What is cloudburst : उत्तराखंड में उत्तरकाशी जिले के धराली में बादल फटने की घटना में अब तक पांच लोगों की मौत हो गई है। मंगलवार को भारी बारिश के साथ आई बाढ़ और मलबे का विनाशकारी नजारा चारो तरफ फैला हुआ है। खराब मौसम की वजह से राहत एवं बचाव कार्य चलाने में परेशानी आ रही है। हालांकि, अब तक 130 से अधिक लोगों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया है। जबकि 50 से 60 लोग लापता हैं। बुधवार को भी इलाके में तेज बारिश जारी रही। सेना के नौ जवान भी लापता बताए जा रहे हैं। आशंका है कि तेज रफ्तार वाली बाढ़ के मलबे में कई लोग दबे हो सकते हैं। इस बीच, राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने आपदा प्रभावित इलाके का दौरा कर हालात का जायजा लिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फोन पर धामी से बात की और उन्हें हर संभव मदद का भरोसा दिया।
उत्तरकाशी जिले की हर्षिल वैली में बादल फटने के घटना के बाद धराली में हर तरफ तबाही मच गई। पहाड़ों से खीर गंगा नदी की तेज धार के साथ आए मलबे ने छोटे से कस्बे को अपनी चपेट में लिया और देखते ही देखते यह कस्बा बाढ़ के तेज बहाव में ताश के पत्तों की तरह बिखर गया। इस विनाशकारी बाढ़ के दृश्य रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं। इस आपदा से बड़ी संख्या में जान एवं माल के नुकसान की आशंका जताई जा रही है। उत्तराखंड में खासतौर से मानसून के मौसम में बादल फटने की घटना सामान्य हो गई है। इस प्राकृतिक आपदा से यह पहाड़ी राज्य बड़े पैमाने पर नुकसान उठाता आया है। यहां हम जानेंगे कि आखिर बादल फटने की घटना क्या होती है और यह पहाड़ी राज्य क्यों बार-बार इसकी चपेट में आता है।
क्या होता है 'क्लाउडब्रस्ट'
जैसा कि हम बादल फटने की घटना के बाद थोड़े समय में एक सीमित दायरे या इलाके में बहुत तेज बारिश होती है। भारतीय मौसम विभाग के मुताबिक जब 20 से 30 वर्ग किलोमीटर के दायरे में बिजली और तेज हवलों के साथ एक घंटे में जब 100 मिलीमीटर से ज्यादा बारिश होती है तो उसे उसे 'क्लाउडब्रस्ट' का नाम दिया जाता है। आम बोलचाल की भाषा में कहा जाए तो किसी एक जगह पर एक साथ अचानक बहुत बारिश होना बादल फटना कहा जाता है। हालांकि, 2023 के एक रिसर्च पेपर में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी जम्मू और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी, रूड़की ने 'क्लाउडब्रस्ट' को पारिभाषित करते हुए कहा कि 'एक वर्ग किलोमीटर के दायरे में एक घंटे में 100 से 250 मिलीमीटर यदि अचानक से तेज बारिश होती है तो उसे बादल फटने की घटना कहा जाएगा।' यह रिसर्च पेपर इंटरनेशनल हैंडबुक ऑफ डिजास्टर रिसर्च में प्रकाशित हुआ।
cloudburst
अनुकूल परिस्थितियां बनाते हैं पहाड़ियों के ढलान
बादल फटने की घटनाएं आमतौर पर छोटे क्षेत्र में अत्यधिक वर्षा के कारण होती हैं, जो एक से दस किलोमीटर की दूरी में सीमित होती हैं। यह घटना अक्सर मानसून या प्री-मानसून के समय, खासकर मई से अगस्त के बीच भारत के उत्तरी और पहाड़ी इलाकों में ज्यादा देखी जाती है। पहाड़ों की ढलानें बादलों को ऊपर उठने और गाढ़े रूप में वर्षा करने के लिए अनुकूल परिस्थितियां प्रदान करती हैं, जिससे बादल फटने की आशंका बढ़ जाती है।
नदी या झील के पास 'क्लाउडब्रस्ट' ज्यादा खतरनाक
हर भारी बारिश को बादल फटना नहीं कहा जाता। किसी इलाके में एक घंटे में लगभग 10 सेंटीमीटर (100 मिलीमीटर) या उससे अधिक वर्षा होती है तो उसे बादल का फटना कहा जाता है। हालांकि, यदि किसी नदी या झील के पास यह घटना होती है, तो उसमें अचानक पानी भरने से आसपास के रिहायशी इलाकों में जान-माल का ज्यादा नुकसान हो सकता है। 2013 में उत्तराखंड में केदारनाथ के पास बादल फटने की घटना हुई थी। इस आपदा में करीब 6000 लोग मारे गए और बड़े पैमाने पर संपत्तियों को नुकसान पहुंचा।
'क्लाउडब्रस्ट' की सटीक अनुमान लगाना मुश्किल
बादल फटने की सटीक भविष्यवाणी करना मुश्किल है। मौसम विभाग बड़े क्षेत्र में भारी बारिश का अनुमान तो लगा सकता है, लेकिन बेहद छोटे स्तर पर ऐसी घटनाओं को पकड़ने के लिए या तो उच्च रेजोल्यूशन वाले मौसम मॉडल या घने रडार नेटवर्क की जरूरत होती है। अभी 'क्लाउडब्रस्ट' का पूर्वानुमान लगाने वाले उपग्रह या रडार विकसित नहीं हो पाए हैं। हालांकि, इस तरह की आपदा का पूर्वानुमान लगाने में भारत-नासा का संयुक्त मिशन 'निसार' से उम्मीदें हैं। यह रडार पृथ्वी के धरातल एवं वायुमंडल में होने वाले छोटे बदलाव को भी दर्ज कर लेगा।
cloudburst
इसलिए पहाड़ों पर होती है ज्यादा बारिश
पहाड़ी इलाकों जैसे हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में क्षेत्रीय जलचक्र में बदलाव भी बादल फटने का कारण माना जाता है। इसीलिए यहां बादल पानी के रूप में परिवर्तित होकर तेजी से बरसना शुरू कर देते हैं। दूसरे शब्दों में समझें तो मानसून की गर्म हवाओं के ठंडी हवाओं के संपर्क में आने पर बड़े आकार के बादल बनते हैं। इसीलिए मैदानी इलाकों की तुलना में पहाड़ों पर ज्यादा और तेज बारिश होती है।
नमी से भरी हवाएं पहाड़ी क्षेत्रों में पहुंचती हैं
बादल फटने की घटना तब होती है जब नमी से भरी हवाएं पहाड़ी क्षेत्रों में पहुंचती हैं, जिससे क्यूमुलोनिम्बस बादल बनते हैं। ये बादल ऊर्ध्वाधर स्तंभ बनाकर भारी बारिश, गड़गड़ाहट और बिजली गिरने का कारण बनते हैं। इस प्रक्रिया को ‘ऑरोग्राफिक लिफ्ट’ कहते हैं, जिसमें हवा की ऊर्ध्व गति से बादलों को ऊर्जा मिलती है। ये बादल पहाड़ों की दरारों और घाटियों में अटककर एक छोटे क्षेत्र में तेज बारिश करते हैं। नमी मुख्य रूप से गंगा के मैदानों पर कम दबाव प्रणाली से आती है, जो पूर्वी निम्न स्तर की हवाओं से जुड़ी होती है। यह घटना आमतौर पर 1,000-2,500 मीटर ऊंचाई पर होती है।
2013 में बादल फटने से आई बड़ी आपदा
साल 2013 में उत्तराखंड को एक बड़ी त्रासदी का सामना करना पड़ा। केदारनाथ में आई यह त्रासदी भारत की सबसे भयावह प्राकृतिक आपदाओं में से एक थी। 16-17 जून को भारी बारिश और बादल फटने से चोराबाड़ी ग्लेशियर के पिघलने और मंदाकिनी नदी के उफान के कारण केदारनाथ, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ सहित कई क्षेत्रों में विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन हुए। इस आपदा में 6,000 से अधिक लोग मारे गए। हजारों लापता हुए, और लगभग 3,00,000 तीर्थयात्री और पर्यटक फंस गए। नदियों में मलबे के कारण बाढ़ बढ़ी, जिससे सड़कें, पुल और बुनियादी ढांचा नष्ट हो गया। भारतीय सेना, वायुसेना और एनडीआरएफ ने 'ऑपरेशन सूर्य होप' के तहत 1,10,000 से अधिक लोगों को बचाया। पर्यावरणविदों ने इसे मानव-निर्मित आपदा भी माना, क्योंकि अवैज्ञानिक निर्माण और पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी ने हिमालयी पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंचाया। केदारनाथ मंदिर अपेक्षाकृत सुरक्षित रहा, लेकिन आसपास का क्षेत्र तबाह हो गया। इस त्रासदी ने बेहतर आपदा प्रबंधन और टिकाऊ विकास की आवश्यकता को उजागर किया।
