SP-Congress Seat Sharing : उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 का विधानसभा चुनाव विपक्ष के लिए सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं, अस्तित्व की कसौटी भी है। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच गठबंधन की बातचीत आगे बढ़ रही है, और इसके केंद्र में फिर प्रियंका गांधी वाड्रा हैं। 2022 की हार के बाद यूपी से कुछ दूरी बना चुकी प्रियंका की वापसी बताती है कि कांग्रेस इस राज्य को अब भी अपनी राष्ट्रीय रणनीति की धुरी मानती है। पर सवाल यह है कि कांग्रेस कितनी सीटें मांग सकती है और उन्हें जीतने की क्षमता उसके पास कितनी है।
बातचीत की ताजा तस्वीर
हाल तक सपा नेता कह रहे थे कि कांग्रेस की ओर से औपचारिक बातचीत शुरू ही नहीं हुई है। अब तस्वीर बदली है। पीटीआई के अनुसार कांग्रेस ने सपा से औपचारिक सीट-बंटवारा वार्ता शुरू कर दी है और 175 से ज्यादा सीटों की शुरुआती सूची सौंप दी है। इससे पहले प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम कह चुके थे कि पार्टी गठबंधन में 150 से कम सीटों पर नहीं लड़ेगी। कांग्रेस यह भी संकेत दे चुकी है कि वह सपा के साथ 'बराबरी की शर्तों' पर ही गठबंधन चाहती है। दूसरी तरफ सपा का रुख अलग बताया जा रहा है। कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि सपा कांग्रेस को 100 से कम सीटें देने के पक्ष में है। एक अन्य रिपोर्ट में यह आंकड़ा 60-70 सीटों का बताया गया है, पर सपा की ओर से इस प्रस्ताव की औपचारिक पुष्टि नहीं हुई है। यानी अपेक्षाओं का फासला बड़ा है। एक पक्ष 150-200 सीटों की बात कर रहा है और दूसरा उससे आधे से भी कम की। असली खींचतान इसी दायरे में होगी।
2017 और 2022: दो अलग सबक
कांग्रेस की रणनीति को समझने के लिए पिछले दो चुनावों के आंकड़े देखने जरूरी हैं। 2017 में सपा-कांग्रेस साथ लड़े। सपा ने 311 और कांग्रेस ने 114 सीटों पर चुनाव लड़ा। नतीजा यह रहा कि सपा को 47 और कांग्रेस को सिर्फ 7 सीटें मिलीं, जबकि भाजपा ने 312 सीटें जीतकर सरकार बनाई। कांग्रेस के भीतर तब से यह शिकायत रही है कि सीटों का बंटवारा और जमीन पर तालमेल दोनों ठीक नहीं थे। 2022 में दोनों दल अलग लड़े। सपा ने 347 सीटों पर लड़कर 111 जीतीं। कांग्रेस ने 399 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और जीत सिर्फ 2 पर मिली। प्रियंका ने उस चुनाव का अभियान संभाला था और 'लड़की हूं, लड़ सकती हूं' जैसे नारे के साथ महिला सशक्तिकरण पर जोर दिया था। फिर भी नतीजों ने दिखाया कि अभियान की भाषा और मतदाता के व्यवहार के बीच बड़ा अंतर था।priyanka Gandhi
इन दोनों अनुभवों का निष्कर्ष कांग्रेस के लिए कड़वा है। गठबंधन में ज्यादा सीटें लेने से भी जीत नहीं मिली, और अकेले सब जगह लड़ने से भी नहीं। 2017 में कम सीटें मिलीं तो असंतोष रहा, 2022 में सब जगह लड़ी तो ज़मानतें तक बचाना मुश्किल हुआ।
2024 का तर्क और उसकी सीमा
कांग्रेस के पास इस बार एक मजबूत दलील है। 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने 80 में से 62 सीटों पर लड़कर 37 जीतीं और कांग्रेस ने 17 पर लड़कर 6। दोनों ने मिलकर 43 सीटें जीतीं, जिससे भाजपा को राज्य में बड़ा झटका लगा। कांग्रेस इसे इस सबूत के रूप में पेश कर सकती है कि दोनों का साथ आना मतदाता को स्वीकार्य है और उसकी स्ट्राइक रेट सपा से कम नहीं रही। पर लोकसभा और विधानसभा चुनाव का गणित अलग होता है। संसदीय सीट में लगभग पांच विधानसभा क्षेत्र आते हैं और वहां जीत का श्रेय गठबंधन की साझा लहर, सामाजिक समीकरण और राष्ट्रीय मुद्दों को जाता है। विधानसभा में उम्मीदवार की स्थानीय पकड़, बूथ स्तर का संगठन और जातीय गणित ज्यादा निर्णायक होते हैं। इसलिए सपा का यह कहना तर्कसंगत है कि 2024 की सफलता कांग्रेस की अपनी जमीनी ताकत का प्रमाण नहीं है। कांग्रेस को हर दावे के पीछे स्थानीय आधार दिखाना होगा, सिर्फ़ इंडिया गठबंधन के प्रदर्शन का हवाला काफी नहीं होगा।सीटों की श्रेणियां: समझदारी या सौदेबाजी की चाल?
बताया जा रहा है कि कांग्रेस ने अपनी सूची कई श्रेणियों में बांटी है। कुछ सीटें वे हैं जिन पर वह हर हाल में दावा करेगी, कुछ पर समझौते को तैयार है और कुछ पर फैसला शीर्ष नेतृत्व पर छोड़ा गया है। यह तरीका सही है, क्योंकि 2017 की तरह अंधाधुंध मांग करने की जगह प्राथमिकताएं तय हो रही हैं। कांग्रेस की नजर उन सीटों पर भी है जहां सपा हाल के चुनावों में कमजोर रही है। 2012 के बाद से 100 से ज्यादा विधानसभा सीटें ऐसी हैं जो सपा नहीं जीत पाई। कांग्रेस का तर्क है कि गठबंधन की ताकत बढ़ाने के लिए ये सीटें उसके हिस्से आनी चाहिए। इसमें तर्क है, पर सपा पूछ सकती है कि जहाँ वह नहीं जीत पाई, वहां कांग्रेस के पास जीतने का क्या आधार है।
प्रियंका बनाम राहुल की टीम: संतुलन की चुनौती
कांग्रेस के भीतर शक्ति-संतुलन भी देखने लायक है। प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम को राहुल गांधी के करीबी खेमे का माना जाता है, जबकि नई प्रदेश अध्यक्ष आराधना मिश्रा और कार्यकारी अध्यक्ष इमरान मसूद को प्रियंका के नजदीक बताया जाता है। प्रियंका के पास यूपी का कोई औपचारिक पद नहीं है, पर सीट चयन की बैठकों में उनकी मौजूदगी निर्णायक दिख रही है। इसका दोहरा असर हो सकता है। एक तरफ यह कांग्रेस को बातचीत में सख्ती देगा, क्योंकि कई पर्यवेक्षक प्रियंका को राहुल से ज्यादा कठोर वार्ताकार मानते हैं। दूसरी तरफ अगर प्रदेश इकाई में असंतोष बढ़ा या फैसलों की जिम्मेदारी स्पष्ट नहीं रही, तो सपा को 'कांग्रेस में एक आवाज नहीं है' वाली शिकायत का मौका मिलेगा। सपा के नेता पहले ही कांग्रेस की ओर से देरी और समन्वय समिति न बनने पर नाराजगी जता चुके हैं।
सपा की रणनीति: विकल्प खुले रखना
सपा के लिए स्थिति आसान नहीं है। वह गठबंधन को लेकर सकारात्मक बयान दे रही है, पर सूत्रों के अनुसार सभी 403 सीटों की तैयारी भी कर रही है। यह दबाव की रणनीति भी है और सुरक्षा कवच भी। सपा जानती है कि उसका संगठन और वोट आधार कांग्रेस से कहीं बड़ा है। 2022 के आंकड़े इसकी गवाही देते हैं। फिर भी वह यह भी जानती है कि 2024 में कांग्रेस के साथ मिलकर उसे जो फायदा हुआ, उसे दोहराने का अवसर वह यूं ही नहीं छोड़ सकती। यानी सपा ज्यादा सीटें अपने पास रखना चाहेगी, पर गठबंधन टूटने का जोखिम भी नहीं लेगी।
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कांग्रेस के लिए सवाल 2027 का नहीं 2029 का भी है
संभावित समाधान बीच के रास्ते में दिखता है, जहां कांग्रेस अपनी शुरुआती मांग से काफी नीचे आए और सपा अपने कथित प्रस्ताव से ऊपर। असली सौदा संख्या से ज्यादा सीटों की गुणवत्ता पर होगा। कांग्रेस के लिए चुनौती यह है कि वह वही सीटें ले जहां उसके पास वास्तविक संगठन या सामाजिक आधार हो। प्रियंका को तय करना होगा कि ज्यादा सीटें लेना लक्ष्य है या ज्यादा सीटें जीतना। 2017 और 2022 ने दिखाया है कि दोनों अलग बातें हैं। इसका दूसरा पहलू भी है। जो विश्लेषक कांग्रेस की मांग को अव्यावहारिक कहते हैं, उनके सामने कांग्रेस के समर्थक पूछेंगे कि सहयोगी की दया पर मिली कुछ दर्जन सीटों से पार्टी का पुनर्निर्माण कैसे होगा। कांग्रेस के लिए यूपी में पैर जमाने का सवाल सिर्फ 2027 का नहीं, 2029 का भी है।
अंत में सीट बंटवारा सपा पर निर्भर
अंत में नतीजा इस पर निर्भर करेगा कि सपा अपने हिस्से की कितनी जगह छोड़ने को तैयार होती है और कांग्रेस उस जगह को भरने की क्षमता कितनी दिखा पाती है। एक बात लगभग तय है कि प्रियंका के मैदान में रहते हर सीट पर मोलभाव कड़ा होगा। उस मोलभाव से निकलने वाली सूची ही बताएगी कि यह गठबंधन भाजपा के सामने एक मजबूत विकल्प बनेगा या 2017 की पुनरावृत्ति।
