वर्तमान में दोनों देशों की अंतरिम और चुनी हुई सरकारें सार्वजनिक मंचों पर सहयोग बढ़ाने की इच्छा जता चुकी हैं। ऐसे समय में इस प्रकार की नियुक्तियां दोनों देशों के बीच बन रहे नए विश्वास को झटका दे सकती हैं।
राजनयिक नियुक्तियों का ढाका पैटर्न: भारत में विदेश नीति और दूतावासों में प्रवक्ताओं की भूमिका आमतौर पर भारतीय विदेश सेवा (IFS) के पेशेवर राजनयिक निभाते हैं, जो एक सख्त आचार संहिता और कूटनीतिक भाषा के दायरे में काम करते हैं। इसके विपरीत, बांग्लादेश में प्रेस विंग के पदों पर पत्रकारों और राजनीतिक झुकाव रखने वाले लोगों की 'कॉन्ट्रैक्ट आधारित' नियुक्तियां करने की पुरानी परंपरा रही है।
पुराना कड़वा अनुभव: इससे पहले नई दिल्ली में बांग्लादेश के प्रवक्ता रहे फैसल महमूद के कार्यकाल में भी ऐसा ही विवाद हुआ था। फैसल महमूद ने भारत की आंतरिक राजनीति को लेकर कुछ ऐसी टिप्पणियां की थीं, जिस पर भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) ने कड़ी आपत्ति जताई थी। कूटनीतिक दबाव के बाद बांग्लादेश सरकार को फरवरी में उनका अनुबंध समय से पहले रद्द करना पड़ा था। इस कड़वे अनुभव के बाद यह उम्मीद की जा रही थी कि ढाका इस बार अधिक सतर्कता बरतेगा।
संबंधों पर क्या पड़ सकता है असर?
राजनयिक संबंधों में 'प्रेस विंग' का काम दो देशों की मीडिया और सरकारों के बीच एक मजबूत सेतु का निर्माण करना होता है। आलोचकों और अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि अगर इस सेतु को संभालने वाले व्यक्ति ही पूर्वाग्रह से ग्रसित होंगे, तो गलतफहमियां कम होने के बजाय बढ़ सकती हैं। हालांकि इस पूरे मामले और डिलीट किए गए पोस्ट्स पर बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने अभी तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है, लेकिन नई दिल्ली की नजरें इस घटनाक्रम पर करीब से टिकी हुई हैं।