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अजित के बाद चौराहे पर राकांपा: पत्नी-बेटे को मिलेगी पार्टी की कमान या आएगा कोई बाहरी, शरद पवार से समझौते पर भी मंथन

महाराष्ट्र की राजनीति में शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि किसी नेता के अचानक चले जाने से पूरे सियासी समीकरण हिल जाएं। बारामती में हुए विमान हादसे में डिप्टी मुख्यमंत्री अजित पवार के निधन ने राज्य की राजनीति में ऐसा ही असमंजस पैदा कर दिया है। दशकों से सत्ता के केंद्र में रहे अजित पवार न केवल सरकार में एक अहम चेहरा थे,बल्कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के उस गुट की रीढ़ भी थे,जिसके पास पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न है। उनके जाने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि एनसीपी अब किस दिशा में जाएगी। अजित पवार के बाद पैदा हुए खालीपन को एनसीपी कैसे और किसके जरिए भरती है।

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NCP का क्या होगा भविष्य?
Curated by: Shiv Shukla
Updated Jan 29, 2026, 17:57 IST
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बीते दिन महाराष्ट्र ने अपने 'दादा' को खो दिया। बारामती में हुए विमान हादसे में सूबे के डिप्टी सीएम अजित पवार जिन्हें लोग प्यार से 'दादा' कहते थे, का दुखद निधन हो गया। लैंडिग के वक्त उनका ‘लियरजेट 45' विमान क्रैश हो गया। इस हादसे में उनके अलावा चार अन्य लोग भी बच नहीं सके। ऐसे में अजित पवार के अचानक इस तरह से चले जाने से महाराष्ट्र की राजनीति में ऐसा शून्य पैदा हो गया है जो शायद ही कभी भर पाए। ऐसे में महाराष्ट्र की राजनीति में उनके निधन का क्या असर होगा? उनकी पार्टी का आगे का क्या भविष्य होगा।क्या पार्टी शरद पवार गुट से सुलह करेगी? क्या नेतृत्व फिर पवार परिवार के हाथ में ही रहेगा? या फिर किसी अनुभवी नेता को आगे कर पार्टी एक नया रास्ता चुनेगी? इस सब विषयों पर हम विस्तार से चर्चा करेंगे।

अजित पवार का सियासी कद और पैदा हुआ शून्य

महाराष्ट्र की राजनीति में अजित पवार सिर्फ एक पदाधिकारी नहीं थे,बल्कि वे फैसले लेने वाले नेता थे। सरकार में उनकी मौजूदगी सत्ता संतुलन के लिए अहम मानी जाती थी। 2023 में एनसीपी टूटने के बाद उन्होंने जिस तरह से पार्टी का संगठन,विधायक और सत्ता, तीनों अपने साथ रखे,उसने उन्हें शरद पवार के बाद एनसीपी का सबसे ताकतवर चेहरा बना दिया था। 2024 के विधानसभा चुनाव में एनसीपी को 41 सीटों पर जीत मिली थी। इन नतीजों को उनके चाचा के लिए राजनीतिक रूप से करारी शिकस्त के रूप में देखा गया था वहीं यह अजित पवार की रणनीतिक सफलता थी। यही वजह है कि उनके निधन के बाद पार्टी के नेतृत्व को लेकर असमंजस स्वाभाविक है।

तो अब एनसीपी की कमान किसके हाथ जाएगी?

अजित पवार के निधन के बाद यह तय करना आसान नहीं है कि पार्टी की कमान किसे सौंपी जाए। पार्टी के सामने दो स्पष्ट विकल्प हैं या तो नेतृत्व पवार परिवार में ही रहे,या फिर परिवार से बाहर किसी अनुभवी नेता को आगे लाया जाए। पवार परिवार के कई लोग राजनीति में सक्रिय हैं, जिनका नाम अजित के उत्तराधिकारी में शामिल है, इसके अलावा पवार परिवार के बाहर भी कुछ ऐसे नेता हैं, जो पार्टी की कमान संभाल सकते हैं, हालांकि इसमें भी कोई दो राय नहीं हैं कि जिन नामों की चर्चा है उनमें से किसी का भी कद अजित के आस-पास भी नहीं है। इसके अलावा, एक संभावना ये भी है कि एनसीपी के दोनों गुट (अजित और शरद पवार) का विलय हो जाए।

परिवार में कौन-कौन है दावेदार?

अजित परिवार के सबसे नजदीकी परिवार जनों में उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार और बेटे जय और पार्थ पवार हैं। इन तीनों का नाम भी एनसीपी को संभालने वालों में है। हालांकि तीनों का सियासी कद और अनुभव अजित के आस-पास भी नहीं है।

सुनेत्रा पवार

अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार फिलहाल राज्यसभा सांसद हैं। वे लंबे समय से सामाजिक कार्यों और बारामती क्षेत्र में विकास परियोजनाओं से जुड़ी रही हैं। महिला स्वयं सहायता समूहों,ग्रामीण स्वच्छता अभियानों और रोजगार से जुड़े प्रोजेक्ट्स में उनकी सक्रिय भूमिका रहती है। वे 2024 के लोकसभा चुनाव में सुप्रिया सुले के खिलाफ चुनाव लड़ीं थी, जिसमें वे हार गई थीं। उस चुनाव का परिणाम इस बात का संकेत है कि चुनावी राजनीति में उनकी स्वीकार्यता को लेकर पार्टी और जनता दोनों में मतभेद हैं। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि अगर सुनेत्रा पवार पार्टी को संभालने के लिए आगे जाती हैं तो वे मात्र प्रतीक ही होंगी, अजित जैसी आक्रामक सियासत के लिए शायद पार्टी को किसी और पर निर्भर रहना पड़े।

अजित पवार की मौत से महाराष्ट्र की राजनीति में एक बड़ा खालीपन

अजित पवार की मौत से महाराष्ट्र की राजनीति में एक बड़ा खालीपन

पार्थ पवार

अजित पवार के बड़े बेटे पार्थ पवार को भी संभावित उत्तराधिकारी के तौर पर देखा जा रहा है। लेकिन 2019 में मावल लोकसभा सीट से चुनाव हारने के बाद वे सक्रिय राजनीति से कुछ दूरी बनाए हुए थे। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पार्थ के पास नाम और पहचान तो है,लेकिन अभी उन्हें खुद को साबित करना बाकी है। बावजूद इसके अगर पवार परिवार में से ही किसी को चुनना होगा तो संभव है कि पार्थ पवार को ही चुना जाए। संभव है कि खुद सुनेत्रा पवार पार्थ का ही समर्थन करें, क्योंकि वह पहले भी कई बार इस बात के संकेत दे चुकी हैं कि पार्थ पवार को राजनीति में आगे बढ़ाया जाए।

जय पवार की बात जरूर, लेकिन...

अजित पवार के छोटे बेटे जय पवार फिलहाल राजनीति में सीमित रूप से सक्रिय हैं। वे संगठनात्मक कामों में नजर आए हैं और बारामती में जमीनी स्तर पर उनकी मौजूदगी बढ़ी है। लेकिन पार्टी के भविष्य के तौर पर उनकी स्वीकार्यता नहीं है।

पवार परिवार से ही जुड़ी रही है एनसीपी की पहचान

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि एनसीपी की पहचान आज भी पवार परिवार से जुड़ी हुई है। ऐसे में पार्टी के कार्यकर्ताओं और नेताओं का यह भी मानना है कि अगर नेतृत्व परिवार से बाहर गया,तो पार्टी की एकजुटता और जनता पर पकड़ प्रभावित हो सकती है। ऐसे में अगर शरद गुट के साथ पार्टी का विलय नहीं होता है तो संभव है कि पार्थ या सुनेत्रा पवार ही पार्टी की कमान संभालें।

परिवार के बाहर कौन-कौन नेता कर सकते हैं एनसीपी का नेतृत्व

हालांकि,अगर एनसीपी यह फैसला करती है कि पार्टी को परिवार से बाहर किसी अनुभवी नेता के हाथ में दिया जाए,तो कुछ नाम स्वाभाविक रूप से चर्चा में हैं।

छगन भुजबल

छगन भुजबल महाराष्ट्र की राजनीति में जाना-पहचाना नाम हैं। उनके पास 40 सालों का राजनीतिक अनुभव है। प्रशासनिक अनुभव और ओबीसी समाज में उनकी पकड़ को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वे अजित पवार के वफादार लोगों में शुमार थे। हालांकि,राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मराठा आरक्षण आंदोलन के बाद उनकी छवि को लेकर पार्टी सतर्क है। एनसीपी को डर है कि उन्हें आगे करने से पार्टी का जातीय संतुलन प्रभावित हो सकता है। इसे लेकर वरिष्ठ पत्रकार श्रीमंत माने का कहना है कि भुजबल को भले ही पार्टी की कमान न दी जाए, लेकिन एनसीपी की ओर से वे डिप्टी सीएम पद के लिए सबसे माकूल चेहरा हैं।

Chhagan Bhujbal

Chhagan Bhujbal

प्रफुल्ल पटेल

प्रफुल्ल पटेल का कद राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा माना जाता है। दिल्ली में उनकी स्वीकार्यता और अनुभव पार्टी के लिए फायदेमंद हो सकता है, लेकिन राज्य स्तर पर उनका प्रभाव सीमित बताया जाता है।

अजित पवार और प्रफुल्ल पटेल।

अजित पवार और प्रफुल्ल पटेल।

सुनील तटकरे

वहीं, अगर बात सुनील तटकरें की करें तो वे एनसीपी (अजित गुट) के प्रदेश अध्यक्ष हैं। कांग्रेस से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू करने वाले सुनील तटकरे बाद में रांकपा में आए। उन्होंने कई बार विधानसभा चुनावों में जीत दर्ज की। फिर 2019 में उन्होंने लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज की थी। इसके बाद पार्टी में फूट के बाद वे अजित पवार के साथ आए और 2024 के लोकसभा चुनावों में फिर से जीत दर्ज की। उनको पार्टी संगठन का मजबूत स्तंभ माना जाता है। वे संगठन चलाने में माहिर हैं। संभावना जताई जा रही है कि पार्टी उन्हें 'वर्किंग लीडर'की भूमिका में रखे और कोई और चेहरा सार्वजनिक नेतृत्व करे।

क्या शरद पवार गुट से सुलह संभव?

इसके अलावा, एक सवाल जो तेजी से जोर पकड़ रहा है वह यह कि अजित पवार के निधन के बाद फिर एनसीपी के दोनों धड़े एक हो सकते हैं। क्या शरद पवार से सुलह संभव है? अजित पवार के जीवित रहते भी कई बार यह सवाल उठा। वहीं कई बार अजित और शरद पवार के बयानों ने इसके संकेत भी दिए थे। इन कयासों को तब और बल मिल गया था जब कुछ दिन पहले हुए पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ नगर निकाय चुनावों में दोनों गुटों ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। ऐसे में अब इस बात के कयास तेज हो गए थे कि दोनों गुट साथ आने वाले हैं। पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ नगर निकाय चुनावों के दौरान अजित और सुप्रिया सुले ने साथ आने को कहा था कि उन्होंने फिलहाल तय नहीं किया है लेकिन भविष्य में देखते हैं कि क्या होगा। अब कहा जा रहा है कि पवार परिवार के भीतर पैदा हुई परिस्थिति भी सुलह की जमीन तैयार कर सकती है।

शरद पवार और अजित पवार

शरद पवार और अजित पवार

हालांकि, एक बड़ा सवाल गठबंधन का भी है। अगर दोनों गुट साथ आते हैं,तो क्या एनसीपी एनडीए में बनी रहेगी या फिर इंडिया गठबंधन का हिस्सा बनेगी? यही फैसला महाराष्ट्र की राजनीति की दिशा तय करेगा।

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