भारत आज दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सड़क नेटवर्क वाले देशों में शामिल है, जहां 66 लाख किलोमीटर से अधिक सड़कें मौजूद हैं। देश में नेशनल हाइवे का निर्माण औसतन 40 किलोमीटर प्रतिदिन की रफ्तार से हो रहा है। आर्थिक विकास के साथ-साथ ग्रामीण, जिला और शहरी सड़कों का दायरा भी लगातार बढ़ रहा है। लेकिन इतनी विशाल संरचना को बनाने और संवारने की कीमत पर्यावरण पर भी बहुत भारी पड़ती है। पत्थर खनन, बिटुमिन उत्पादन में ऊर्जा का इस्तेमाल और भारी मात्रा में कंस्ट्रक्शन मेटेरियल की ढुलाई, सब मिलकर कार्बन उत्सर्जन को बढ़ाते हैं। इसी चुनौती ने भारत को एक महत्वपूर्ण बदलाव की ओर धकेला है। भारत अब औद्योगिक, शहरी और खेती से निकलने वाले कचरे का इस्तेमाल सड़क बनाने में कर रहा है।
सड़क निर्माण में कचरे का बढ़ता इस्तेमाल
देश में कचरे का रिसाइकिल सिर्फ वेस्ट मैनेजमेंट का समाधान नहीं है, बल्कि मेटेरियल और एनर्जी पर निर्भरता कम करने का एक असरदार रास्ता भी बन गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि नई सड़कों को बनाने में इस्तेमाल होने वाले प्राकृतिक पत्थर, बालू और बिटुमिन कुल कार्बन फुटप्रिंट का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा बनाते हैं। ऐसे में रिसाइक्लिंग और चीजों के कई बार इस्तेमाल (रीयूजिंग) को बढ़ावा देना आर्थिक और पर्यावरणीय सुरक्षा दोनों के लिए अहम है और भारत इसमें लगातार आगे बढ़ता दिख रहा है।
steel slag
छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में जिंदल स्टील प्लांट के पास दो किलोमीटर लंबी छह लेन सड़क को स्टील स्लैग से बनाया जा रहा है। स्टील निर्माण के दौरान निकलने वाला यह बाइप्रोडक्ट लंबे समय से बेकार समझा जाता था, लेकिन अब इसे सड़क निर्माण में प्राकृतिक एग्रीगेट के विकल्प के रूप में अपनाया जा रहा है। गुजरात के हजीरा और मुंद्रा पोर्ट पर इस तकनीक के सफल परीक्षणों ने साबित किया कि स्टील स्लैग सड़क की सभी परतों में पत्थरों की जगह ले सकता है। इससे न सिर्फ पत्थर खनन में लगभग 40 प्रतिशत की कमी आती है, बल्कि कार्बन उत्सर्जन भी लगभग 30 प्रतिशत तक घटता है। भारत में हर साल 2.2 करोड़ टन से अधिक स्लैग पैदा होता है, जिसे सड़क निर्माण में इस्तेमाल किया जाए तो लैंडफिल पर दबाव काफी कम हो सकता है।
प्लास्टिक से बन रहीं मजबूत सड़कें
स्टील स्लैग के अलावा सड़क निर्माण में प्लास्टिक कचरे का उपयोग भी तेजी से बढ़ रहा है। वैज्ञानिकों ने जियोसेल नाम की तकनीक विकसित की है, जो रिसाइकल प्लास्टिक से बनी मधुमक्खी के छत्ते जैसी संरचना होती है। इसमें मिट्टी या एग्रीगेट भरने पर सड़क की भार सहने की क्षमता बढ़ जाती है। यह तकनीक खासकर उन इलाकों में उपयोगी है जहां सबग्रेड, यानी जमीन की परत कमजोर होती है या तापमान में अधिक उतार-चढ़ाव होता है।
दिल्ली-नोएडा-फरीदाबाद एक्सप्रेसवे के पास बने पायलट प्रोजेक्ट में 1,280 वर्गमीटर सड़क को जियोसेल तकनीक से बनाया गया, जिसमें लगभग 20 से 25 टन प्लास्टिक कचरे का इस्तेमाल हुआ। लाहौल–स्पीति और लद्दाख जैसे ऊंचाई वाले इलाकों में भी इस तकनीक का उपयोग किया जा रहा है, जहां पारंपरिक सामग्री उपलब्ध नहीं होती। इससे प्लास्टिक कचरे का समाधान तो मिला ही, साथ ही सड़कें भी अधिक टिकाऊ बनीं। इसके अलावा, भारत में पिछले लगभग दो दशकों से बिटुमिन में 1.5 से 2 प्रतिशत कटा हुआ प्लास्टिक मिलाया जा रहा है, जिससे सड़कें अधिक लचीली होती हैं, उन पर पानी का असर कम पड़ता है और गड्ढे कम बनते हैं। इस प्रक्रिया से हजारों टन प्लास्टिक लैंडफिल से हट कर सड़क बनाने में काम आ रहा है।
csir first road made from steel slag
खेती से निकले कचरे से बन रहा बायो-बिटुमिन
बिटुमिन एक पेट्रोलियम आधारित पदार्थ है, जो कच्चे तेल के डिस्टिलेशन से बनाया जाता है। यह काला, चिपचिपा पदार्थ सड़क बनाते समय बाइंडर (बांधने वाले पदार्थ) का काम करता है। रेत और बजरी को बिटुमिन में मिलाकर सड़कें बनाई जाती हैं। जब इसी बिटुमिन का स्रोत पेट्रोलियम ना होकर कोई जैव पदार्थ हो तो यह बायो-बिटुमिन कहलाता है। कचरे के नए उपयोगों में एक और बड़ा काम हुआ है, धान के पुआल जैसे खेती से बचे अवशेषों से बायो-बिटुमिन बनाना। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह बायो-बिटुमिन पारंपरिक पेट्रोलियम बिटुमिन का 30 प्रतिशत तक विकल्प बन सकता है। इससे न सिर्फ कार्बन उत्सर्जन घटेगा और कच्चे तेल पर निर्भरता कम होगी, बल्कि पराली जलाने जैसी समस्याओं को भी नियंत्रित किया जा सकेगा।
निजी क्षेत्र की बढ़ती भूमिका
सड़कों को 'ग्रीन' यानी ईको-फ्रेंडली बनाने की दिशा में निजी कंपनियां भी तेजी से नए प्रयोग कर रही हैं। उडुपी और उलुंदरपेट महामार्ग परियोजनाओं में लगभग 700 टन प्लास्टिक कचरे का रीयूज किया गया। इससे सड़कें अधिक टिकाऊ बनीं और रखरखाव का खर्च भी कम आया। इसी तरह मथुरा में एक आधुनिक प्लांट स्थापित किया गया है, जहां टायर और प्लास्टिक कचरे से CRMB (क्रम्ब रबर मॉडिफाइड बिटुमिन) और PWMB (प्लास्टिक वेस्ट मॉडिफाइड बिटुमिन) तैयार किया जा रहा है।
road construction istock
NHAI भी 'ग्रीन' पहल को दे रहा बढ़ावा
इन इनोवेशन को बड़े पैमाने पर अपनाने के लिए मानकीकरण बेहद जरूरी है। CRRI और भारतीय सड़क कांग्रेस (IRC) मिलकर सड़क निर्माण में इस्तेमाल होने वाली सामग्रियों के लिए ग्रीन रेटिंग फ्रेमवर्क तैयार कर रहे हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किस सामग्री का ऊर्जा खर्च कितना है, कितनी रिसाइकलिंग हो सकती है और पर्यावरण पर उसका क्या प्रभाव पड़ता है।
GRIHA काउंसिल ने 2024 में हाईवे के लिए एक विशेष इंफ्रास्ट्रक्चर रेटिंग सिस्टम भी लॉन्च किया हालांकि इसे अपनाना अभी अनिवार्य नहीं है, लेकिन इससे परियोजनाओं को टिकाऊ दिशा में बढ़ने की प्रोत्साहन मिल रहा है। NHAI की हालिया रिपोर्ट बताती है कि उसने ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी दर्ज की है और फ्लाई ऐश, प्लास्टिक वेस्ट और रिक्लेम्ड एस्फाल्ट जैसी 631 लाख मीट्रिक टन रिसाइकिल्ड सामग्री का उपयोग किया है।
भविष्य की टिकाऊ सड़कें
भारत की तेजी से बढ़ती सड़क जरूरतों और सीमित संसाधनों को देखते हुए कचरे को कंस्ट्रक्शन मेटेरियल में बदलना सिर्फ एक विकल्प नहीं, बल्कि एक मजबूरी भी है। यदि स्टील स्लैग, प्लास्टिक, खेती से जुड़े अवशेष और औद्योगिक कचरे जैसी सामग्रियों को बड़े स्तर पर अपनाया जाता है, तो भारत न सिर्फ कार्बन फुटप्रिंट कम करेगा बल्कि 2070 के नेट-जीरो लक्ष्य की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम बढ़ाएगा। सड़क निर्माण से जुड़े ये प्रयास दिखाते हैं कि कचरा अब समस्या नहीं, बल्कि देश की सड़कों को मजबूत और पर्यावरण के लिए सुरक्षित बनाने का एक संसाधन बनाया जा सकता है।
