Pak Espionage Network : बंगाल की खाड़ी के किनारे बसा विशाखापत्तनम (वाइजैग) सिर्फ एक बंदरगाह शहर नहीं है। यह भारतीय नौसेना की पूर्वी कमान का मुख्यालय है। यहां नौसेना की बहुत सारी गतिविधियां होती हैं। यह शहर एक बार फिर पाकिस्तान से जुड़े कथित जासूसी नेटवर्क की जांच के केंद्र में है। आंध्र प्रदेश की काउंटर इंटेलिजेंस सेल ने 1 अक्टूबर को एक समन्वित कार्रवाई शुरू की। इसमें 18 संदिग्ध सामने आए, जिनमें 13 नौसैनिक कर्मी शामिल हैं। जांच अभी जारी है, इसलिए सभी बातें फिलहाल आरोप हैं, अदालत में साबित तथ्य नहीं। जांच में सामने आया है कि यहां नौसेना से जुड़े कुछ कर्मी 'हनीट्रैप' के शिकार हुए और ऐसा माना जा रहा है कि इन्होंने नौसेना से जुड़ी जानकारियां वाट्सएप पर साझा की होंगी। शुरुआती जांच में इस जासूसी नेटवर्क के तार कई राज्यों से जुड़े मिले और अब इस नेटवर्क की व्यापक स्तर पर जांच की जा रही हैं। जासूसी के तार पाकिस्तान से जुड़े हैं।
निशाने पर विशाखापत्तनम ही क्यों?
इसका जवाब भूगोल और रणनीति में है। पूर्वी नौसैनिक कमान पर बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर के पूर्वी हिस्से में भारत की समुद्री सुरक्षा की जिम्मेदारी है। जहाजों की तैनाती, पनडुब्बियों की आवाजाही, बेस की सुरक्षा व्यवस्था और अभ्यासों की जानकारी किसी भी विरोधी खुफिया एजेंसी के लिए बेहद कीमती होती है। यहां नौसेना के अलावा डॉकयार्ड, ठेकेदार, ड्राइवर, सप्लायर और कैंटीन जैसे कर्मचारियों का बड़ा नेटवर्क भी काम करता है। हर परत में कोई न कोई कमजोर कड़ी मिल सकती है। जासूसी एजेंसियां अक्सर सीधे उच्च अधिकारियों के बजाय इन्हीं निचली कड़ियों को निशाना बनाती हैं। विशाखापत्तनम नौसैनिक मुख्यालय की अहमियत इसलिए और भी ज्यादा है क्योंकि यहां देश की परमाणु पनडुब्बियां डॉक करती हैं। युद्धपोत और विध्वंसक यहां आते-जाते रहते हैं। नौसेना का पूरा पूर्वी कमान यहीं से संचालित होता है।
जांच में 10 राज्यों की एजेंसियां शामिल
रिपोर्टों के मुताबिक इस जांच में 10 राज्यों की एजेंसियां शामिल हैं और इसे 'ऑपरेशन फायरवॉल-2026' नाम दिया गया है। जासूसी के इस मामले में अब तक दो गिरफ्तारियां हुई हैं। पहला आरोपी अन्नम साई वरप्रसाद हैं। वह नौसैनिक अधिकारियों के लिए लगाए गए एक सिविल कॉन्ट्रैक्ट ड्राइवर है और उसे विशाखापत्तनम में गिरफ्तार किया गया। आरोप है कि इसने पैसे के बदले संवेदनशील जानकारी बेची। इसे 14 अक्टूबर तक न्यायिक हिरासत में भेजा गया है। दूसराआरोपी प्रदीप मुखर्जी है। यह विशाखापत्तनम नेवल बेस का कर्मचारी है और इसे कोयंबटूर में पकड़ा गया। पुलिस के अनुसार इसने पाकिस्तानी खुफिया ऑपरेटिव (PIO) द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे एक व्हाट्सऐप खाते को चालू करने के लिए OTP साझा किया। बाकी संदिग्धों की भूमिका और बातचीत की जांच के लिए जब्त किए गए उपकरणों की फ़ॉरेंसिक पड़ताल चल रही है।
सोशल मीडिया कैसे बना हथियार?
यहीं इस मामले का सबसे चिंताजनक पहलू है। आरोप है कि नेटवर्क ने भारतीय महिलाओं के नाम से फर्जी प्रोफाइल बनाई और नौसैनिक कर्मियों से जुड़ने के बाद बातचीत एन्क्रिप्टेड ऐप्स पर ले गए। यह तरीका कई चरणों में काम करता है:
शिकार की पहचान
फ़ेसबुक, इंस्टाग्राम और लिंक्डइन जैसे प्लेटफॉर्म पर सैनिकों और नौसेना से जुड़े लोगों की प्रोफ़ाइल आसानी से मिल जाती हैं। तैनाती की जगह, पद और दोस्तों की सूची खुली जानकारी बन जाती है।
भरोसा बनाना: आकर्षक नाम और तस्वीर वाली फर्ज़ी प्रोफाइल से दोस्ती का अनुरोध भेजा जाता है। शुरुआती बातचीत मासूम होती है, जैसे हालचाल, नौकरी और परिवार की बातें।
निजी चैनल पर शिफ़्ट: जब भरोसा बन जाता है, तो चैट व्हाट्सऐप या दूसरे एन्क्रिप्टेड ऐप्स पर चली जाती है, जहां निगरानी मुश्किल होती है।
छोटी मांगें, बड़ा जाल: पहले सामान्य जानकारी मांगी जाती है, जैसे किसी जगह की तस्वीर या शहर का हाल। फिर मांग बढ़ती जाती है। तब तक शिकार इतना उलझ चुका होता है कि पीछे हटना कठिन लगता है।
पैसे और ब्लैकमेल का दबाव: लालच या डर, दोनों इस्तेमाल होते हैं।
सबसे अहम बात यह है कि इसमें किसी तकनीकी हैकिंग की जरूरत नहीं पड़ती। इंसान की भावनात्मक कमजोरी ही सबसे आसान रास्ता है। इसे खुफिया दुनिया में 'हनी ट्रैप' और सोशल इंजीनियरिंग का मिश्रण माना जाता है।
यह पहली बार नहीं है
विशाखापत्तनम इससे पहले भी ऐसे ही एक बड़े मामले का गवाह रहा है। उस केस में पाकिस्तान-आधारित जासूसों ने भारतीय एजेंटों को भर्ती कर भारतीय नौसेना के जहाजों और पनडुब्बियों की आवाजाही की जानकारी जुटाई। NIA की जांच के अनुसार कुछ नौसैनिक फेसबुक और व्हाट्सऐप जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए पाकिस्तानी नागरिकों के संपर्क में आए और पैसे के बदले गोपनीय जानकारी साझा की। पैसा उन भारतीय सहयोगियों के जरिए नौसैनिकों के बैंक खातों में जमा कराया गया, जिनके पाकिस्तान में कारोबारी हित थे। उस मामले में 11 नौसैनिकों समेत कई लोग गिरफ्तार हुए। नवंबर 2025 तक इस केस में छह आरोपियों को दोषी ठहराकर सजा सुनाई जा चुकी थी।पैटर्न साफ़ है: सोशल मीडिया से संपर्क, पैसे का लालच, और हवाला या बैंक चैनल से भुगतान। तकनीक बदली है, पर तरीका वही है, बस अब ज्यादा संगठित और डिजिटल। असली चुनौती: निगरानी बनाम निजी जिदगी इस तरह के मामलों से सुरक्षा एजेंसियों के सामने कई चुनौतियां खड़ी होती हैं। एन्क्रिप्शन की दीवार: बातचीत एन्क्रिप्टेड होने पर सामग्री तक पहुंचना कठिन है। एजेंसियां अक्सर डिवाइस की फॉरेंसिक जांच पर निर्भर रहती हैं। फर्जी पहचान की भरमार: एक व्यक्ति दर्जनों नक़ली प्रोफ़ाइल चला सकता है और उन्हें बंद कराना प्लेटफ़ॉर्म की सहयोग पर निर्भर है। मानवीय पहलू: सेना और नौसेना के कर्मी लंबे समय तक परिवार से दूर रहते हैं। अकेलापन और आर्थिक दबाव दुश्मन के लिए मौका बन जाता है। ठेका कर्मचारियों की निगरानी: ड्राइवर और सप्लायर जैसे लोगों की पृष्ठभूमि जांच और संवेदनशील इलाकों तक उनकी पहुंच एक कमजोर कड़ी बनी रहती है।