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क्या था 1971 का ऑपरेशन सर्चलाइट? 55 साल पहले PAK सेना ने किया था बांग्लादेश में 'नरसंहार'

विश्वसनीय रिपोर्टों में कहा गया है कि पाकिस्तानी सेना की इस क्रूरता में करीब 30 लाख बांग्लादेशी नागरिक मौत के घाट उतार दिए गए। पाकिस्तानी सेना ने हजारों की संख्या में महिलाओं के साथ बलात्कार किया। उन लोगों को चुन-चुनकर मारा गया जो पाकिस्तान का विरोध और अपनी आजादी के लिए आंदोलन करते थे।

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25 मार्च 1971 को पाकिस्तानी सेना ने पूर्वी बांग्लादेश में शुरू किया ऑपरेशन सर्चलाइट।
Written by: Alok Rao
Updated Mar 25, 2026, 13:36 IST
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What was Operation Searchlight : इतिहास में 'नरसंहार' की कई विभत्स, क्रूर एवं भयानक घटनाएं हुई हैं। इन्हीं मे से एक है पाकिस्तान का ऑपरेशन सर्चलाइट। पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) में बांग्लाभाषी लोगों के राष्ट्रवादी आंदोलन को कुचलने और उनका दमन करने के लिए पाकिस्तान की सेना ने इस ऑपरेशन को 25 मार्च, 1971 को शुरू किया। बंगाली राष्ट्रीय चेतना एवं भावना को दबाने के लिए पाकिस्तानी सेना ने सनियोजित तरीके से करीब नौ महीने तक दमन चक्र चलाया। विश्वसनीय रिपोर्टों में कहा गया है कि पाकिस्तानी सेना की इस क्रूरता में करीब 30 लाख बांग्लादेशी नागरिक मौत के घाट उतार दिए गए। पाकिस्तानी सेना ने हजारों की संख्या में महिलाओं के साथ बलात्कार किया। उन लोगों को चुन-चुनकर मारा गया जो पाकिस्तान का विरोध और अपनी आजादी के लिए आंदोलन करते थे। पाकिस्तानी सेना के इस तांडव ने पूर्वी पाकिस्तान में भीषण अराजकता, हिंसा और पलायन का दौर शुरू किया जिससे भारत भी अछूता नहीं रहा। पूर्वी पाकिस्तान को आजाद कराने के लिए शेख मुजीबुर्रहमान के नेतृत्व में मुक्ति वाहिनी संग्राम चला और भारत की मदद से दुनिया के नक्शे पर बांग्लादेश के रूप में एक नए देश का जन्म हुआ।

पाक हुक्मरानों को पसंद नहीं आया 1970 का चुनाव परिणाम

दरअसल, ऑपरेशन सर्चलाइट की पृष्ठभूमि पूर्वी पाकिस्तान के 1970 में हुए चुनाव से जुड़ी हुई है। दिसंबर 1970 में जो चुनाव परिणाम आए, वे पाकिस्तान के हुक्मरानों को पसंद नहीं आए। इस चुनाव में अवामी लीग को बहुमत वोट मिले और उसने बंगाल क्षेत्र में भारी जीत हासिल की। 22 फरवरी 1971 को पश्चिम पाकिस्तान के सैन्य जनरलों ने अवामी लीग और उसके समर्थकों को कुचलने का निर्णय लिया। शुरू से ही यह समझ लिया गया था कि बंगालियों की लोकतांत्रिक और मानवाधिकारों की मांग को दबाने के लिए 'जनसंहार' जैसी कार्रवाई आवश्यक होगी। पाकिस्तानी तानाशाह जनरल याह्या खान ने मार्च 1971 में इस 'जनसंहार' की योजना बनाई। लेफ्टिनेंट जनरल टिक्का खान, जिन्हें ‘बांग्लादेश का कसाई’ कहा जाता है, इसे लागू करने की जिम्मेदारी दी गई। मेजर जनरल राव फारमान अली और खादिम हुसैन राजा ने उसी दिन इसकी योजना तैयार की।

ढाका रेडियो स्टेशन भी बंद कर दिया गया

जब याह्या खान की सेना ढाका में दाखिल हुई, तो सभी विदेशी पत्रकारों और संवाददाताओं को रोक दिया गया। पूरी तरह से समाचारों पर पाबंदी लगा दी गई। यहां तक कि ढाका रेडियो स्टेशन भी बंद कर दिया गया और बाहरी दुनिया तक कोई खबर नहीं पहुंचने दी गई। इस अभियान से ठीक पहले, राष्ट्रपति याह्या खान ढाका से कराची चले गए, लेकिन जुल्फिकार अली भुट्टो, जो उस समय पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के अध्यक्ष थे, ढाका में मौजूद रहे और उन्होंने इस अभियान को देखा, जिसमें व्यापक स्तर पर हत्याएं और आगजनी हुईं, और निर्दोष लोग भयानक मौत और यातनाओं का शिकार हुए। फिर भी, अगले दिन भुट्टो ने सेना की कार्रवाई की सराहना करते हुए कहा-'ईश्वर का धन्यवाद कि पाकिस्तान बच गया।'

pak army

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अभियान में लगाए गए 40 हजार PAK सैनिक

25 मार्च 1971, बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के इतिहास का सबसे काला दिन माना जाता है। इसी रात पाकिस्तानी सेना ने ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ के तहत भयानक जातीय सफाए की शुरुआत की। एक ही रात में लगभग 7,000 निहत्थे बंगालियों की हत्या कर दी गई। करीब 40,000 पाकिस्तानी सैनिकों को टैंकों और तोपखाने के साथ इस अभियान के लिए तैनात किया गया। यह बंगाली बुद्धिजीवियों की योजनाबद्ध हत्या थी। युद्ध के शुरुआती दिनों में ढाका विश्वविद्यालय के कई प्रोफेसरों की हत्या कर दी गई। पत्रकारों, डॉक्टरों, कलाकारों, इंजीनियरों और लेखकों को पकड़कर ढाका के मीरपुर, मोहम्मदपुर, नखालपाड़ा, राजारबाग और अन्य स्थानों पर ले जाकर मार दिया गया। पाकिस्तान द्वारा किया गया यह जनसंहार द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया के किसी भी अन्य जनसंहार से तुलना करना कठिन है। लगभग 30 लाख लोगों की हत्या हुई और लाखों महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया। इतने बड़े पैमाने पर इतने कम समय में कहीं और इतने लोगों की हत्या नहीं हुई। लेकिन बांग्लादेश में यह सब केवल नौ महीनों के भीतर हुआ।

रुकैया छात्रावास में लड़कियों के साथ रेप

मुक्तिबाहिनी (बांग्लादेश की प्रतिरोध सेना) के पूर्व सदस्य कैप्टन शाहाबुद्दीन अहमद ने बताया कि ढाका में पाकिस्तानी सेना के पूर्वनियोजित हमले में निहत्थे लोगों को नहीं बख्शा गया। ऑपरेशन सर्चलाइट के मुख्य लक्ष्य ढाका विश्वविद्यालय के शिक्षक और छात्र थे, जो प्रतिरोध आंदोलन की रीढ़ थे। पाकिस्तानी फौज ने इनके खिलाफ बेइंतहा जुल्म किया। युवा लोगों के शव खेतों, नदियों और सेना शिविरों के पास पाए गए। 7 अक्टूबर 1971 को पाकिस्तानी सेना ने अत्याचार की इंतहा कर दी। सेना के कुछ अधिकारियों ने रुकैया हॉल छात्रावास पर हमला किया और अधीक्षकों के सामने लड़कियों के साथ बलात्कार किया। पुरुष छात्रों को उनके छात्रावास के बाहर कतार में खड़ा कर गोली मार दी गई। कुछ छात्रों को अपने ही साथियों के लिए सामूहिक कब्र खोदने पर मजबूर किया गया, और काम पूरा होने के बाद उन्हें भी मारकर वहीं दफना दिया गया।

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अपने अत्याचारों से इंकार करती है पाक सरकार

कुछ बांग्लादेशी स्वतंत्रता सेनानियों ने बताया कि पाकिस्तानी सेना और उनके स्थानीय सहयोगियों ने उन्हें किस तरह बेरहमी से प्रताड़ित किया। प्रसिद्ध बांग्लादेशी इतिहासकार मुंतजिर मामून ने दुख व्यक्त करते हुए कहा कि पर्याप्त सबूत, वीडियो फुटेज, सामूहिक कब्रें, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और विदेशी पत्रकारों की रिपोर्टिंग के बावजूद, इस 'जनसंहार' को अभी तक संयुक्त राष्ट्र द्वारा मान्यता नहीं दी गई। पाकिस्तानी सरकार न केवल आधिकारिक माफी देने से इनकार करती है, बल्कि इन अत्याचारों से भी इंकार करती रही है और 1971 के युद्ध अपराधियों को संरक्षण देती है।

''नरसंहार'' पर बांग्लादेश के पीएम रहमान ने क्या कहा...

बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने 'ऑपरेशन सर्चलाइट' को याद करते हुए मंगलवार को कहा कि 25 मार्च 1971 सबसे अपमानजनक एवं बर्बर दिनों में से है। X पर रहमान ने कहा कि इस अभियान के नाम पर पाकिस्तान ने बांग्लादेशी नागरिकों की हत्या बेहद क्रूरता के साथ की। इस ''नरसंहार'' दिवस के मौके पर मैं सभी शहीदों को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं। बांग्लादेश के इतिहास में 25 मार्च, 1971 काली रात की तरह है। इस रात पाकिस्तानी सेना ने 'ऑपरेशन सर्चलाइट' के नाम पर निहत्थे बांग्लादेशी नागरिकों के खिलाफ इतिहास के जघन्यतम 'नरसंहार'ों में से एक को अंजाम दिया। पाकिस्तानी सेना ने कई जगहों पर अध्यापकों, बुद्धिजीवियों एवं निर्दोष नागरिकों की बर्बरता पूर्वक हत्या की। ये हत्याएं ढाका विश्वविद्यालय, पिलखाना, राजारबाग पुलिस लाइन में हुईं। 25 मार्च का 'नरसंहार' पूर्व नियोजित एक कत्लेआम था।' रहमान ने देशवासियों से अपील की कि वे शहीदों के प्रति गहरी श्रद्धांजलि अर्पित करें और बांग्लादेश की आजादी के लिए उनके बलिदान को सदैव याद रखें।

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