द्वितीय विश्व युद्ध में करोड़ों लोगों की जान चली गई और कई देश तबाह हो गए। इससे दुनिया के देशों को यह महसूस हुआ कि अंतरराष्ट्रीय विवादों को बातचीत और सामूहिक प्रयासों से सुलझाने के लिए एक ऐसी वैश्विक संस्था की जरूरत है, जो शांति और सुरक्षा बनाए रखने के लिए देशों को एक मंच पर ला सके। लीग ऑफ नेशंस की विफलता के बाद एक नई और अधिक शक्तिशाली वैश्विक संस्था की जरूरत महसूस हुई। आखिरकार, एक नई और अधिक व्यापक अंतरराष्ट्रीय संस्था बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई और फिर संयुक्त राष्ट्र वजूद में आया।
24 अक्टूबर 1945 को संयुक्त राष्ट्र आधिकारिक तौर पर अस्तित्व में आया। संयुक्त राष्ट्र (United Nation) के गठन का सबसे बड़ा उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखना और भविष्य में दुनिया को बड़े युद्धों से बचाना था। हालांकि, बात करें 2026 की तो दुनिया पिछले सात दशकों में पूरी तरह बदल चुकी है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया दो गुटों में बंटी हुई थी, यानी बायपोलर दुनिया थी—पश्चिमी गुट और पूर्वी गुट। लेकिन अब दुनिया मल्टीपोलर है। मोटे तौर पर समझें तो मुट्ठी भर देश मिलकर दुनिया के नीति-नियम तय नहीं कर सकते। इसी बात को विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने शनिवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रमुखता से रखा।
न्यूयॉर्क में मौजूद संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में संयुक्त राष्ट्र महासभा की फोटो। istock
हम अब मल्टीपोलर वर्ल्ड की ओर तेजी से बढ़ रहे: एस जयशंकर
जयशंकर ने विश्व नेताओं से कहा कि बहुपक्षवाद में सुधार की जरूरत है, क्योंकि शांति बनाए रखने में वैश्विक संस्थानों की असमर्थता प्रगति के लिए खतरा बन रही है और विकास की गति को धीमा कर रही है। जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें उच्चस्तरीय सत्र की आम चर्चा में कहा, “हम अब बहुध्रुवीय दुनिया की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। 1945 के बाद की व्यवस्था अब नई वास्तविकताओं के अनुरूप बदल रही है। इस बदलाव के साथ सामंजस्य बिठाना, समायोजन करना और इसे स्वीकार करना आसान नहीं होगा। आज हम जो बहुत-सी उथल-पुथल देख रहे हैं, उसका कारण इन्हीं कठिनाइयों में निहित है।”
उन्होंने आगे कहा, “बहुपक्षीय व्यवस्था में शांति के लिए संवाद की जरूरत होती है; व्यापक स्तर पर विचार-विमर्श जरूरी होता है; पारदर्शी तरीके से फैसले लिए जाने चाहिए। मानवता के बड़े हिस्से को इस प्रक्रिया से बाहर नहीं रखा जा सकता। बहुपक्षवाद में सुधार की जरूरत का पक्ष दिन-ब-दिन और मजबूत होता जा रहा है।”
संयुक्त राष्ट्र महासभा में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भारत का पक्ष रखा।
इतना ही नहीं, विदेश मंत्री ने कहा कि भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार और अधिक प्रतिनिधित्व की मांग करता रहा है। जयशंकर ने कहा कि यूएन में स्थायी और अस्थायी सदस्यों की संख्या में विस्तार की जरूरत है। उन्होंने बताया कि भारत अधिक जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार है। लेकिन सवाल है कि आखिर 1945 के बाद बनी व्यवस्था में ऐसा क्या है, जिसे भारत बदलना चाहता है? यूएन में सुधार की जरूरत क्यों महसूस की जा रही है? और इसमें भारत की स्थायी यूएनएससी सीट की मांग कहां फिट होती है?
1945 के बाद बनी वैश्विक व्यवस्था क्या है?
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पांच स्थायी सदस्य हैं—अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस। इन पांचों देशों के पास वीटो पावर है। इसके अलावा 10 अस्थायी सदस्य होते हैं, जिन्हें सीमित अवधि के लिए चुना जाता है। समस्या यह है कि दुनिया 1945 के मुकाबले काफी बदल चुकी है, लेकिन यूएनएससी की स्थायी सदस्यता की मूल संरचना में बड़ा बदलाव नहीं हुआ है। यही भारत समेत कई देशों की मुख्य आपत्ति है।
1945 में बने संयुक्त राष्ट्र की व्यवस्था को आज की बदलती दुनिया के हिसाब से बदलने की मांग तेज हो रही है।
दुनिया बदल गई, UN भी बदलना चाहिए
1945 में जब UN बना था, तब दुनिया की राजनीतिक और आर्थिक ताकत का समीकरण आज से बिल्कुल अलग था। उस समय एशिया और अफ्रीका के कई देश औपनिवेशिक शासन के अधीन थे। आज इनमें से कई देश स्वतंत्र राष्ट्र हैं और वैश्विक अर्थव्यवस्था तथा राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और ग्लोबल साउथ की आवाज के रूप में खुद को पेश करता है। इसके बावजूद यूएनएससी की स्थायी सदस्यता में एशिया से चीन के अलावा कोई दूसरा देश नहीं है।
भारत का तर्क है कि जिस संस्था को आज की दुनिया में अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा पर फैसले लेने हैं, उसमें आज की वैश्विक वास्तविकताओं और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व का प्रतिबिंब भी दिखना चाहिए।
भारत के 81वें यूएनजीए के आधिकारिक प्रायोरिटी पेपर में भी सिक्योरिटी काउंसिल में व्यापक सुधार को प्रमुख प्राथमिकता बताया गया है। भारत ने मौजूदा इंटरगवर्नमेंटल नेगोशिएशंस यानी आईजीएन प्रक्रिया में जल्द से जल्द टेक्स्ट-बेस्ड नेगोशिएशंस शुरू करने पर जोर दिया है।
आसान भाषा में समझें तो इंटरगवर्नमेंटल नेगोशिएशंस यानी आईजीएन अलग-अलग देशों के बीच यूएन सुधार को लेकर चल रही बातचीत है। इस बातचीत में देश अपनी-अपनी मांग और राय रखते हैं।
भारत का कहना है कि अब सिर्फ बयान देने और चर्चा करने से आगे बढ़ना चाहिए। इसलिए टेक्स्ट-बेस्ड नेगोशिएशंस यानी लिखित प्रस्ताव या ड्राफ्ट के आधार पर बातचीत शुरू होनी चाहिए।
इस लिखित ड्राफ्ट में यह स्पष्ट हो सकता है कि सिक्योरिटी काउंसिल में कितनी सीटें बढ़ेंगी, किन देशों या क्षेत्रों को प्रतिनिधित्व मिलेगा और सुधार कैसे लागू किया जाएगा।
एक आसान उदाहरण से समझें तो अभी देश कह रहे हैं कि सिक्योरिटी काउंसिल में सुधार होना चाहिए। भारत चाहता है कि अब एक लिखित ड्राफ्ट सामने आए, जिसमें स्पष्ट रूप से लिखा हो कि सुधार किस तरह किया जाएगा। इसके बाद देश उस ड्राफ्ट की एक-एक बात पर बातचीत करें और सहमति बनाने की कोशिश करें। यानी भारत का जोर है, सिर्फ चर्चा नहीं, अब लिखित प्रस्ताव पर ठोस बातचीत शुरू हो।
संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करते पीएम मोदी की फाइल फोटो।
यूएनएससी में भारत की स्थायी सीट क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत लंबे समय से यूएनएससी की स्थायी सदस्यता का दावा करता रहा है। भारत के समर्थन में सबसे बड़ा तर्क यह है कि वह दुनिया की बड़ी आबादी वाले देशों में है, संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में लंबे समय से योगदान देता रहा है और वैश्विक अर्थव्यवस्था में उसका महत्व बढ़ा है। भारत खुद को ग्लोबल साउथ की आवाज के रूप में भी प्रस्तुत करता है।
भारत की मांग केवल अपनी स्थायी सीट तक सीमित नहीं है। वह सिक्योरिटी काउंसिल का व्यापक रूप से विस्तार करने और उसमें विकासशील देशों के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने की वकालत करता रहा है।
इसी संदर्भ में भारत, जापान, जर्मनी और ब्राजील का जी4 यानी G4 समूह यूएनएससी सुधार और स्थायी सदस्यता के विस्तार की मांग करता रहा है।
यूएनएससी में सुधार इतना मुश्किल क्यों है?
यूएनएससी की संरचना बदलना सामान्य नियम बदलने जैसा आसान नहीं है। इसके लिए यूएन चार्टर में संशोधन की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। किसी बड़े सुधार के लिए व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहमति की जरूरत होती है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि मौजूदा पांच स्थायी सदस्य देशों—अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस—की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है।
यानी जिस व्यवस्था में पांच देशों के पास विशेष अधिकार हैं, उसी व्यवस्था को बदलने के लिए उन देशों के बीच सहमति बनाना एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती है। इसी कारण पिछले कई वर्षों से यूएनएससी सुधार पर चर्चा तो होती रही है, लेकिन ठोस नतीजा नहीं निकल पाया है।
भारत के लिए यूएन रिफॉर्म का मतलब सिर्फ 'एक सीट' नहीं
अक्सर यूएन रिफॉर्म की चर्चा होते ही इसे भारत की स्थायी यूएनएससी सीट की मांग से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन भारत का आधिकारिक रुख इससे व्यापक है। भारत सिक्योरिटी काउंसिल में प्रतिनिधित्व बढ़ाने के साथ-साथ यूएन की संस्थागत क्षमता, शांति अभियानों, विकास एजेंडे और ग्लोबल साउथ की भागीदारी को मजबूत करने की बात करता है। भारत ने अपने 81वें यूएनजीए एजेंडे में सिक्योरिटी काउंसिल रिफॉर्म को स्पष्ट प्राथमिकता बनाया है और कहा है कि यूएनएससी को वर्तमान समय के लिए अधिक प्रासंगिक बनाने की दिशा में ठोस परिणाम जरूरी हैं।
सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि यूएन के सदस्य देश सुधार की प्रक्रिया को केवल राजनीतिक बयानबाजी से आगे ले जाकर किसी ठोस लिखित प्रस्ताव तक कैसे पहुंचाते हैं। भारत टेक्स्ट-बेस्ड नेगोशिएशंस, स्पष्ट माइलस्टोन्स और टाइमलाइन्स पर जोर दे रहा है, लेकिन इसके लिए व्यापक सदस्य देशों के बीच सहमति और मौजूदा शक्तिशाली देशों की भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी। इसलिए यूएन रिफॉर्म कोई तुरंत पूरी होने वाली प्रक्रिया नहीं है। यह लंबी कूटनीतिक बातचीत का विषय है।
