'एक भारतीय ने 9/11 जैसी त्रासदी को होने से रोक दिया।' इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की यह बात फ्लाईदुबई की उस घटना के बाद आई, जिसमें भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मच्छार पर हमला हुआ और विमान को सुरक्षित बचाने की कोशिश के दौरान 174 यात्रियों की जान बच गई। इस घटना ने एक बार फिर सवाल खड़ा किया कि इंसान आखिर किस दिशा में आगे बढ़ रहा है। तरक्की और तकनीक की तरफ या हिंसा और विनाश की तरफ?
आज दुनिया की तस्वीर भी कुछ ऐसी ही है। रूस-यूक्रेन युद्ध अब भी जारी है और हाल के दिनों में यूक्रेन पर रूसी हमले थमने का नाम नहीं ले रहे। दूसरी ओर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव और बातचीत के प्रयासों के बीच टकराव का खतरा बना हुआ है। ऐसे समय में 2 अक्टूबर को जब दुनिया महात्मा गांधी की जयंती मना रही है, तो सवाल है कि जिस दुनिया के लिए महात्मा गांधी ने सत्य, अहिंसा, संवाद और इंसानी गरिमा की बात की थी, क्या आज की दुनिया को उन विचारों की पहले से ज्यादा जरूरत है?
महात्मा गांधी की प्रतिमा की फोटो। istock
कमजोरी नहीं, ताकत थी गांधी की अहिंसा
महात्मा गांधी की पूरी विचारधारा के केंद्र में सत्य और अहिंसा थे। उनके लिए अहिंसा का मतलब केवल किसी पर हमला नहीं करना नहीं था, बल्कि विरोधी के प्रति भी इंसानियत बनाए रखना था। महात्मा गांधी मानते थे कि किसी अन्याय का विरोध जरूरी है, लेकिन उस विरोध का रास्ता हिंसा ही हो, यह जरूरी नहीं। सत्याग्रह इसी सोच से निकला, अन्याय के खिलाफ दृढ़ता से खड़े होना, लेकिन हिंसा को रास्ता न बनाना। संयुक्त राष्ट्र भी 2 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में मनाता है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, इस दिन का उद्देश्य अहिंसा, शांति, सहिष्णुता और समझ का संदेश फैलाना है।
रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच गांधी का सवाल
पिछले साढ़े चार साल से रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध निरंतर जारी है। इस युद्ध में अब तक 5 लाख से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। वहीं, लाखों लोगों की जिंदगी को प्रभावित किया है। अक्टूबर 2026 की शुरुआत में भी यूक्रेन के कई इलाकों में रूसी ड्रोन हमले और जवाबी कार्रवाई की खबरें सामने आई हैं। अहिंसा को हथियार बनाकर जिन्होंने भारत को 200 साल तक गुलाम बनाकर रखने वाले ब्रिटिश साम्राज्य को जड़ से उखाड़ कर फेंक दिया। उनके विचारों पर चलने की जरूरत सबसे ज्यादा जरूरत तो रूस और यूक्रेन को ही है।
रूस-यूक्रेन युद्ध में घायल हुए सैनिक की तस्वीर। AP
इसमें कोई दो राय नहीं कि युद्ध के दौरान हर पक्ष अपनी सुरक्षा और अपने हितों को प्राथमिकता देता है, लेकिन महात्मा गांधी की सोच एक अलग सवाल पूछती है कि क्या किसी संघर्ष का अंतिम समाधान केवल ताकत बढ़ाकर हासिल किया जा सकता है? भले ही यहां महात्मा गांधी का विचार किसी युद्ध का तत्काल समाधान नहीं देता, लेकिन वह संघर्ष के मूल कारणों, संवाद और शांतिपूर्ण समाधान की जरूरत पर ध्यान खींचता है।
अमेरिका-ईरान तनाव और बातचीत की जरूरत
मध्य पूर्व में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव भी लगातार वैश्विक चिंता का विषय बना हुआ है। हाल में दोनों पक्षों के बीच तनाव कम करने के लिए कूटनीतिक प्रयासों की खबरें सामने आई हैं, लेकिन टकराव का खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का दो टूक कहना है कि वो किसी भी हाल में ईरान को परमाणु संपन्न देश बनना नहीं देना चाहते। वहीं, ईरान अडिग है कि वो अमेरिका के सामने नहीं झुकने वाला।
भले ही अमेरिका सुपरपावर है, जिसके सामने युद्ध के मैदान में ईरान की हार निश्चित है, लेकिन अमेरिका बापू के इस विचार पर जरूर गौर करना चाहिए कि अहिंसा कायरों का नहीं, बल्कि बहादुरों का गहना है। 'आंख के बदले आंख' की सोच एक दिन पूरी दुनिया को अंधा बना देगी। दरअसल, महात्मा गांधी की सोच में बातचीत और विरोधी को समझने की कोशिश का खास महत्व था। उनका मानना था कि मतभेद होना और दुश्मनी होना एक ही बात नहीं है।
ईरान में पूर्व अमेरिकी दूतावास (जो अब एक संग्रहालय है) के दीवार की तस्वीर। AP
आज की अंतरराष्ट्रीय राजनीति में यह सिद्धांत लागू करना आसान नहीं है। देशों के सुरक्षा हित, सीमाएं, सैन्य ताकत और रणनीतिक समीकरण बेहद जटिल हैं। फिर भी संवाद का रास्ता बंद हो जाने के बाद संघर्ष के विकल्प अक्सर और कठिन हो जाते हैं।
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान महात्मा गांधी ने कहा था कि हिटलर, स्टालिन और मुसोलिनी एक बार फिर यह साबित करेंगे कि हिंसा कितनी खोखली है। उनके अनुसार, हिंसा का असर भले ही तत्काल दिखाई दे, लेकिन वह क्षणिक होता है और पीछे नफरत और विनाश छोड़ जाता है। इसके विपरीत, उनके विचार में बुद्ध की अहिंसक कार्रवाई का प्रभाव लंबे समय तक बना रहता है और समय के साथ बढ़ता है।
महात्मा गांधी ने 1909 में अपनी किताब ‘हिंद स्वराज’ में ही मानवता को चेतावनी दी थी कि सिद्धांतों से रहित विकास इंसान को विनाश के कगार पर पहुंचा सकता है। उस समय उनके करीबी सहयोगियों में से कई लोग भी उनकी इस सोच से पूरी तरह सहमत नहीं थे।
क्या ताकत ही सुरक्षा की गारंटी है?
आज दुनिया के पास परमाणु हथियार हैं, अत्याधुनिक मिसाइलें हैं, ड्रोन हैं और ऐसी तकनीक है जो कुछ मिनटों में हजारों किलोमीटर दूर तक तबाही पहुंचा सकती है, लेकिन हथियारों की बढ़ती ताकत के साथ एक विरोधाभास भी सामने आता है, जितनी ज्यादा विनाश की क्षमता, उतना जोखिम भी बड़ा होता है। हालिया वैश्विक तनावों में परमाणु हथियारों की चेतावनियां भी सामने आई हैं। ऐसे माहौल में गांधी की अहिंसा को केवल एक ऐतिहासिक विचार के रूप में नहीं, बल्कि संघर्ष को बढ़ने से रोकने वाली नैतिक सोच के रूप में भी देखा जा सकता है।
नफरत के दौर में गांधी की प्रासंगिकता
आज सोशल मीडिया ने लोगों को जोड़ने का काम किया है, लेकिन उसी के साथ गलत सूचना, नफरत और ध्रुवीकरण तेजी से फैलने की चुनौती भी सामने आई है। गांधी का सत्य पर जोर इस संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाता है। उनके लिए सत्य केवल बोलने की चीज नहीं था, बल्कि जीवन जीने का सिद्धांत था। आज के डिजिटल दौर में इसका अर्थ यह सवाल पूछना भी हो सकता है, जो खबर हम पढ़ रहे हैं, क्या वह सच है? जिसे हम आगे बढ़ा रहे हैं, क्या वह सही है? और क्या हमारी भाषा किसी दूसरे इंसान के खिलाफ नफरत को बढ़ा रही है?
एक आंख के बदले आंख ही पूरी दुनिया को अंधा बना कर समाप्त होता है: महात्मा गांधी।
क्या गांधी आज की दुनिया की हर समस्या का समाधान हैं?
इसका जवाब तो शायद न है क्योंकि 21वीं सदी की दुनिया गांधी के समय से बिल्कुल अलग है। आज परमाणु हथियार हैं, साइबर युद्ध है, ड्रोन युद्ध है, वैश्विक आतंकवाद है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता है और देशों के बीच बेहद जटिल आर्थिक-सामरिक रिश्ते हैं। इसलिए गांधी के विचारों को आज की हर समस्या पर सीधे लागू करना आसान नहीं है।
लेकिन उनकी प्रासंगिकता शायद किसी तैयार जवाब में नहीं, बल्कि उन सवालों में है जो उनकी विचारधारा हमें पूछने के लिए मजबूर करती है। क्या ताकत के साथ जिम्मेदारी भी जरूरी है? क्या विरोध बिना नफरत के हो सकता है? क्या दुश्मन को खत्म किए बिना संघर्ष खत्म किया जा सकता है? क्या विकास इंसान और प्रकृति दोनों के लिए हो सकता है?
महात्मा गांधी की प्रासंगिकता पर दुनिया में मतभेद हो सकते हैं। लेकिन 2 अक्टूबर को संयुक्त राष्ट्र का अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में इस दिन को मानना यह दिखाता है कि अहिंसा का विचार भारत की सीमाओं से बाहर भी एक वैश्विक विषय बन चुका है।
आज जब दुनिया युद्ध, अशांति, हिंसा और अविश्वास से जूझ रही है, तब गांधी की सबसे बड़ी प्रासंगिकता शायद यही है कि वे हमें जीतने से पहले यह सोचने को कहते हैं कि जीत की कीमत क्या होगी। क्योंकि दुनिया चाहे कितनी भी आधुनिक हो जाए, अंत में सवाल वही रहेगा। इंसान के पास दुनिया को खत्म करने की ताकत ज्यादा होनी चाहिए या उसे बचाने की समझ? बापू यह समझाने की कोशिश करते थे कि युद्ध कभी किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं कर सकते। संवाद ही हर वैश्विक समस्या का आखिरी समाधान है।
