नीट पेपर लीक को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी लगातार धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रही है।
मी टू आरोपों के बीच एम.जे. अकबर ने 2018 में विदेश राज्य मंत्री पद से इस्तीफा दिया था।
CJP Protest: नीट पेपर लीक को लेकर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर देश के अलग-अलग शहरों में प्रदर्शन हो रहे हैं। गुरुवार देर रात सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने 26 दिनों बाद अपना अनशन तोड़ दिया। हालांकि, कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का विरोध प्रदर्शन अब भी जारी है। प्रदर्शनकारियों की मांग है कि नीट पेपर लीक की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें।
हालांकि, उनकी मांगें कई हैं, लेकिन शिक्षा मंत्री का इस्तीफा सबसे प्रमुख मांग है। गौरतलब है कि मोदी सरकार फिलहाल धर्मेंद्र प्रधान को शिक्षा मंत्री के पद से हटाने के मूड में नहीं दिख रही है। वहीं, विपक्षी दल भी इसे "नैतिक जिम्मेदारी" का मामला बताते हुए उनके इस्तीफे की मांग कर रहे हैं।
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफा की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे छात्र। PTI
ऐसे में आइए जानते हैं कि अतीत में भारत में कब-कब और किन-किन मंत्रियों ने अपने पद से इस्तीफा दिया।
लाल बहादुर शास्त्री (1956)
देश में नैतिक जिम्मेदारी के आधार पर इस्तीफा देने का सबसे चर्चित और ऐतिहासिक उदाहरण पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री माने जाते हैं। उस समय वह देश के रेल मंत्री थे। नवंबर 1956 में तमिलनाडु के अरियालुर रेल हादसे में 150 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी। यह उस दौर की सबसे भीषण रेल दुर्घटनाओं में से एक थी। हादसे के बाद रेलवे की कार्यप्रणाली और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठे।
हालांकि इस दुर्घटना के लिए शास्त्री को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया गया था, लेकिन उन्होंने रेल मंत्री होने के नाते इसकी नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार की और अपने पद से इस्तीफा दे दिया। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू शुरुआत में उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं करना चाहते थे, लेकिन शास्त्री अपने फैसले पर अडिग रहे। आखिरकार नेहरू ने उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया। भारतीय राजनीति में यह घटना आज भी जवाबदेही, नैतिकता और सार्वजनिक जीवन में जिम्मेदारी निभाने के सबसे बड़े उदाहरणों में गिनी जाती है।
रेल हादसे के बाद लाल बहादुर शास्त्री ने दिया था अपने पद से इस्तीफा।
टी. टी. कृष्णमाचारी (1958)
1957 में सामने आए एलआईसी–मूंधड़ा घोटाले ने देश की राजनीति में बड़ा विवाद खड़ा कर दिया था। आरोप था कि भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) ने उद्योगपति हरिदास मूंधड़ा की घाटे में चल रही कंपनियों के शेयर सरकारी दबाव में खरीदे। यह मामला संसद में कांग्रेस सांसद फिरोज गांधी ने उठाया, जिसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने न्यायमूर्ति एम.सी. छागला की अध्यक्षता में जांच आयोग गठित किया।
जांच आयोग ने वित्त मंत्रालय की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। हालांकि, तत्कालीन वित्त मंत्री टी. टी. कृष्णमाचारी पर व्यक्तिगत भ्रष्टाचार का आरोप साबित नहीं हुआ, लेकिन उन्होंने मंत्रालय की नैतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए 18 फरवरी 1958 को अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उनका इस्तीफा भारतीय राजनीति में जवाबदेही का एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है।
वी.के. कृष्ण मेनन (1962)
1962 के भारत-चीन युद्ध में सैन्य तैयारियों को लेकर उठे सवालों के बीच तत्कालीन रक्षा मंत्री वी.के. कृष्ण मेनन ने पद छोड़ दिया। युद्ध में भारत की शुरुआती असफलताओं की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उनका इस्तीफा भारतीय राजनीतिक इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं में गिना जाता है।चीन युद्ध के बाद वी.के. कृष्ण मेनन ने रक्षा मंत्री का पद छोड़ दिया था।
नीतीश कुमार (1999)
2 अगस्त 1999 को पश्चिम बंगाल के गैसल रेल हादसे ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। इस दुर्घटना में ब्रह्मपुत्र मेल और अवध असम एक्सप्रेस की टक्कर हो गई, जिसमें करीब 300 लोगों की मौत हुई और सैकड़ों यात्री घायल हो गए। यह भारतीय रेलवे के इतिहास की सबसे भीषण दुर्घटनाओं में से एक मानी जाती है। हादसे के बाद रेलवे की सुरक्षा व्यवस्था और संचालन पर गंभीर सवाल उठे।
उस समय केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी और नितीश कुमार रेल मंत्री थे। हालांकि हादसे के लिए उन्हें व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया गया था, लेकिन उन्होंने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया। नितीश कुमार का यह कदम भारतीय राजनीति में जवाबदेही और नैतिक उत्तरदायित्व के प्रमुख उदाहरणों में गिना जाता है।
साल 1999 में नीतीश कुमार ने रेल मंत्री से दिया था इस्तीफा।
शिवराज पाटिल (2008)
26 नवंबर 2008 को मुंबई में हुए आतंकी हमलों (26/11) ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। इस हमले में 160 से अधिक लोगों की मौत हुई और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर केंद्र सरकार की कड़ी आलोचना हुई। हमलों के बाद तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री शिवराज पाटिल पर सुरक्षा तैयारियों में कमी और खुफिया तंत्र की विफलता को लेकर विपक्ष और जनता का दबाव बढ़ने लगा।
बढ़ते राजनीतिक दबाव और जवाबदेही के सवालों के बीच शिवराज पाटिल ने 30 नवंबर 2008 को केंद्रीय गृह मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। हालांकि, उन्होंने हमलों की पूरी जिम्मेदारी सीधे अपने ऊपर नहीं ली, लेकिन इसे सुरक्षा चूक की नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करने वाला कदम माना गया। उनके इस्तीफे के बाद पी. चिदंबरम को देश का नया गृह मंत्री बनाया गया।
अश्विनी कुमार (2013)
कोयला ब्लॉक आवंटन (कोलगेट) मामले में सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी के बाद तत्कालीन कानून मंत्री अश्विनी कुमार ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। यह मामला किसी दुर्घटना से जुड़ा नहीं था, लेकिन जवाबदेही के सिद्धांत के तहत इसे महत्वपूर्ण इस्तीफों में गिना जाता है।
एम.जे. अकबर (2018)
इस्तीफा देने वाले मंत्रियों में पूर्व केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री एम.जे. अकबर का नाम भी शामिल है। #MeToo अभियान के दौरान लगे यौन उत्पीड़न के आरोपों के बीच उन्होंने विदेश राज्य मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था।
अक्टूबर 2018 में भारत में #MeToo आंदोलन के दौरान कई महिला पत्रकारों ने एम.जे. अकबर पर यौन उत्पीड़न और अनुचित व्यवहार के आरोप लगाए। कुछ ही दिनों में आरोप लगाने वाली महिलाओं की संख्या बढ़ती गई, जिससे उनके इस्तीफे की मांग तेज हो गई। शुरुआत में उन्होंने आरोपों को निराधार बताया और कानूनी लड़ाई लड़ने की बात कही, लेकिन बढ़ते दबाव के बीच उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।
यौन उत्पीड़न का आरोप लगने के बाद एमजे अकबर ने दिया था मंत्री पद से इस्तीफा। PTI
इसके बाद लगभग 20 महिला पत्रकार उनके खिलाफ अदालत में सामने आईं और गवाही देने को तैयार हुईं। उस समय अकबर पर इस्तीफे का लगातार दबाव था। इसी दौरान केंद्र सरकार ने #MeToo से जुड़े मामलों की समीक्षा के लिए रिटायर्ड जजों की कमेटी के बजाय मंत्रियों के एक समूह के गठन पर भी विचार किया था।
साल 2014 से अब तक मोदी सरकार में व्यापक स्तर पर मंत्रियों के इस्तीफे नहीं हुए हैं, लेकिन समय-समय पर कैबिनेट विस्तार और फेरबदल के जरिए कई मंत्रियों के विभाग बदले गए हैं या उन्हें मंत्रिमंडल से बाहर किया गया है।
भारतीय राजनीति में नैतिक जिम्मेदारी के आधार पर इस्तीफे हमेशा दुर्लभ रहे हैं। हाल के वर्षों में बड़े हादसों या विवादों के बाद विपक्ष अक्सर संबंधित मंत्रियों के इस्तीफे की मांग करता है, लेकिन पहले की तुलना में ऐसे इस्तीफे कम देखने को मिलते हैं। यही वजह है कि नीट पेपर लीक विवाद के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीतिक बहस का विषय बन गई है।
