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क्या है ईरान का ‘प्रॉक्सी नेटवर्क’? जानिए हिजबुल्लाह से हूती तक, मिडिल ईस्ट में कितनी ताकत रखता है तेहरान

Iran Proxy Network: ईरान मध्य पूर्व में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए सीधे युद्ध के बजाय प्रॉक्सी नेटवर्क का इस्तेमाल करता है। 'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस' के तहत हिजबुल्लाह, हूती, हमास और इराकी मिलिशिया जैसे कई समूह ईरान से समर्थन प्राप्त करते हैं। ईरान इन संगठनों को हथियार, फंडिंग और ट्रेनिंग देकर अपने विरोधियों पर दबाव बनाए रखता है।

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मिडिल ईस्ट की राजनीति और सुरक्षा पर क्या पड़ रहा है असर (Photo: AI Generated)
Authored by: monu jha
Updated May 8, 2026, 09:00 IST
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Iran Proxy Network: मध्य पूर्व की राजनीति और संघर्षों में ईरान लंबे समय से एक बड़ा खिलाड़ी माना जाता है। हालांकि पारंपरिक सैन्य ताकत के मामले में ईरान अमेरिका या इजराइल जैसे देशों की बराबरी नहीं करता, लेकिन उसने क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए एक अलग रणनीति अपनाई है। इस रणनीति को 'प्रॉक्सी नेटवर्क' या 'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस' कहा जाता है।

सरल भाषा में समझें तो ईरान (Iran Middle East Strategy) सीधे युद्ध लड़ने के बजाय दूसरे देशों में मौजूद ऐसे संगठनों और मिलिशिया समूहों को समर्थन देता है, जो उसके हितों के अनुसार काम करते हैं। ईरान की इस नीति का मुख्य उद्देश्य अपने विरोधियों खासकर इजराइल, अमेरिका और कुछ खाड़ी देशों पर दबाव बनाए रखना है।

क्या है ‘एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस’?

'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस' उन संगठनों और हथियारबंद समूहों का नेटवर्क है, जिन्हें ईरान राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य मदद देता है। इस नेटवर्क को संभालने में ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) की कुद्स फोर्स अहम भूमिका निभाती है।

कुद्स फोर्स इन समूहों को हथियार, ट्रेनिंग, फंडिंग और रणनीतिक सलाह देती है। इससे ईरान बिना सीधे युद्ध में उतरे अपने दुश्मनों पर दबाव बना पाता है। इसे “फॉरवर्ड डिफेंस” या असममित युद्ध की रणनीति भी कहा जाता है।

(Photo: AP)

(Photo: AP)

किन देशों में फैला है ईरान का नेटवर्क?

ईरान का सबसे मजबूत सहयोगी लेबनान का हिजबुल्लाह माना जाता है। यह संगठन सिर्फ सैन्य ताकत ही नहीं, बल्कि लेबनान की राजनीति में भी गहरा प्रभाव रखता है। इजराइल की सीमा के पास इसकी मजबूत मौजूदगी लंबे समय से तनाव का कारण रही है। यमन में हूती विद्रोही समूह ईरान के करीबी माने जाते हैं। इन पर आरोप है कि इन्हें ईरान से मिसाइल और ड्रोन तकनीक मिलती है। लाल सागर और बाब-अल-मंदब जैसे अहम समुद्री रास्तों पर हमलों के कारण हूती लगातार चर्चा में रहे हैं।

इराक में पॉपुलर मोबिलाइजेशन फोर्सेज (PMF) के कई गुट ईरान समर्थक माने जाते हैं। इनमें कताइब हिजबुल्लाह और बद्र ऑर्गेनाइजेशन जैसे संगठन शामिल हैं। हालांकि PMF आधिकारिक तौर पर इराकी सुरक्षा ढांचे का हिस्सा है, लेकिन कई गुटों पर ईरान के प्रति ज्यादा वफादार होने के आरोप लगते रहे हैं। फिलिस्तीन में हमास और फिलिस्तीनी इस्लामिक जिहाद जैसे समूहों को भी ईरान समर्थन देता है।

खास बात यह है कि ये सुन्नी संगठन हैं, जबकि ईरान शिया बहुल देश है। इसके बावजूद इजराइल विरोध के कारण इनके बीच सहयोग बना हुआ है। सीरिया में भी ईरान लंबे समय तक राष्ट्रपति बशर अल-असद की सरकार का समर्थक रहा। यहां ईरान समर्थित शिया मिलिशिया सक्रिय रही हैं, हालांकि हाल के वर्षों में वहां की स्थिति काफी बदली है।

(Photo: PTI)

(Photo: PTI)

कितनी बड़ी है इन समूहों की ताकत?

इन संगठनों के लड़ाकों की संख्या को लेकर अलग-अलग अनुमान हैं। हिजबुल्लाह को सबसे प्रशिक्षित और संगठित समूह माना जाता है। उसके पास हजारों लड़ाके और बड़ी मात्रा में रॉकेट तथा मिसाइलें होने की बात कही जाती रही है।

इराक की PMF में लाखों तक लड़ाकों के होने के अनुमान लगाए जाते हैं, हालांकि इनमें सभी सीधे ईरान समर्थक नहीं हैं। हमास और हूती जैसे संगठनों के पास भी हजारों प्रशिक्षित लड़ाके मौजूद हैं।

ईरान इन समूहों को छोटे हथियारों से लेकर ड्रोन, रॉकेट, एंटी-टैंक मिसाइल और अन्य सैन्य उपकरण उपलब्ध कराता है। कई बार हथियार सीधे भेजने के बजाय तकनीक और पार्ट्स उपलब्ध कराए जाते हैं ताकि स्थानीय स्तर पर निर्माण किया जा सके।

(Photo: AP)

(Photo: AP)

हाल के संघर्षों का क्या असर पड़ा?

2023 के बाद से मध्य पूर्व में हुए संघर्षों ने इस नेटवर्क को काफी प्रभावित किया है। गाजा युद्ध, लेबनान सीमा पर बढ़े संघर्ष और ईरान से जुड़े सैन्य तनावों के कारण कई समूहों को भारी नुकसान उठाना पड़ा।

हिजबुल्लाह की सैन्य क्षमता कमजोर होने और उसके कई नेताओं के मारे जाने की खबरें सामने आईं। हमास और अन्य समूहों को भी लगातार सैन्य दबाव झेलना पड़ा। सीरिया में राजनीतिक बदलावों ने ईरान के सप्लाई रूट्स को भी प्रभावित किया है।

फिर भी विशेषज्ञ मानते हैं कि यह नेटवर्क पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। ईरान के लिए यह अभी भी एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साधन बना हुआ है। हालांकि अब इन संगठनों के सामने संसाधनों की कमी, बढ़ते सैन्य दबाव और स्थानीय राजनीतिक चुनौतियां भी हैं।

ईरान के लिए क्यों अहम है यह रणनीति?

ईरान जानता है कि सीधे बड़े युद्ध में उतरना उसके लिए भारी पड़ सकता है। इसलिए वह ऐसे समूहों के जरिए क्षेत्रीय प्रभाव बनाए रखने की कोशिश करता है। इससे उसे 'डिनाएबिलिटी' भी मिलती है, यानी किसी हमले या कार्रवाई में सीधे शामिल होने से इनकार करने की गुंजाइश बनी रहती है।

मध्य पूर्व की बदलती राजनीति में यह नेटवर्क आने वाले समय में कितना प्रभावी रहेगा, यह कई कारकों पर निर्भर करेगा। लेकिन फिलहाल इतना साफ है कि ईरान की क्षेत्रीय रणनीति में प्रॉक्सी नेटवर्क की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण बनी हुई है।

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