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...तो 6 लाख होगा सिल्वर का दाम! बैठे रह जाएंगे गिरावट का इंतजार करने वाले

Silver Price Prediction 2026: सिल्वर ने पिछले एक साल में करीब 200% का रिटर्न दिया है। वहीं, गोल्ड और सिल्वर में निवेश के सबसे बड़े पैरोकारों में शामिल रॉबर्ट कियोसाकी का दावा है कि चांदी का भावा 200 डॉलर प्रति आउंस तक पहुंच सकता है। ऐसे में भारत में सिल्वर का दाम 6 लाख प्रति किलो तक पहुंचना तय माना जा रहा है। यहां समझें इस पूरे गणित को और क्यों कियोसाकी इतना बड़ा दावा कर रहे हैं?

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बढ़ता ही जा रहा चांदी का दाम (इमेज क्रेडिट, ओपन एआई)
Authored by: Yateendra Lawaniya
Updated Jan 15, 2026, 10:09 IST
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Silver Price पूरी दुनिया में तेजी से बढ़ रही है। देश में सिल्वर प्राइस जिस रफ्तार से ऊपर गए हैं, उसने निवेशकों और ज्वेलरी मार्केट दोनों को चौंका दिया है। अभी स्थिति यह है कि इंटरनेशनल मार्केट में सिल्वर करीब $90 प्रति आउंस के आसपास दिख रही है, जबकि भारत में रेट करीब ₹2.8 लाख प्रति किलो के आसपास पहुंच चुके हैं।

इसी बीच ‘Rich Dad Poor Dad’ के लेखक रॉबर्ट कियोसाकी का सिल्वर को लेकर एक बड़ा दावा चर्चा में है, जिसमें उन्होंने सिल्वर के लिए $200/oz का दावा किया है। कई रिपोर्ट्स और एक्सपर्ट कमेंट्री में भी कहा गया है कि 2026 में सिल्वर गोल्ड से बेहतर प्रदर्शन कर सकती है और बड़े लेवल्स तक जा सकती है।

अब सवाल यह है कि क्या भारत में सिल्वर ₹6 लाख प्रति किलो तक जा सकती है? जवाब भावनाओं या अटकलों में नहीं, गणित में छिपा है। खास बात यह है कि अगर डॉलर-रुपया का रेट 1 USD = ₹90.26 (मौजूदा) मान लिया जाए, तो $200/oz का लक्ष्य भारत में ₹6 लाख/kg के बेहद करीब पहुंच जाता है। आइए पूरा एक्सप्लेनर समझते हैं।

भारत में चांदी का रेट आखिर बनता कैसे है?

भारत में चांदी का भाव सिर्फ लोकल मांग-सप्लाई से तय नहीं होता। इसकी कीमत की रीढ़ इंटरनेशनल मार्केट है। भारत में चांदी की प्राइसिंग कई फैक्टर्स से तय होती है। पहला फैक्टर है इंटरनेशनल स्पॉट प्राइस, जो डॉलर प्रति ट्रॉय आउंस में होती है। दूसरा फैक्टर है USD-INR कन्वर्जन यानी डॉलर के मुकाबले रुपये की वैल्यू। तीसरा फैक्टर है इम्पोर्ट कॉस्ट जिसमें ड्यूटी, जीएसटी, लॉजिस्टिक्स, रिफाइनिंग और ट्रेडिंग मार्जिन शामिल होते हैं। इसके अलावा चौथा फैक्टर है लोकल प्रीमियम जो तेजी के समय बढ़ जाता है और करेक्शन में घट जाता है। यही वजह है कि भारत में चांदी का भाव अक्सर सीधे कन्वर्जन से थोड़ा ऊपर ट्रेड करता है। तेजी के दौर में यह गैप और बढ़ता है।

सबसे जरूरी फैक्ट

चांदी के गणित में सबसे अहम चीज यूनिट कन्वर्जन है। लिहाजा यह जानना जरूरी है कि 1 किलो में कितने आउंस होते हैं? 1 किलो चांदी = 32.1507 ट्रॉय आउंस। यहां आउंस में बात करना इसलिए जरूरी है क्योंकि, इंटरनेशनल मार्केट में चांदी डॉलर प्रति आउंस ($/oz) में ट्रेड होती है, इसलिए भारत में ₹/kg निकालने के लिए यही फॉर्मूला काम आता है।

क्या है मौजूदा गणित

फिलहाल इंटरनेशनल मार्केट में चांदी 90 डॉलर प्रति आउंस के करीब है। इसके अलावा 1 डॉलर करीब 90.26 रुपये का है। इस तरह $90/oz और 1 USD = ₹90.26 पर भारत में एक किलो चांदी की कीमत के लिए हमें पहले डॉलर में एक किलो चांदी का भाव निकालना होगा, जो कि $90 × 32.1507 यानी $2,893.56 प्रति किलो होगा। अब इसे रुपये में बदलते हैं। 1 USD = ₹90.26, तो इस हिसाब हसे भारत में सीधा कन्वर्जन होगा

$2,893.56 × ₹90.26 = ₹2,61,153 प्रति किलो (करीब ₹2.61 लाख/kg)। लेकिन, भारत में चांदी का रेट करीब ₹2.8 लाख/kg है। इसका मतलब यह है कि मौजूदा रेट में लगभग ₹18,000–₹20,000/kg का अतिरिक्त हिस्सा इम्पोर्ट कॉस्ट, टैक्स, लोकल प्रीमियम और बाजार की टाइटनेस से जुड़ रहा है। यानी भारत में चांदी पहले से ही ग्लोबल कन्वर्जन के ऊपर ट्रेड कर रही है, और यह पैटर्न तेजी के दौर में सामान्य है।

कैसे 6 लाख पहुंच जाएगा दाम?

अगर इंटरनेशनल मार्केट में दाम $200/oz पहुंचता है, तो $200 × 32.1507 = $6,430.14 प्रति किलो हुआ। अब इसे रुपये में बदलते हैं, तो माैजूदा भाव के हिसाब से 1 USD = ₹90.26, तो $6,430.14 × ₹90.26 = ₹5,80,340 प्रति किलो यानी करीब ₹5.80 लाख/kg सीधा कन्वर्जन होता है। अब, चूंकि हम जानते हैं कि भारत में चांदी का फाइनल रेट अक्सर “कन्वर्जन” से ऊपर होता है। अगर इस पर सिर्फ 3–5% का लोकल प्रीमियम और कॉस्ट जोड़ दें, तो 3% प्रीमियम जोड़ने पर भाव करीब ₹5.98 लाख/kg होगा और 5% प्रीमियम जोड़ने पर करीब ₹6.09 लाख/kg हो जाएगे। यानी यानी इंटरनेशनल मार्केट में सिल्वर $200/oz पहुंचते ही भारत में ₹6 लाख/kg का लेवल एकदम तार्किक और स्वाभाविक हो जाता है।

क्या है Robert Kiyosaki का प्रेडिक्शन?

‘Rich Dad Poor Dad’ के लेखक रॉबर्ट कियोसाकी ने सिल्वर के $80 पार करने के बाद सोशल मीडिया पर पोस्ट में संकेत दिया कि $200 अगला बड़ा पड़ाव हो सकता है। उनका तर्क यह रहा है कि आने वाले समय में “रियल एसेट्स” की तरफ निवेशकों का झुकाव बढ़ सकता है और सिल्वर, गोल्ड के मुकाबले ज्यादा तेज भाग सकती है। हालांकि उन्होंने यह चेतावनी भी दी है कि सिल्वर “पीक” कर सकती है और आगे चलकर बड़ा पुलबैक भी संभव है। मतलब साफ है कियोसाकी का नजरिया बुलिश है, लेकिन वह यह भी मानते हैं कि रैली के बीच गिरावट का रिस्क बना रहेगा।

सिल्वर अंडरवैल्यूड

कियोसाकी की सोच यह भी है कि गोल्ड के मुकाबले सिल्वर अब भी “कम कीमत” पर है। जब गोल्ड रैली करता है, तो कई बार सिल्वर “कैच-अप” करती है और तेजी के फेज में गोल्ड से ज्यादा प्रतिशत रिटर्न दे सकती है। इसी “कैच-अप ट्रेड” के आधार पर वह सिल्वर में बड़े जंप की संभावना देखते हैं। इसके अलावा कियोसाकी सिल्वर को सिर्फ निवेश की धातु नहीं मानते। उनके मुताबिक चांदी की मांग सोलर पैनल, इलेक्ट्रॉनिक्स, बैटरी, हाई-टेक सेक्टर जैसी इंडस्ट्रीज से लगातार बढ़ रही है। यानी सिल्वर का “यूज-केस” गोल्ड से ज्यादा व्यापक है। यही वजह है कि वह मानते हैं कि डिमांड बढ़ते ही कीमतें ऊंचे लेवल तक जा सकती हैं।

दूसरे प्रेडिक्शन क्या कहते हैं?

सिल्वर को लेकर बाजार में दो धाराएं चलती हैं। एक तरफ टेक्निकल एनालिसिस वाले $88–$100 जैसे रेजिस्टेंस की बात करते हैं। दूसरी तरफ कुछ रिपोर्ट्स और कमेंट्री में $200 या उससे ऊपर के टारगेट को “बड़े ट्रेंड” के तौर पर देखा जाता है। कुछ एक्सपर्ट्स का कहना है कि सिल्वर इस साल गोल्ड से बेहतर प्रदर्शन कर सकती है, क्योंकि सरकारों ने गोल्ड तो स्टॉकपाइल किया है, लेकिन सिल्वर उतनी नहीं। इससे “कैच-अप ट्रेड” का नैरेटिव बनता है। इसके अलावा इंडस्ट्रियल डिमांड बढ़ने की वजह से भी सिल्वर के पास स्ट्रक्चरल सपोर्ट माना जाता है। यही कारण है कि $200/oz का टारगेट सिर्फ एक व्यक्ति की राय नहीं रह जाता, बल्कि कई बुलिश फ्रेमवर्क में फिट होने लगता है।

क्यों सिल्वर $200 तक जा सकती है?

पहला बड़ा कारण है कि चांदी सिर्फ निवेश की धातु नहीं है, बल्कि इंडस्ट्रियल मेटल भी है। सोलर पैनल, इलेक्ट्रॉनिक्स, एआई डेटा सेंटर्स, हाई-एंड कंपोनेंट्स और एनर्जी ट्रांजिशन में चांदी की भूमिका बढ़ रही है। जैसे-जैसे यह सेक्टर बढ़ते हैं, चांदी की मांग भी बढ़ती है।

दूसरा कारण सप्लाई से जुड़ा है। चांदी की सप्लाई तुरंत नहीं बढ़ाई जा सकती, क्योंकि माइनिंग और रिफाइनिंग में समय लगता है। कई बार चांदी दूसरी धातुओं के साथ बाय-प्रोडक्ट के तौर पर निकलती है, जिससे सप्लाई की फ्लेक्सिबिलिटी कम रहती है।

तीसरा कारण मार्केट साइकोलॉजी है। सिल्वर जब ब्रेकआउट मोड में आती है, तो इसमें मूवमेंट अक्सर तेज और बड़ा होता है। गोल्ड के मुकाबले सिल्वर में वोलैटिलिटी ज्यादा होती है, यानी रैली बड़ी भी हो सकती है और करेक्शन तेज भी।

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