दिल्ली में हाल ही में हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान देश की राजधानी को सुलगाने और सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने की एक बेहद खतरनाक डिजिटल साजिश का पर्दाफाश हुआ है। भारतीय एजेंसियों और दिल्ली पुलिस की जांच में सामने आया है कि सीमा पार यानी पाकिस्तान से संचालित सोशल मीडिया नेटवर्क ने पुराने भ्रामक वीडियो, मनगढ़ंत दावों और फर्जी खबरों का सहारा लेकर भीड़ को उग्र करने का पूरा प्लान तैयार किया था। हालांकि, दिल्ली पुलिस की मुस्तैदी और साइबर सेल की तुरंत कार्रवाई ने इस नापाक साजिश को समय रहते पूरी तरह नाकाम कर दिया। खुलासा हुआ है कि इस पूरी अशांति के पीछे सीमा पार पाकिस्तान से संचालित होने वाले सोशल मीडिया हैंडल्स का हाथ था। आपको बता रहे हैं कैसे पाकिस्तानी हैंडल्स ने फर्जी खबरों का जाल बुना और दिल्ली पुलिस ने इस साजिश को कैसे नाकाम किया।
क्या थी पाकिस्तानी साजिश और प्रोपेगैंडा?
खुफिया एजेंसियों और दिल्ली पुलिस की साइबर यूनिट (IFSO) की जांच में यह बात सामने आई कि पाकिस्तान से जुड़े सैकड़ों सोशल मीडिया अकाउंट्स भारतीय नागरिकों के रूप में खुद को पेश कर रहे थे। इनका मुख्य उद्देश्य दिल्ली के विरोध प्रदर्शनों को हिंसक रूप देना और भारत विरोधी माहौल तैयार करना था। इन हैंडल्स द्वारा कई झूठ फैलाए गए।
- इसमें झूठी मौतें और पुलिस फायरिंग का दावा किया गया। सोशल मीडिया पर भ्रामक खबरें फैलाई गईं कि विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस फायरिंग में कई लोगों की मौत हो गई है।
- सनसनीखेज फर्जी दावे भी किए गए। कुछ पोस्ट्स में यहां तक दावा किया गया कि पुलिस कार्रवाई में राहुल गांधी घायल हो गए हैं या फिर सेना को दिल्ली में उतार दिया गया है।
- पुराने वीडियो का इस्तेमाल किया गया। अशांति भड़काने के लिए साल 2019 (दिसंबर 2019) के पुराने और असंबंधित वीडियो को वर्तमान प्रदर्शनों से जोड़कर शेयर किया गया, ताकि लोगों में आक्रोश और डर पैदा किया जा सके।
साजिश का ताना-बाना और फर्जी पहचान
- प्रॉक्सी खातों के एक नेटवर्क ने भारतीय नाम, क्षेत्रीय प्रोफाइल पिक्चर और बेहद बारीकी से तैयार की गई बायो का इस्तेमाल किया, जिससे वे राजनीतिक स्वयंसेवक, छात्र नेता या जमीनी कार्यकर्ता लग सकें।
- ऐसे ही एक मुख्य प्रॉक्सी अकाउंट, जिसका हैंडल @indiantiwari01 था, ने यह दावा करते हुए पोस्ट किया कि जब विपक्षी दल सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च कर रहा था, तब सुरक्षा बलों ने गोलीबारी की जिसमें कांग्रेस सांसद राहुल गांधी घायल हो गए।
- अपनी विदेशी मूल की पहचान को छिपाने के लिए मुख्य ऑपरेटर्स ने हिंदी, अंग्रेजी और विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं का इस्तेमाल किया ताकि भारतीय यूजर्स के बीच विश्वसनीयता स्थापित की जा सके और वे खुद को विरोध स्थल का चश्मदीद बता सकें।
- जैसे ही कोई प्राथमिक खाता भ्रामक दावा या तोड़ा-मरोड़ा गया वीडियो पोस्ट करता था, उससे जुड़े सैकड़ों लिंक्ड अकाउंट्स एक मिनट के भीतर उसे रीपोस्ट कर उस पर प्रतिक्रिया देना शुरू कर देते थे।
- इसी पोस्ट को एक साथ निजी व्हाट्सएप और टेलीग्राम चैनलों पर भी धकेला जाता था, जिसका मुख्य उद्देश्य क्षेत्रीय ट्रेंडिंग एल्गोरिदम को प्रभावित करना था ताकि फर्जी खबरों को मुख्यधारा की सार्वजनिक सुर्खियां मिल सकें।
- खुफिया आकलन से यह भी संकेत मिला कि इस नेटवर्क ने घरेलू विभाजनों को चौड़ा करने और क्षेत्रीय तनाव बढ़ाने के उद्देश्य से इन लक्षित कथाओं को गैर-भाजपा शासित राज्यों, जिनमें दक्षिणी राज्य, पंजाब और जम्मू-कश्मीर शामिल हैं, में फैलाया।
मौतों और सेना की तैनाती के झूठे आंकड़े
इस संदिग्ध नेटवर्क द्वारा किए गए सबसे खतरनाक दावों में से एक यह था कि दिल्ली पुलिस ने 10 अक्टूबर को प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी की, जिसमें कथित तौर पर 13 लोग मारे गए और 33 अन्य घायल हो गए। फैक्ट-चेकिंग टीमों ने पाया कि यह फुटेज फरवरी 2024 का पुराना है और पंजाब-हरियाणा के बीच शंभू बॉर्डर के पास हुए किसानों के प्रदर्शन का है, जहां सुरक्षा बलों ने आंसू गैस का इस्तेमाल किया था, इसका दिल्ली के प्रदर्शन से कोई लेना-देना नहीं था।
सेना की तैनाती की अफवाहें फैलाई गई
इस अभियान के तहत ऐसे दावे भी प्रसारित किए गए कि भारतीय सेना ने नागरिक प्रदर्शनकारियों पर सैन्य नियंत्रण स्थापित करने के लिए नई दिल्ली में प्रवेश कर लिया है। इन पोस्टों को बदले हुए ऑडियो और वीडियो फुटेज के साथ प्रसारित किया गया ताकि यह नैरेटिव गढ़ा जा सके कि नागरिक अधिकारी अब दिल्ली की स्थिति को संभालने में असमर्थ हैं।
साइबर यूनिट्स और पुलिस की कार्रवाई
संदिग्ध ऑपरेशन के विस्तृत सत्यापन के बाद, साइबर अपराध डिवीजनों और विशेष पुलिस इकाइयों ने नेटवर्क के डिजिटल बुनियादी ढांचे को खत्म करने के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों को टेकडाउन अनुरोध भेजे। इस मामले की जांच कर रहे अधिकारियों ने साइबर सुरक्षा, आपराधिक साजिश और सार्वजनिक शरारत से संबंधित प्रावधानों के तहत कई प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की हैं। अधिकारियों ने इस नेटवर्क से जुड़ी ऑनलाइन गतिविधियों की लगातार निगरानी करने की बात कही है। साथ ही, सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं को सलाह दी गई है कि वे किसी भी असत्यापित वीडियो, मौत के आंकड़ों या सेना के हस्तक्षेप से जुड़े दावों को साझा करने से पहले विश्वसनीय स्रोतों से उनकी सत्यता की जांच जरूर करें।