Times Now Navbharat
live-tv
Premium

होर्मुज की गहराइयों में जा दबे अमेरिका-ईरान संबंध, दूसरे दौर की वार्ता से क्या बदलेंगे समीकरण? सामने है चुनौतियों का अंबार

Hormuz Crisis Deepen: अमेरिका और ईरान के बीच रिश्ते दिन-प्रतिदिन गर्त में जाते हुए दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में कूटनीति ही एकमात्र रास्ता है जिससे तनाव को कम किया जा सकता है।

Image
अमेरिका-ईरान के बीच गहराता विवाद (फोटो साभार: AI)
Edited by: Anurag Gupta
Updated Apr 18, 2026, 18:27 IST

Hormuz Crisis Deepen: अमेरिका और ईरान के रिश्तों में तनाव कोई नई बात नहीं है। दशकों से दोनों के बीच खींचतान देखने को मिल रही है, लेकिन हालिया सैन्य टकराव ने दोनों देशों को बातचीत की मेज पर ला खड़ा कर दिया। दोनों के बीच इस्लामाबाद में घंटों तक बातचीत भी हुई, लेकिन उस बातचीत से शांति स्थापित नहीं हो पाई, बल्कि हालात बद से बदतर होते चले गए।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप 24 घंटे में ईरान को लेकर नॉनस्टॉप कई दावे कर देते हैं और तेहरान है कि बिना किसी देरी के उन दावों को खारिज करने में जुट जाता है। होर्मुज स्ट्रेट, जिसे होर्मुज जलडमरूमध्य भी कहा जाता है, पर ईरान ने अपना नियंत्रण बढ़ा दिया है, जबकि अमेरिका ने नौसैनिक नाकेबंदी लागू की हुई है और उसका कहना है कि अमेरिकी नाकेबंदी तब तक 'पूरी तरह लागू रहेगी', जब तक तेहरान अमेरिका के साथ परमाणु कार्यक्रम समेत अन्य मुद्दों पर समझौता नहीं कर लेता है।

इस्लामाबाद वार्ता विफल होने के बाद दुनियाभर की निगाहें होर्मुज पर जा टिकी हैं और मौजूदा परिदृश्य लगातार बदलते हुए दिखाई दे रहा है। इस समुद्री जलमार्ग से दुनिया के लगभग 20 फीसदी तेल की आपूर्ति होती है। ऐसे में जितना ज्यादा दोनों देशों के बीच विवाद गहराता जाएगा, दुनियाभर के कई देशों में तेल और गैस की किल्लत हो सकती है। इसलिए, जल्द ही दोनों देशों के बीच दूसरे दौर की वार्ता की संभावना जताई जा रही है, तो सवाल यह है कि क्या इससे हालात सुधरेंगे या तनाव और बढ़ेगा?

दूसरे दौर की वार्ता क्यों जरूरी

अमेरिका और ईरान के रिश्ते में दशकों से उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। 2015 में दोनों देशों के बीच एक अहम परमाणु समझौता हुआ था, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान 2018 में अमेरिका ने खुद को इस समझौते से अलग कर लिया। उस वक्त ट्रंप ने ऐलान किया था कि अगर ईरान की कोई मदद करता है तो उस पर भी तेहरान की ही तरह प्रतिबंध लगाए जाएंगे। इसके बाद से ही दोनों देशों के बीच अविश्वास और बढ़ गया।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप

हाल के दिनों में हालात तब और भी ज्यादा बिगड़ गए जब अमेरिका ने ईरान के खिलाफ होर्मुज में नौसैनिक नाकेबंदी लागू की। इसके जवाब में तेहरान ने इस अहम जलमार्ग पर अपना नियंत्रण बढ़ा दिया। कभी इस रास्ते को सभी के लिए खोल दिया जाता है, लेकिन जब तक वैश्विक जगत में इसकी सूचना पहुंचती है तब तक मौजूदा हालात बदल जाते हैं और वापस प्रतिबंध लागू हो जाते हैं। ऐसे माहौल में बातचीत ही एकमात्र रास्ता नजर आता है।

क्या हो सकता है वार्ता का एजेंडा

अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम और होर्मुज को लेकर ही विवाद सबसे ज्यादा गहराता जा रहा है। अमेरिका और इजरायल बार-बार ऐसा दावा कर रहे हैं कि ईरान के पास लगभग 400 से 450 किलोग्राम यानी 60 प्रतिशत तक संवर्धित यूरेनियम मौजूद है। इसके अलावा ईरान के पास कम संवर्धित यूरेनियम भी मौजूद है, जिसे जरूरत के हिसाब से आगे बढ़ाया जा सकता है। हालांकि, तेहरान का निगरानी तंत्र इतना जबरदस्त है कि इन आंकड़ों की पुष्टि नहीं की जा सकती है।

ईरान ने साफ किया कि वह अपना संवर्धित यूरेनियम अमेरिका के हवाले नहीं करेगा। ईरान के उप विदेश मंत्री सईद खतीबजादेह ने संवर्धित यूरेनियम को लेकर ट्रंप के दावों को खारिज कर दिया और दोनों देशों के बीच भविष्य की बातचीत के संबंध में सावधानी बरतने की बात कही।

संवर्धित यूरेनियम साइट (फाइल फोटो - AP)

संवर्धित यूरेनियम साइट (फाइल फोटो - AP)

तुर्किये के शहर अंताल्या में एसोसिएटेड प्रेस से बातचीत में खतीबजादेह ने कहा कि ईरान फिलहाल अमेरिका के साथ आमने-सामने की बातचीत के एक दौर के लिए तैयार नहीं है। ईरान के इस हालिया बयान से ऐसे संकेत मिलते हैं कि दोनों देशों के बीच परमाणु मुद्दे पर मतभेद और भी ज्यादा गहरा सकता है और आगे की वार्ताओं का रास्ता आसान नहीं हो वाला है।

दरअसल, अमेरिका के लिए ईरान का परमाणु कार्यक्रम सबसे बड़ा मुद्दा है। अमेरिका चाहता है कि ईरान यूरेनियम संवर्धन सीमित करे और अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण की अनुमति दे, जबकि ईरान चाहता है कि उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों को समाप्त किया जाए और उसे शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम का अधिकार मिले।

अमेरिका ने ईरान पर कई तरह के प्रतिबंध लागू किए हैं जिनकी वजह से ईरान की अर्थव्यवस्था कमजोर हो रही है। तेल निर्यात पर भी असर पड़ रहा है। ईरान चाहता है कि उसे तेल बेचने की पूरी छूट मिले।

वार्ता के संभावित बिंदु

  • होर्मुज में जहाजों की सुरक्षित आवाजाही
  • होर्मुज पर किसका होगा नियंत्रण
  • क्षेत्रीय तनाव को कम करने की योजना

चुनौतियों का अंबार

अमेरिका और ईरान के बीच भरोसे की भारी कमी है। अमेरिका को लगता है कि ईरान चोरी-छुपे परमाणु हथियार बना सकता है, जबकि ईरान को डर है कि अमेरिका पहले की तरह समझौते के बाद भी पलटी मार सकता है और ऐसा तेहरान के साथ साल 2018 में हो चुका है। इसके अतिरिक्त सहयोगी देशों का दबाव भी एक अहम चुनौती है। इजरायल, सऊदी अरब जैसे अमेरिकी समर्थित देश ईरान के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई चाहते हैं, जो वार्ता को बिगाड़ सकता है।

होर्मुज पर गहराता संकट (फाइल फोटो)

होर्मुज पर गहराता संकट (फाइल फोटो)

तेल के बढ़ सकते हैं दाम

हाल ही में आप लोगों ने देखा कि जब ट्रंप ने इजरायल और लेबनान के बीच सीजफायर का ऐलान किया और फिर ईरान ने होर्मुज खोलने की बात कही तो तेल के दामों में गिरावट देखने को मिली। ऐसे में अगर वार्ता विफल होती है तो तेल की कीमतों में भारी उछाल देखने को मिल सकता है। इसके अतिरिक्त एलपीजी गैस पर भी संकट गहराने की संभावना है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि दूसरे दौर की वार्ता में पूरी सफलता मिले जरूरी नहीं है, लेकिन फौरी राहत भी क्षेत्रीय तनाव को कम कर सकती है।

दोनों के बीच वार्ता एक अहम मोड़ साबित हो सकती है। हालांकि, चुनौतियों का अंबार है, लेकिन कूटनीति ही एकमात्र रास्ता है जिससे तनाव को कम किया जा सकता है। हाल ही में पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने दावा किया कि पाकिस्तान दोनों के बीच मतभेदों को दूर करने के लिए काम कर रहा है और उन्होंने कहा कि पिछले सप्ताहांत इस्लामाबाद में हुई बातचीत के दौरान अमेरिका और ईरान एक समझौते पर पहुंचने के "बहुत करीब" थे।

End of Article