Houthi Attack On Saudi Arabia: अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम कराने और मध्य पूर्व का 'चौधरी' बनने की कोशिश करने वाला पाकिस्तान अब एक नई मुसीबत में घिर चुका है। ईरान, सऊदी अरब और हूती विद्रोहियों के बीच बढ़ते तनाव ने पाकिस्तान की विदेश नीति को सबसे कठिन परीक्षा के दौर में ला खड़ा किया है। एक तरफ पाकिस्तान का सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौता (Strategic Mutual Defence Agreement) है, वहीं दूसरी ओर उसकी ईरान के साथ लंबी सीमा, व्यापारिक और सुरक्षा संबंधी जरूरतें भी हैं। ऐसे में इस्लामाबाद के लिए किसी एक पक्ष का खुलकर समर्थन करना आसान नहीं है।
हूती विद्रोहियों ने सऊद अरब के खिलाफ खोला मोर्चा। AP
क्यों लड़ रहे हैं सऊदी अरब और हूती विद्रोही?
लगभग 24 घंटे बीत चुके हैं और फिलहाल अमेरिका ने ईरान पर कोई सीधा हमला नहीं किया है। हालांकि, ईरान-अमेरिका तनाव के बीच अब यमन के हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच सीधा टकराव शुरू हो गया है। शुक्रवार को लाल सागर में एक सऊदी मालवाहक जहाज पर हमला हुआ, जिसके बाद पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ गया। हमले के कुछ ही देर बाद सऊदी अरब ने हूती विद्रोहियों के नियंत्रण वाले यमन के हुदैदाह शहर पर हवाई हमले किए।
इसके जवाब में हूतियों ने सऊदी अरब को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि उसने "अपने लिए नर्क के दरवाजे खोल दिए हैं।" हूती विद्रोहियों ने हालिया हमले को सऊदी अरब की सैन्य कार्रवाई और अपनी घोषित नौसैनिक नाकेबंदी का जवाब बताया है। उनके अनुसार, सऊदी से जुड़े जहाजों को इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि वे सऊदी बंदरगाहों के लिए माल ढो रहे थे या हूतियों की घोषित नाकेबंदी का उल्लंघन कर रहे थे।
यमन के सना में सऊदी अरब द्वारा किए गए हमले की तस्वीर। AP
बता दें कि हूती विद्रोही लंबे समय से सऊदी अरब को यमन युद्ध का प्रमुख पक्ष मानते हैं। उनका आरोप है कि सऊदी के सैन्य अभियानों से यमन में भारी तबाही हुई है, इसलिए वे सऊदी के आर्थिक और सामरिक हितों को निशाना बना रहे हैं। लाल सागर दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। तेल टैंकरों पर हमलों से न केवल सऊदी अरब के निर्यात पर असर पड़ता है, बल्कि वैश्विक तेल आपूर्ति और कीमतों पर भी दबाव बनता है। हालिया हमलों के बाद कच्चे तेल की कीमतों में भी उछाल देखा गया।
सऊदी का साथ नहीं छोड़ सकता पाकिस्तान
वहीं, सऊदी अरब और ईरान के बीच बढ़ते टकराव ने पाकिस्तान को असमंजस की स्थिति में ला खड़ा किया है। आखिर क्यों? आइए समझते हैं।
दरअसल, पाकिस्तान न तो खुलकर ईरान का पक्ष ले सकता है और न ही सऊदी अरब का साथ छोड़ सकता है। हाल ही में पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच Pakistan-Saudi Defence Pact पर हस्ताक्षर हुए हैं। इस समझौते के तहत दोनों देशों में से किसी एक पर बाहरी हमला या आक्रामकता को दोनों के खिलाफ हमला माना जाएगा। यह समझौता दशकों से चले आ रहे अनौपचारिक सैन्य सहयोग को औपचारिक रूप देता है। इसमें संयुक्त सैन्य तंत्र, खुफिया जानकारी (Intelligence) साझा करना और सैन्य प्रशिक्षण जैसे प्रावधान शामिल हैं।
सऊदी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के साथ पाकिस्तान पीएम की तस्वीर। AP
अब पाकिस्तान की सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि उसकी ईरान के साथ लगभग 900 किलोमीटर लंबी सीमा लगती है। दोनों देशों के बीच सीमा सुरक्षा, ऊर्जा और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे अहम मुद्दे जुड़े हुए हैं। हाल के घटनाक्रम में पाकिस्तान ने अमेरिका के खिलाफ ईरान के प्रति सहानुभूति भी दिखाई है। ऐसे में उसके लिए किसी एक पक्ष का खुलकर समर्थन करना और भी मुश्किल हो गया है।
ईरान का 'कुंभकरण'
दरअसल, यमन में सक्रिय हूती विद्रोही मुख्य रूप से देश के अल्पसंख्यक ज़ैदी शिया समुदाय से जुड़े एक सशस्त्र संगठन हैं। इस आंदोलन की शुरुआत 1990 के दशक में तत्कालीन राष्ट्रपति अली अब्दुल्ला सालेह की सरकार पर भ्रष्टाचार और भेदभाव के आरोपों के विरोध के रूप में हुई थी। इस संगठन का नाम इसके संस्थापक हुसैन अल-हूती के नाम पर पड़ा। हूती खुद को 'अंसार अल्लाह' यानी 'ईश्वर के समर्थक' भी कहते हैं।
साल 2003 में अमेरिका के नेतृत्व में इराक पर हुए हमले के बाद हूती आंदोलन ने अमेरिका और इजरायल विरोधी रुख को और मुखर किया। संगठन के समर्थकों के बीच अमेरिका और इजरायल के खिलाफ नारे लगाए गए, जो आज भी उनकी वैचारिक पहचान का हिस्सा माने जाते हैं। हूती संगठन खुद को हमास और हिज़्बुल्लाह जैसे समूहों के साथ मिलकर ईरान समर्थित 'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस' (Axis of Resistance) यानी 'प्रतिरोध की धुरी' का हिस्सा मानता है। यह गठजोड़ पश्चिम एशिया में अमेरिका, इजरायल और उनके सहयोगियों के प्रभाव का विरोध करता है।
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ और ईरानी राष्ट्रपति इब्राहिम रायसी की फाइल फोटो। AP
वहीं, हूती विद्रोहियों को लंबे समय से ईरान समर्थित संगठन माना जाता है। हालांकि, ईरान सीधे तौर पर उन्हें हथियार या सैन्य मदद देने की बात स्वीकार नहीं करता, लेकिन अमेरिका, संयुक्त राष्ट्र और कई पश्चिमी देशों का आरोप है कि तेहरान अलग-अलग तरीकों से हूतियों का समर्थन करता है। पश्चिमी देशों का आरोप है कि ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) और उससे जुड़े नेटवर्क हूती लड़ाकों को सैन्य प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराते हैं। ईरान इन आरोपों से इनकार करता है।
हूती विद्रोहियों ने भी ईरान के साथ अपने समर्थन का खुलकर प्रदर्शन किया है और वे अमेरिका जैसी महाशक्ति के खिलाफ ईरान के साथ खड़े रहने की बात करते रहे हैं। इसी संदर्भ में, सरल भाषा में उन्हें ईरान का 'कुंभकरण' कहना एक राजनीतिक उपमा हो सकती है।
ईरान से दुश्मनी नहीं मोल ले सकता पाकिस्तान
अब यह समझना भी जरूरी है कि पाकिस्तान किसी भी कीमत पर तेहरान को नाराज क्यों नहीं कर सकता। दरअसल, पाकिस्तान और ईरान के बीच करीब 900 किलोमीटर लंबी सीमा है। अगर दोनों देशों के रिश्ते बिगड़ते हैं, तो सीमा पर घुसपैठ, आतंकवाद और सुरक्षा चुनौतियां बढ़ सकती हैं।
बलूचिस्तान का बड़ा फैक्टर
दोनों देशों की सीमा पर बलूचिस्तान क्षेत्र है। पाकिस्तान और ईरान, दोनों ही बलूच उग्रवाद की चुनौती का सामना करते हैं। ऐसे में सीमा सुरक्षा और खुफिया जानकारी साझा करने के लिए दोनों देशों के बीच सहयोग जरूरी है। पाकिस्तान लंबे समय से ऊर्जा संकट से जूझ रहा है। ईरान प्राकृतिक गैस और तेल का बड़ा उत्पादक है। ईरान-पाकिस्तान गैस पाइपलाइन जैसी परियोजनाएं भले ही पूरी न हो सकी हों, लेकिन पाकिस्तान के लिए ईरान भविष्य का एक महत्वपूर्ण ऊर्जा स्रोत माना जाता है।
व्यापारिक रिश्ते भी अहम
दोनों देशों के बीच सीमा पार व्यापार होता है। यदि रिश्ते खराब होते हैं, तो इसका असर व्यापार और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। पाकिस्तान के सबसे करीबी सहयोगियों में सऊदी अरब शामिल है, जबकि ईरान उसका पड़ोसी देश है। इस्लामाबाद दोनों देशों के साथ रिश्ते बनाए रखना चाहता है। अगर वह खुलकर ईरान के खिलाफ खड़ा होता है, तो क्षेत्रीय तनाव में खुद भी फंस सकता है।
इतना ही नहीं, पाकिस्तान में बड़ी संख्या में शिया और सुन्नी समुदाय रहते हैं। ईरान के साथ तनाव बढ़ने का असर देश के भीतर सांप्रदायिक माहौल पर भी पड़ सकता है।
कुल मिलाकर, पाकिस्तान के सामने 'एक तरफ कुआं, दूसरी तरफ खाई' जैसी स्थिति बन गई है। अब उसके लिए किसी भी पक्ष का खुलकर समर्थन करना आसान नहीं है और उसे बेहद संतुलित कूटनीति अपनानी होगी।
