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Explained: क्या है 'सुपर अल नीनो' जो बिगाड़ सकता है भारत के मानसून का गणित; 'रिकॉर्डतोड़' गर्मी की मिल रही आहट

ग्लोबल वार्मिंग के इस दौर में अब मौसम विभाग की एक नई रिपोर्ट ने दुनिया भर में हलचल मचा दी है। यूरोपीय वैज्ञानिकों (ECMWF) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, इस साल के अंत तक 'सुपर अल नीनो' का कहर दिखाई दे सकता है। यह घटना इतनी दुर्लभ और शक्तिशाली है कि यह हर 10-15 साल में एक बार आती है और पूरी दुनिया के मौसम को अस्त-व्यस्त कर देती है। भारत के लिए चिंता की बात यह है कि इसका सीधा प्रहार हमारे मानसून और खेती पर होने वाला है। आइए जानते हैं क्या है सुपर अल नीनो, सामान्य अल नीनो से अलग कैसे है और भारत पर इसका क्या असर हो सकता है।

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Photo : Times Now Digital
सुपर अल नीनो से बिगड़ सकता है मानसून का खेल (AI Image)
Authored by: Nishant Tiwari
Updated Mar 10, 2026, 15:46 IST

Super El Nino: यूरोपीय मध्यम-अवधि मौसम पूर्वानुमान केंद्र (ECMWF) के हालिया जलवायु आंकड़ों ने पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। इन आंकड़ों के अनुसार, इस साल के अंत तक पृथ्वी एक 'सुपर अल नीनो' (Super El Nino) का अनुभव कर सकती है। यह मौसमी परिघटना इतनी शक्तिशाली हो सकती है कि यह इतिहास के सबसे प्रबल अल नीनो वर्षों को भी पीछे छोड़ दे। जलवायु वैज्ञानिक डेनियल स्वैन का कहना है कि फिलहाल सभी संकेत एक महत्वपूर्ण और बेहद मजबूत अल नीनो घटना की ओर इशारा कर रहे हैं। अगर ऐसा होता है, तो न केवल वैश्विक तापमान में बेतहाशा बढ़ोतरी हो सकती है, बल्कि इसका असर मानसून पर भी पड़ सकता है, जिस पर हमारी कृषि निर्भर है।

क्या है सुपर अल नीनो

सामान्य तौर पर अल नीनो एक ऐसी जलवायु स्थिति है जिसमें भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के पानी का तापमान औसत से अधिक हो जाता है। यह गर्म पानी वैश्विक वायुमंडलीय पैटर्न को प्रभावित करता है, जिससे कहीं सूखा तो कहीं बाढ़ जैसे हालात पैदा होते हैं। हालांकि, जब प्रशांत महासागर के इस महत्वपूर्ण क्षेत्र में समुद्र का तापमान औसत से 2 डिग्री सेल्सियस से अधिक बढ़ जाता है, तो इसे 'सुपर अल नीनो' कहा जाता है। औसत रूप से ऐसी दुर्लभ घटनाएं हर 10 से 15 साल में एक बार होती हैं। इनका असर सामान्य अल नीनो की तुलना में कहीं अधिक बड़ा, तीव्र और लंबे समय तक रहने वाला होता है। रक्षा विभाग के मौसम विज्ञानी एरिक वेब के अनुसार, ग्रीनहाउस गैसों की बढ़ती कंसंट्रेशन के कारण जलवायु प्रणाली अब अल नीनो की छोड़ी गई गर्मी को ठीक ढंग से बाहर नहीं निकाल पाती है, जिससे हर नई घटना पिछले रिकॉर्ड को तोड़ती जा रही है।

भारत के मानसून पर मंडराता खतरा

भारत के लिए सुपर अल नीनो की खबर किसी खतरे की घंटी से कम नहीं है। जून से सितंबर के बीच होने वाला भारतीय मानसून देश की अर्थव्यवस्था और फूड सिक्योरिटी की रीढ़ है। ऐतिहासिक रूप से यह देखा गया है कि अल नीनो के सालों के दौरान भारतीय उपमहाद्वीप में सामान्य से काफी कम बारिश होती है। सुपर अल नीनो की स्थिति में बारिश की यह कमी गंभीर सूखे का रूप ले सकती है। जलवायु विज्ञानियों का अनुमान है कि इस साल जून से सितंबर के दौरान मानसून पर इसका उल्टा असर पड़ेगा। कम बारिश होने के कारण न केवल जलाशयों का स्तर घटेगा, बल्कि खरीफ की फसलों, विशेषकर धान की खेती पर भारी संकट मंडरा सकता है। इसके साथ ही, मानसून के दौरान तापमान सामान्य से अधिक रहने की आशंका है, जिससे खेती-किसानी के अलावा ग्रामीण आय भी प्रभावित हो सकती है।

इतिहास का सबसे गर्म साल बनने की ओर 2027

वैज्ञानिकों का एक बड़ा वर्ग इस बात को लेकर चिंतित है कि यदि इस वर्ष का अल नीनो अपनी पूरी ताकत के साथ उभरता है, तो यह वैश्विक तापमान को रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचा देगा। जलवायु वैज्ञानिक जेके हॉसफादर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि, हालांकि 2026 में गर्मी बढ़ेगी, लेकिन हवा के तापमान में बढ़ोतरी अल नीनो के विकास के कुछ समय बाद महसूस की जाती है। इस गणना के आधार पर 2027 के इतिहास का अब तक का सबसे गर्म साल होने की भारी आशंका है। मौसम विज्ञानी एरिक वेब का कहना है कि यह सुपर अल नीनो 1982-83, 1997-98 और 2015-16 जैसी ऐतिहासिक घटनाओं की तुलना में कहीं अधिक गर्मी पैदा सकता है, जिससे दुनिया भर में हीटवेव या लू चलने की घटनाएं बढ़ जाएंगी।

दुनिया भर के मौसम में बड़े बदलाव की आशंका

ऐसा नहीं है कि सुपर अल नीनो का प्रभाव केवल भारत तक सीमित नहीं रहेगा। पश्चिमी अमेरिका में भीषण गर्मी और जंगलों में आग लगने का खतरा बढ़ सकता है। प्रशांत महासागर में अधिक उष्णकटिबंधीय चक्रवात विकसित हो सकते हैं, जबकि अटलांटिक क्षेत्र में इनकी संख्या कम रहने की उम्मीद है। फिलीपींस, चीन और जापान जैसे देशों में शक्तिशाली टाइफून (चक्रवात) आने की संभावना बढ़ जाएगी। दूसरी ओर, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया और पूर्वी अफ्रीका के कुछ हिस्सों में भारी सूखे की स्थिति बन सकती है। इसके विपरीत, दक्षिण अमेरिका के पेरू और इक्वाडोर जैसे देशों में अत्यधिक मूसलाधार बारिश और विनाशकारी बाढ़ की चेतावनी दी गई है। यह बदलाव दिखाते हैं कि कैसे समुद्र की गर्मी का एक पैच पूरी दुनिया के मौसम को अस्त-व्यस्त करने की क्षमता रखता है।

भविष्यवाणी की चुनौतियां और वैज्ञानिकों की राय

हालांकि वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक इस भविष्यवाणी की सीमा का भी पता चलता है। नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) की मिशेल एल'हेरेक्स का कहना है कि उनकी टीम भविष्यवाणी के लिए North American Multi-Model Ensemble का इस्तेमाल कर रही है, लेकिन वसंत के मौसम के दौरान की गई भविष्यवाणियों में सटीकता की एक सीमा होती है। इसे वैज्ञानिक 'स्प्रिंग प्रिडिक्शन बैरियर' कहते हैं। साल 2014 का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि कई बार मॉडल वसंत में बड़े अल नीनो की भविष्यवाणी करते हैं, लेकिन बाद में वे कमजोर पड़ जाते हैं। इसके बावजूद, फिलहाल के आंकड़े और प्रशांत महासागर में हवाओं की बदलती दिशा यह संकेत दे रहे हैं कि इस बार का जोखिम बहुत वास्तविक है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इन पूर्वानुमानों का महत्व इसलिए है ताकि सरकारें और एजेंसियां समय रहते संभावित खतरों का आकलन कर सकें और उनके असर को कम करने के लिए तैयारी कर सकें।

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