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संघर्ष, सत्ता और विरासत! बांग्लादेश में 'बेगमों की लड़ाई' का अंत, एक दुनिया छोड़ गईं तो दूसरी को देश ही छोड़ना पड़ गया

बांग्लादेश में ‘बेगमों की लड़ाई’ सिर्फ शेख हसीना और खालिदा जिया की व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं थी। यह बांग्लादेश के इतिहास, उसकी राजनीतिक संरचना, सत्ता संघर्ष, लोकतंत्र की चाह और सामाजिक ध्रुवीकरण की कहानी थी। इस लड़ाई ने देश को कभी ताकत दी, कभी संकट में डाला, कभी लोकतंत्र को मजबूत किया तो कभी उसे कमजोर। अब जबकि एक ‘बेगम’ इतिहास बन चुकी है और दूसरी सत्ता से बाहर, बांग्लादेश की राजनीति एक नए दौर में प्रवेश कर रही है।

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बांग्लादेश में दो बेगमों की लड़ाई खत्म
Curated by: शिशुपाल कुमार
Updated Dec 30, 2025, 12:17 IST
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बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की नेता खालिदा जिया के निधन के साथ ही बांग्लादेश में राजनीतिक लड़ाई का एक अध्याय समाप्त हो गया। खालिदा जिया बांग्लादेश की स्थापना के कुछ सालों के बाद से सक्रिय राजनीति में थीं। बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री थीं और एक नहीं बल्कि तीन-तीन बार देश की सत्ता पर काबिज रहीं। खालिदा जिया के निधन ने बांग्लादेश की उस सियासी लड़ाई को भी खत्म कर दिया, जिसे 'बेगमों की लड़ाई' कहा जाता था। बांग्लादेश की राजनीति में पिछले कई सालों से दो बेगमों के बीच ही सियासी लड़ाई चल रही है। एक ओर खालिदा जिया तो दूसरी ओर शेख हसीना।

बांग्लादेश में 'बेगमों की लड़ाई'

बांग्लादेश की राजनीति का सबसे चर्चित, तीखा और प्रभावशाली अध्याय है- 'बेगमों की लड़ाई’। यह लड़ाई सिर्फ दो नेताओं के बीच सत्ता संघर्ष नहीं था, बल्कि इसने पूरे देश की राजनीतिक संस्कृति, लोकतांत्रिक ढांचे, चुनावी व्यवहार, शासन शैली और जनमानस को गहराई से प्रभावित किया। एक ओर आवामी लीग की नेता और अब तक की सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहीं शेख हसीना और दूसरी ओर बीएनपी प्रमुख, तीन बार प्रधानमंत्री रह चुकीं खालिदा जिया- इन्हीं दो शख्सियतों ने तीन दशकों से ज्यादा समय तक बांग्लादेश की राजनीति को लगभग दो ध्रुवों में बांटकर रखा।

कब और कैसे शुरू हुई 'बेगमों की लड़ाई'

यह कहानी सिर्फ प्रतिद्वंदिता की नहीं, बल्कि परिवारों की विरासत, सैन्य शासन के बाद उपजी लोकतांत्रिक आकांक्षाओं, बदले की राजनीति, विश्वासघात, आंदोलन, जेल, तख्तापलट और न्यायिक लड़ाइयों से भरी एक लंबी राजनीतिक यात्रा की भी है। इस राजनीतिक संघर्ष की जड़ें बांग्लादेश की आजादी के बाद के अशांत दौर में मिलती हैं। 1971 के स्वतंत्रता संग्राम के नायक और देश के प्रथम प्रधानमंत्री शेख मुजीबुर रहमान की 1975 में हत्या कर दी गई। इस घटना के बाद बांग्लादेश में सैन्य शासन का दौर शुरू हुआ। इसी दौर में सेना प्रमुख जियाउर रहमान सत्ता में आए और बाद में उन्होंने ही बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की स्थापना की। 1981 में जियाउर रहमान की हत्या के बाद उनकी पत्नी खालिदा जिया राजनीति में आईं और जल्द ही विपक्ष की सबसे बड़ी चेहरा बन गईं। दूसरी ओर शेख मुजीबुर रहमान की पुत्री शेख हसीना आवामी लीग के नेतृत्व के साथ राजनीति में सक्रिय रहीं। 1980 के दशक के अंत तक दोनों महिलाएं जनता के बीच अपने-अपने समर्थक समूह तैयार कर चुकी थीं। 1990 में सैन्य तानाशाह एच.एम. इरशाद के खिलाफ जनआंदोलन ने बांग्लादेश की राजनीति को लोकतंत्र की ओर खींचा और यहीं से शुरू हुई असली प्रतिस्पर्धा- कौन चलाएगा बांग्लादेश, कौन होगा लोकतंत्र का असली वारिस? यही से शुरू हुई थी ‘बेगमों की लड़ाई’ की कहानी।

sheikh mujibur rahman

sheikh mujibur rahman

शेख हसीना के पिता के हत्यारों की रिहाई और बढ़ गई सियासी लड़ाई

शेख हसीना के पिता और बांग्लादेश के संस्थापक नेता शेख मुजीबुर रहमान के हत्यारों को संरक्षण और कानूनी सुरक्षा बीएनपी संस्थापक जियाउर रहमान की सरकार के दौरान मिली थी। 15 अगस्त 1975 की हत्या के बाद तत्कालीन राष्ट्रपति खोंडाकर मुश्ताक अहमद ने “इंडेम्निटी ऑर्डिनेंस” जारी किया, लेकिन बाद में जियाउर रहमान की सरकार ने 1979 में संसद के माध्यम से इसे कानून बनाकर वैधता दी, जिसके चलते हत्यारों पर मुकदमा नहीं चल सका। इसी दौर में कई दोषियों को सरकारी पद और विदेशी मिशनों पर भी तैनात किया गया। बाद में 1996 में शेख हसीना के सत्ता में आने के बाद इस कानून को रद्द किया गया और मुकदमों की प्रक्रिया शुरू हुई।

लोकतंत्र की वापसी और पहली बड़ी टक्कर

1991 में पहली निष्पक्ष चुनाव के बाद खालिदा जिया प्रधानमंत्री बनीं। विपक्ष में रहीं शेख हसीना। संसद के भीतर और बाहर राजनीतिक तनाव बढ़ता रहा। 1996 के शुरुआती चुनावों का विपक्ष ने बहिष्कार किया, बीएनपी ने भारी जीत दर्ज की, मगर जनदबाव और आंदोलन के चलते सरकार सिर्फ 12 दिन चली। कार्यवाहक सरकार बनी और दोबारा चुनाव हुए। शेख हसीना पहली बार सत्ता में काबिज हुईं। 1996 से 2001 तक शेख हसीना की सरकार रही। 2001 में खालिदा जिया फिर प्रधानमंत्री बनीं। इस दौर में भारत-विरोधी माहौल के आरोप, उग्रवाद को लेकर आलोचना, उनके बेटे तारिक रहमान पर समानांतर सत्ता चलाने के आरोप, और 2004 का ढाका ग्रेनेड हमला- इन घटनाओं ने राजनीतिक ध्रुवीकरण और गहरा कर दिया।

sheikh haseena

sheikh haseena

‘बेगमों’ की गिरफ्तारी

2007–08 में शेख हसीना और खालिदा जिया दोनों को सैन्य समर्थित अंतरिम (केयरटेकर) सरकार के दौर में गिरफ्तार किया गया था। यह वही समय था जब बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता, हिंसक आंदोलन और चुनावी विवाद के कारण आपात हालात जैसे प्रतिबंध लगाए गए थे और सेना के समर्थन से फखरुद्दीन अहमद के नेतृत्व में अंतरिम सरकार ने सत्ता संभाली थी। दोनों नेताओं पर मुख्य रूप से भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग के आरोप लगाए गए थे। शेख हसीना पर उनके प्रधानमंत्री कार्यकाल से जुड़े कथित भ्रष्टाचार के मामले दर्ज किए गए। खालिदा जिया को भी भ्रष्टाचार और उनके बेटे तारिक रहमान पर लगे कथित घोटालों के मामलों के संदर्भ में गिरफ्तार किया गया। इस अवधि में अंतरिम सरकार का मकसद राजनीतिक सुधार और तथाकथित “क्लीन-अप ड्राइव” दिखाया गया, जिसके तहत दोनों शीर्ष नेताओं को जेल भेजा गया। बाद में राजनीतिक परिस्थितियां बदलने पर दोनों रिहा हुईं और बांग्लादेश की राजनीति में वापस लौटीं।

शेख हसीना की सत्ता में वापसी और खालिदा जिया का पतन

2007–08 के आपातकाल और दोनों नेताओं की गिरफ्तारी के बाद जो राजनीतिक ट्रांजिशन शुरू हुआ, उसने परिदृश्य को पूरी तरह बदल दिया। इस बदलाव का लाभ शेख हसीना को मिला और धीरे-धीरे खालिदा जिया राजनीतिक हाशिये पर चली गईं। 2008 के अंत में चुनाव कराए गए। आवामी लीग ने भारी बहुमत से जीत हासिल की। जनता युद्ध अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई, आर्थिक स्थिरता और अपेक्षाकृत सख्त शासन चाहती थी, हसीना ने यही वादा किया। सत्ता में वापसी के बाद शेख हसीना ने प्रशासनिक पकड़ मजबूत की, सेना और संस्थागत ढांचे का विश्वास फिर से हासिल किया और आर्थिक विकास, इंफ्रास्ट्रक्चर और स्थिरता के एजेंडे पर आगे बढ़ीं। उन्होंने 1971 के युद्ध अपराधों के मुकदमों को फिर से शुरू किया, इस्लामी कट्टरपंथ पर सख्त कार्रवाई की और अपनी राजनीतिक पकड़ को और मजबूत किया। इस तरह 2009 से शेख हसीना लगातार 2024 तक सत्ता में बनी रहीं। इसके उलट, बीएनपी और खालिदा जिया के लिए हालात लगातार बिगड़ते चले गए। पार्टी के भीतर टूट और नेतृत्व संकट पैदा हुआ। भ्रष्टाचार मामलों में खालिदा जिया को सजा हुई। उनके बेटे तारिक रहमान को बांग्लादेश से भागना पड़ गया। बीएनपी ने कई बार चुनावों का बहिष्कार किया, जिससे उनका जनाधार कमजोर होता गया। सरकार की कड़ी नीतियों, केसों और राजनीतिक दबाव के कारण खालिदा जिया की राजनीतिक सक्रियता लगभग खत्म हो गई।

Khalida zia

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एक बेगम का निधन, दूसरी को छोड़ना पड़ गया देश

दोनों बेगमों की सियासी लड़ाई में 2024 अहम मोड़ साबित हुआ। बांग्लादेश में छात्र आंदोलन हुआ और शेख हसीना सरकार का तख्तापलट हो गया। आज की तारीख में बांग्लादेश की राजनीति में बेगमों की लड़ाई का अंत हो गया है। एक बेगम खालिदा जिया का जहां आज निधन हो गया, वहीं शेख हसीना को जान बचाने के लिए 2024 में ही बांग्लादेश से भागना पड़ गया था और भारत में शरण लेने के लिए मजबूर होना पड़ गया था।

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