Times Now Navbharat
live-tv
Premium

सैन्य गठजोड़ से खुफिया साझेदारी तक, कुवैत-PAK डिफेंस डील में क्या है? जानें एक के बाद एक डिफेंस डील क्यों कर रहे खाड़ी देश

सऊदी अरब-पाकिस्तान के बीच हुए इस रक्षा समझौते के बाद खाड़ी के देश अपने लिए एक उपयुक्त रक्षा करार की तलाश में हैं। कुवैत-पाकिस्तान के बीच हुए रक्षा करार को एक्सपर्ट मानते हैं कि यह खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के सुरक्षा ढांचे में व्यापक असर डाल सकता है।

Image
कुवैत-पाकिस्तान के बीच रक्षा समझौता।
Written by: Alok Rao
Updated Jul 29, 2026, 14:46 IST
Follow on Google News

Pakistan Kuwait Defence Deal: वैश्विक स्तर पर भू-राजनीति तेजी से बदल रही है। देशों के बीच नए-नए समीकरण और गठजोड़ बन रह हैं और देश अपनी सुरक्षा को लेकर डरे हुए हैं। अपनी सुरक्षा का आकलन करने के बाद वे नए-नए रक्षा समझौते कर रहे हैं। अब इस कड़ी में नया नाम कुवैत का जुड़ गया है। खाड़ी के इस देश ने पाकिस्तान के साथ पांच साल के लिए अपने रक्षा समझौते पर आधिकारिक मुहर लगा दी है। दरअसल, पाकिस्तान और कुवैत के बीच रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर जून 2023 में हुआ था लेकिन यह ठंडे बस्ते में था लेकिन ईरान-अमेरिका युद्ध और अपने ऊपर हमले को देखते हुए कुवैत इस्लामाबाद के साथ अपनी डील पर आगे बढ़ा है। इससे पहले सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच रक्षा समझौता हो चुका है। सितंबर 2025 में इस्लामाबाद के साथ उसने स्ट्रटेजिक म्यूचुअल डिफेंस अग्रीमेंट (SMDA) पर हस्ताक्षर किए। इस रक्षा समझौता NATO की तर्ज पर हुआ है। यह समझौता कहता है कि पाकिस्तान पर हमला सऊदी अरब पर हमला और सऊदी अरब पर हमला पाकिस्तान पर हमला माना जाएगा।

GCC के सुरक्षा ढांचे पर असर डालेगा यह रक्षा करार!

सऊदी अरब-पाकिस्तान के बीच हुए इस रक्षा समझौते के बाद खाड़ी के देश अपने लिए एक उपयुक्त रक्षा करार की तलाश में हैं। कुवैत-पाकिस्तान के बीच हुए रक्षा करार को एक्सपर्ट मानते हैं कि यह खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के सुरक्षा ढांचे में व्यापक असर डाल सकता है। साथ ही इस रक्षा करार की टाइमिंग पर भी सवाल उठ रहे हैं। सवाल है कि क्या ये सिर्फ एक सामान्य कूटनीतिक पहल है, या गल्फ में पाकिस्तान की एंट्री का एक नया, बड़ा चैप्टर शुरू हो रहा है? कुवैत की सरकारी गजट 'कुवैत अल-यौम' में रविवार को एक डिक्री-लॉ 'डिक्री नंबर 73, साल 2026' पब्लिश हुआ। इसी के जरिए कुवैत ने पाकिस्तान के साथ हुए डिफेंस कोऑपरेशन एग्रीमेंट को औपचारिक मंजूरी दी।

ये कोई नया समझौता नहीं है। ये एग्रीमेंट असल में 11 जून 2023 को कुवैत सिटी में साइन हुआ था। यानी साइनिंग और रैटिफिकेशन के बीच पूरे तीन साल का गैप रहा। डिप्लोमैटिक भाषा में इसे 'डोरमेंट एग्रीमेंट' कहते हैं यानी समझौता कागज पर मौजूद था, लेकिन औपचारिक तौर पर लागू नहीं हुआ था। अब सवाल उठता है तीन साल बाद अचानक इसे लागू क्यों किया गया? इसका जवाब समझने के लिए हमें क्षेत्रीय संदर्भों के बारे में जानना होगा।

इस रक्षा करार का दायरा काफी बड़ा है। इसमें शामिल है:

  • दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे को ट्रेनिंग देंगी
  • खुफिया जानकारी का आदान-प्रदान
  • लॉजिस्टिक्स कोऑपरेशन
  • डिफेंस टेक्नोलॉजी और रिसर्च में सहयोग
  • सैन्य उपकरण निर्माण में साझेदारी
  • इलेक्ट्रॉनिक कम्युनिकेशन सिस्टम्स

करार के तहत एक ज्वाइंट मिलिट्री कमेटी बनेगी, जो इस पूरे करार की निगरानी करेगी। जॉइंट मिलिट्री एक्सरसाइज, आधिकारिक दौरे और बाकी कार्यक्रमों की योजना इसी कमेटी के जरिए बनेगी। यह समझौता पांच साल के लिए वैध होगा और अगर कोई भी पक्ष इसे खत्म करने का फैसला नहीं लेता, तो ये खुद ही दोबारा सक्रिय हो जाएगा। साथ ही, दोनों देशों ने कॉन्फिडेंशियल मिलिट्री इन्फॉर्मेशन की सुरक्षा और किसी भी विवाद को डिप्लोमैटिक चैनल से सुलझाने की बात भी शामिल की है।

यह NATO जैसा पारस्परिक रक्षा समझौता नहीं

यहां यह समझना जरूरी है कि यह कोई NATO जैसा पारस्परिक रक्षा समझौता नहीं है। इसमें ऐसी कोई शर्त नहीं है कि एक देश पर हमला होने पर दूसरा देश अपने आप जंग में कूद पड़ेगा। ये एक ट्रेनिंग, इंटेलिजेंस और टेक्नोलॉजी पर केंद्रित एक इंस्टीट्यूशनल कोऑपरेशन फ्रेमवर्क है। दूसरा सवाल है कि यह समझौता अभी लागू क्यों हुआ? पिछले कुछ महीनों में खाड़ी देशों में सुरक्षा का मसला काफी गंभीर हो गया है। ईरान और अमेरिका के बीच जंग के दौरान, ईरान ने खाड़ी के कई देशों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए और कुवैत भी इसका निशाना बना। कुवैती अधिकारियों का कहना है कि उनके एयर डिफेंस सिस्टम ने कुवैती एयरस्पेस में घुसे प्रोजेक्टाइल्स को इंटरसेप्ट किया, जबकि तेहरान का दावा था कि उसके निशाने पर गल्फ में मौजूद अमेरिकी मिलिट्री फैसिलिटीज थीं।

कुवैत- पाक सैन्य अफसरों के बीच हुईं बैठकें

यानी कुवैत खुद को एक ऐसे क्षेत्र में पा रहा है, जहां अमेरिका पर पूरी तरह निर्भर रहना अब पहले जितना भरोसेमंद नहीं लगता। ऐसे माहौल में, पाकिस्तान जैसे न्यूक्लियर-आर्म्ड, मुस्लिम-मेजॉरिटी मिलिट्री पावर के साथ रिश्ते मजबूत करना कुवैत के लिए एक हेजिंग स्ट्रैटेजी की तरह देखा जा रहा है। यानी अपने सारे अंडे एक टोकरी में न रखने की पॉलिसी। रैटिफिकेशन से ठीक पहले, कुवैती और पाकिस्तानी मिलिट्री अधिकारियों के बीच लगातार उच्च स्तर की बातचीत भी हुई जो इस बात को और पुख्ता करती है कि ये टाइमिंग जानबूझकर चुनी गई। अब यहां एक और बात समझनी जरूरी है कि सितंबर 2025 में, सऊदी अरब और पाकिस्तान ने एक स्ट्रैटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट (SMDA) साइन किया था और उसमें NATO के आर्टिकल-5 जैसी शर्त शामिल थी, यानी एक देश पर हमला दोनों पर हमला माना जाएगा। ये पैक्ट पाकिस्तान-भारत के बीच मई 2025 के मिलिट्री टकराव के कुछ ही महीनों बाद आया था।

कुवैत वाला रक्षा समझौता उतना गहरा नहीं

तो क्या कुवैत भी उसी दिशा में बढ़ रहा है? फिलहाल के लिए, कुवैत वाला रक्षा समझौता उतना गहरा नहीं है इसमें म्यूचुअल डिफेंस क्लॉज नहीं है। लेकिन ट्रेंड साफ नजर आता है। पाकिस्तान अब सिर्फ गल्फ देशों को सैनिक और ट्रेनर सप्लाई करने वाला देश नहीं रह गया, बल्कि एक डायरेक्ट सिक्योरिटी स्टेकहोल्डर के तौर पर उभर रहा है। कुछ पाकिस्तानी रणनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के समझौतों से गल्फ मिलिट्री में एक नए और भरोसेमंद पार्टनर के रूप में पाकिस्तान की भूमिका बढ़ेगी। जब सऊदी-पाकिस्तान रक्षा समझौता हुआ तब भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा था कि वह राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता पर पड़ने वाले असर का अध्ययन करेगा। भारत अपने राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। कुवैत-पाकिस्तान रक्षा समझौते से भारत पर कोई सीधा असर तो नहीं पड़ेगा लेकिन खाड़ी देशों का पाकिस्तान के साथ बढ़ता सैन्य सहयोग भारतीयों हितों के लिए उचित नहीं है।

खुद को एक अहम खिलाड़ी के रूप में पेश कर रहा PAK

भारत ने पिछले एक दशक में खाड़ी देशों, खासकर सऊदी अरब और UAE के साथ रिश्ते बहुत मजबूत किए हैं। इंडिया-मिडल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर यानी IMEC जैसी बड़ी परियोजनाएं इसी पार्टनरशिप पर टिकी हैं। अगर पाकिस्तान गल्फ में अपनी मिलिट्री पोजिशन मजबूत करता है, तो इससे भारत की गल्फ डिप्लोमेसी पर असर पड़ने की आशंका जताई जाती है और कश्मीर जैसे मुद्दों पर इस्लामिक देशों के मंचों पर पाकिस्तान की आवाज भी मजबूत हो सकती है। कुवैत वाले इस ताजा समझौते पर भारत सरकार की तरफ से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। कुवैत-पाकिस्तान डिफेंस पैक्ट अभी सऊदी वाले पैक्ट जितना दूरगामी नहीं है लेकिन टाइमिंग और ट्रेंड दोनों यही इशारा करते हैं कि गल्फ के देश, अमेरिका पर अपनी निर्भरता कम कर रहे हैं और पाकिस्तान इस नए समीकरण में खुद को एक अहम खिलाड़ी के तौर पर पेश करने में जुटा है।

End of Article