स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, वह कटपुतली बन चुका है, जिसे अमेरिका और ईरान बारी-बारी से नचा रहे हैं और दुनिया तमाशा देखने पर मजबूर है। वैश्विक तेल और गैस व्यापार का लगभग 20% हिस्सा जिस जलमार्ग से गुजरता है, वहां डोनाल्ड ट्रंप ने 'नाकेबंदी' (US Iran Strait of Hormuz Blockade) कर दी है।
ब्लॉकेड के खेल को सफल बनाने के लिए अमेरिका ने 15 से अधिक युद्धपोतों की तैनाती की है। इस ऑपरेशन में यूएसएस त्रिपोली (LHA-7) अहम भूमिका निभा रहा है। यूएसएस त्रिपोली में एफ-35 बी लाइटनिंग II स्टील्थ फाइटर जेट और MV-22 Osprey तैनात हैं।
अमेरिकी सेना की क्षेत्रीय सेंट्रल कमांड ने सोमवार को जानकारी दी कि होर्मुज शिपिंग नाकेबंदी को उन सभी देशों के जहाजों के खिलाफ निष्पक्ष रूप से लागू किया जाएगा, जो ईरानी बंदरगाहों में प्रवेश कर रहे हैं या वहां से बाहर निकल रहे हैं। हालांकि, अमेरिका ने यह भी कहा कि यह नाकेबंदी तटस्थ पारगमन (neutral transit) को नहीं रोकेगी।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में मौजूद जहाज की फोटो। AP
क्या ईरान करेगा पलटवार?
इसमें कोई दो राय नहीं है कि होर्मुज में अमेरिका की 'दादागिरी' देखकर ईरान का गुस्सा सातवें आसमान पर होगा। मगर अमेरिका की सैन्य ताकत से पंगा लेना ईरान के लिए भी आसान नहीं है।
हालांकि, ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने कहा है कि होर्मुज के पास आने वाले किसी भी विदेशी सैन्य जहाज को युद्धविराम का उल्लंघन माना जाएगा। ईरान ने कहा है कि ऐसी स्थिति में वह निर्णायक सैन्य बल का उपयोग करेगा।
नाकेबंदी का असर भी दुनिया देख रही है। इस मार्ग पर जहाजों का आना-जाना काफी कम हो गया है। टैंकर इस रास्ते से बचने की कोशिश कर रहे हैं।
ईरान के सुप्रीम नेता मोजतबा खामेनेई की फोटो। AP
इस वैश्विक तमाशे के बीच सवाल है कि आखिर होर्मुज में नाकेबंदी कर ट्रंप क्या हासिल करना चाहते हैं?
ट्रंप का मकसद बिल्कुल स्पष्ट है। ईरान की अर्थव्यवस्था पर ऐसा दबाव डाला जाए कि वह अमेरिका के सामने घुटने टेकने को मजबूर हो जाए। दरअसल, ईरान की कुल निर्यात आय का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा तेल से आता है। ऐसे में अगर इस रास्ते को बंद कर दिया जाए, तो उसके तेल निर्यात पर सीधा असर पड़ेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम के पीछे अमेरिका की कई बड़ी मांगें छिपी हैं, जैसे कि होर्मुज को दोबारा खोलना, ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकना और उसके समृद्ध यूरेनियम भंडार को खत्म करना।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की फाइल फोटो।
क्या कहते हैं अर्थशास्त्री?
होर्मुज पर जारी नाकेबंदी पर अर्थशास्त्री रॉबिन ब्रूक्स की मानें तो यह रणनीति बिना सीधे सैन्य टकराव के ईरान पर भारी आर्थिक दबाव डाल सकती है। उनके अनुसार, नाकेबंदी से ईरान के तेल से होने वाली कमाई खत्म हो जाएगी, जिससे उसकी मुद्रा गिरावट के भंवर में फंस सकती है और अर्थव्यवस्था हाइपरइन्फ्लेशन की ओर बढ़ सकती है। हालांकि, उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि इससे वैश्विक तेल कीमतों में उछाल और बाजार में अस्थिरता आ सकती है।
कोलंबिया से जुड़ीं करेन ई. यंग इस पर थोड़ा अलग नजरिया रखती हैं। उनका कहना है कि ईरान पहले भी आर्थिक दबाव झेलता आया है और संभव है कि इस बार भी वह अपनी नीतियों में बदलाव न करे।
ईरान ने बढ़ा दी दुनिया की सिरदर्दी!
समस्या यह है कि इस जलमार्ग में ईरान ने बारूदी सुरंगें (माइंस) बिछा दी हैं और उनके सही स्थानों को रिकॉर्ड नहीं किया है, जिसकी वजह से उन्हें हटाना बेहद मुश्किल हो सकता है। ऐसे में अगर दोनों देशों के बीच समझौता हो भी जाता है, तो किसी भी जहाज का इस जलमार्ग से गुजरना खतरे से खाली नहीं होगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह रणनीति “जैसे को तैसा” जवाब है। यानी जिस तरह ईरान ने समुद्री ट्रैफिक को हथियार बनाया, अब अमेरिका उसी रास्ते का इस्तेमाल कर उसे आर्थिक दबाव में लाने की कोशिश कर रहा है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में ईरान ने बिछाया बारूदी सुरंग।
हालांकि, होर्मुज पर नाकेबंदी का मतलब यह नहीं है कि अमेरिका ने इस क्षेत्र पर अपना दबदबा कायम कर लिया है। इस क्षेत्र के हर स्थान से ईरान वाकिफ है। ईरान कभी भी स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर किसी भी जहाज को निशाना बना सकता है। वहीं, इस समय ईरान अकेला नहीं है। रूस और चीन पर्दे के पीछे से उसकी मदद कर रहे हैं। इसका संदेह अमेरिका को भी है। हालांकि, ट्रंप के पास इसे साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत नहीं है।
सुपरपावर से कब तक लड़ पाएगा बदहाल ईरान?
भले ही ईरान ने अब तक हार नहीं मानी है, लेकिन 28 फरवरी से जारी इस फसाद का सबसे बुरा असर ईरान में रहने वाले करीब 9.3 करोड़ नागरिकों पर पड़ा है। फिलहाल, ईरान में मुद्रास्फीति 180 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। इस संकट ने लाखों लोगों को बेरोजगार कर दिया है। तेहरान में हर तरफ तबाही का मंजर है।
महसा अमीनी की मौत के बाद ईरान में मौजूद एक तबका लगातार इस्लामी गणराज्य के खिलाफ सड़कों पर उतर रहा है। ये लोग ईरान की बदहाली से तंग आ चुके हैं। भले ही ईरान की जनता ट्रंप को पसंद नहीं करती, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि वहां के नागरिक मौजूदा ईरानी शासन से खुश हैं।
तेहरान में मौजूद ईरानी नागरिकों की फोटो।
मोटे तौर पर समझें तो ईरान का इस्लामी शासन इस समय दो युद्ध लड़ रहा है। एक अमेरिका से और दूसरा आर्थिक बदहाली से। अमेरिका का मकसद है कि ईरान की अर्थव्यवस्था को इतना नुकसान पहुंचे कि वह अंततः सरेंडर करने पर मजबूर हो जाए।
