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CEC को पद से हटाने की क्या है कानूनी प्रक्रिया? ज्ञानेश कुमार को हटाने पर क्यों लामबंद हुआ विपक्ष

संविधान का अनुच्छेद 324 (5) कहता है कि सीईसी को हटाने का तरीका बिल्कुल वैसा ही है जैसे सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता है। यानी बार जानबूझकर बहुत ऊंचा रखा गया है ताकि आयोग राजनीतिक दबाव से सुरक्षित रहे। मुख्य चुनाव आयुक्त या चुनाव आयुक्त को हटाने का आधार सिर्फ दो हो सकते हैं।

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Photo : PTI
सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव ला सकता है विपक्ष।
Written by: आलोक कुमार राव
Updated Sep 25, 2026, 13:11 IST
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CEC Gyanesh Kumar News: मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के प्रक्रिया पर चुनाव आयुक्तों में मतभेद होने की इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट पर विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार पर हमलावर है। वह उन्हें हटाए एवं उनके इस्तीफे की मांग कर रहा है। यह मांग जोर पकड़ती जा रही है। सीईसी के इस्तीफे की मांग को लेकर कांग्रेस ने शुक्रवार को देश भर में जोरदार प्रदर्शन किया। वहीं, इस रिपोर्ट के बाद भारतीय चुनाव आयोग ने अपनी सफाई में कहा है कि चुनाव आयुक्तों में असहमतियों को होना असामान्य बात नहीं है। असहमतियां या विरोध होने के बावजूद चुनाव आयोग फैसले सहमति से करता है। SIR के फॉर्म-6 के बारे में भी ऐसा ही हुआ। एसआईआर पर सभी फैसले चुनाव आयुक्तों की सहमति से लिए गए। हालांकि, इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक तीन में से दो आयुक्तों ने SIR से जुड़े कई फैसलों पर अपनी असहमति दी थी। दावा है कि एसआईआर से जुड़े कई फैसलों के बारे में मुख्य चुनाव आयुक्त ने कोई जानकारी नहीं दी और उन्हें अंधेरे में रखा।

महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी में विपक्ष

इस रिपोर्ट के बाद पूरा विपक्ष एकजुट है और वह ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने के लिए महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा है। सवाल यह है कि क्या यह प्रस्ताव कानूनी रूप से मुमकिन है? और अगर मुमकिन है, तो इसका रास्ता कितना कठिन है? कांग्रेस के सूत्रों के मुताबिक, संयुक्त विपक्ष जल्द ही दोनों सदनों में सीईसी ज्ञानेश कुमार को हटाने का प्रस्ताव लाएगा। यह खबर एक दिन बाद आई है जब इंडियन एक्सप्रेस की जांच में यह सामने आया कि निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने आयोग के फैसलों और प्रक्रियाओं पर आंतरिक रूप से गंभीर सवाल उठाए हैं। यहां यह बात समझनी जरूरी है कि चुनाव आयोग में सीईसी कोई 'सुप्रीम बॉस' नहीं होता, बल्कि वह 'बराबरी वालों में' पहला होता है। सैद्धांतिक रूप से फैसले तीनों आयुक्तों की सहमति से लिए जाने चाहिए।

यहां भी SC के जज को हटाने वाली प्रक्रिया का पालन

संविधान का अनुच्छेद 324 और 2023 का सीईसी एवं अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, नियुक्ति और हटाने दोनों की प्रक्रिया तय करते हैं। नियुक्ति एक तीन-सदस्यीय समिति की सिफारिश पर होती है। इस समिति में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता, और एक कैबिनेट मंत्री होते हैं। चुनाव आयुक्तों का कार्यकाल छह साल या 65 वर्ष की आयु, जो भी पहले हो। संविधान का अनुच्छेद 324 (5) कहता है कि सीईसी को हटाने का तरीका बिल्कुल वैसा ही है जैसे सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता है। यानी बार जानबूझकर बहुत ऊंचा रखा गया है ताकि आयोग राजनीतिक दबाव से सुरक्षित रहे। मुख्य चुनाव आयुक्त या चुनाव आयुक्त को हटाने का आधार सिर्फ दो हो सकते हैं। पहला है 'सिद्ध कदाचार' या 'अक्षमता'।

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CEC को हटाने के हैं दो आधार

यही प्रावधान 2023 के अधिनियम की धारा 11(2) में भी देखा जा सकता है। अनुच्छेद में आगे कहा गया है कि 'किसी अन्य निर्वाचन आयुक्त या क्षेत्रीय निर्वाचन आयुक्त को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश के अलावा पद से नहीं हटाया जा सकता।' संविधान के अनुच्छेद 124(4) के अनुसार, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया निर्धारित है, किसी न्यायाधीश को केवल 'सिद्ध कदाचार या अक्षमता' के आधार पर ही हटाया जा सकता है। कदाचार में भ्रष्ट आचरण या पद का दुरुपयोग शामिल हो सकता है। समय के साथ अदालतों ने इसकी व्याख्या में ऐसे कार्यों को भी शामिल किया है, जो CEC के पद की गरिमा और जिम्मेदारियों के अनुरूप नहीं हैं, या CEC द्वारा अपने आधिकारिक कर्तव्यों का निर्वहन करने में विफलता को भी इसमें शामिल माना गया है। वहीं, अक्षमता से आशय ऐसी स्थिति से है, जिसमें संबंधित अधिकारी अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने में सक्षम न हो।

CEC को हटाने की प्रक्रिया

  • सबसे पहले, दोनों सदनों में इस आरोप के साथ एक नोटिस लाना होता है
  • लोकसभा में कम से कम 100 सांसदों और राज्यसभा में 50 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी हैं
  • सदन के पीठासीन अधिकारी यानी स्पीकर या चेयरमैन इसे स्वीकार करें या खारिज करें, यह उनके विवेक पर है
  • अगर स्वीकार हो जाए, तो एक जांच समिति बनती है जो आरोपों की पड़ताल करती है
  • अंत में, दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पास होना जरूरी है -तभी राष्ट्रपति हटाने का आदेश जारी करते हैं

दो-तिहाई बहुमत जुटा पाना विपक्ष के लिए चुनौती

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि राष्ट्रपति के पास इसमें कोई विवेकाधिकार नहीं है। संवैधानिक शर्तें पूरी होते ही वे संसद की सलाह पर काम करते हैं। यह पहली बार नहीं है। इसी साल मार्च में टीएमसी के नेतृत्व में विपक्ष ने लोकसभा में 130 और राज्यसभा में 63 सांसदों के हस्ताक्षर के साथ महाभियोग प्रस्ताव दिया था जिसमें विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर 'पक्षपातपूर्ण आचरण' का आरोप लगाया गया था। अप्रैल में दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों ने इसे बिना कोई कारण बताए खारिज कर दिया था। यह सिर्फ एक संस्थागत विवाद नहीं है। यह भारत के लोकतांत्रिक ढांचे की उस बुनियादी संस्था से जुड़ा सवाल है, जो हर पांच साल में सत्ता परिवर्तन को सुनिश्चित करती है। अगर आयोग के भीतर से ही असहमति सामने आ रही है, तो यह चुनावी प्रक्रिया की साख पर सीधा असर डालता है। चाहे आप सत्तापक्ष में हों या विपक्ष में। तो क्या यह प्रस्ताव पास हो पाएगा? संसद के आंकड़े को देखते हुए शायद नहीं, क्योंकि दो-तिहाई बहुमत जुटाना विपक्ष के लिए फिलहाल मुश्किल है। लेकिन यह राजनीतिक दबाव बनाने की एक रणनीति जरूर है।

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सीईसी के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज

टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने गुरुवार को दिल्ली के संसद मार्ग थाने में मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई, और प्राथमिकी दर्ज करने की मांग की। मोइत्रा ने कहा कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त के पास 'अपने दोनों सहयोगियों की दर्ज राय के खिलाफ आयोग की ओर से कोई भी कदम उठाने का अधिकार नहीं है, और न ही उनके पास आयोग के नाम से ऐसे संदेश जारी करने का कोई अधिकार है जिन्हें आयोग ने कभी मंजूरी न दी हो।’उन्होंने एसआईआर प्रक्रिया के लिए काफी धनराशि मंजूर और जारी किए जाने के बीच सरकारी धन के गलत इस्तेमाल का सवाल भी उठाया। मोइत्रा ने यह भी कहा कि भले ही उन्हें सीईसी और ईसी अधिनियम, 2023 की धारा 16 के तहत सीईसी और ईसी को उनके आधिकारिक काम, बातों या फैसलों के लिए दीवानी या फौजदारी अदालत की कार्यवाही से मिली छूट के बारे में पता है, लेकिन 'इसमें प्राथमिकी दर्ज करने या जांच करने के बारे में कुछ नहीं कहा गया है, जो पुलिस की कानूनी जिम्मेदारियां हैं और यह अदालत के सामने होने वाली कार्यवाही बिल्कुल नहीं है।’

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