बलूचिस्तान में मुक्तिवाहिनी 2.O! समझिए कैसे बलूच विद्रोहियों ने पाकिस्तान की नाक में कर रखा है दम?

आजादी के बाद जहां एक ओर सरदार वल्लभ भाई पटेल ने एकाध अपवादों को छोड़कर (हैदराबाद और जूनागढ़) कई रजवाड़ों और रियासतों का भारतीय संघ में शांतिपूर्ण विलय करवाया, वहीं दूसरी ओर मार्च 1948 में मोहम्मद अली जिन्ना के तुगलकिया फरमान पर कलात रियासत को जबरन पाकिस्तान में मिला लिया गया।

ISI प्रायोजित एजेंडे के चलते वैश्विक स्तर पर बलूच विद्रोहियों की गलत तस्वीर दुनिया के सामने रखी गयी। यही वजह रही कि बलोचों की जायज और वाजिब मांगों को दहशतगर्दी और अलगाववाद की नैरेटिव में लपेट दिया गया। तारीखों के पन्ने पलटे तो हम ये पाते है कि ये काफी पेचीदा मसला है, इसकी नींव में जातीय अस्मिता, क्षेत्रीय अक्षुण्णता और हाशिए पर धकेले दिए जाने का गुस्सा है। इस्लामाबाद के सत्ता सदन ने कई मर्तबा इस विद्रोह की तपिश झेली है। पड़ोसी मुल्क की ग्राउंड फोर्सेस और एयरफोर्स ने कई मौकों पर बड़ी ही बेरहमी से बलूचों का नरसंहार किया। अमन पसंद बलूच कई दशकों से हाथों में हथियार लिए मुखर है, अपनी जमीनी सामरिक कवायदों के साथ। शहबाज शरीफ के लिए बलूचिस्तान का मसला क्षेत्रीय मुद्दे से ज्यादा सियासी नासूर बना हुआ है। इस नासूर से रिसते मवाद ने पाकिस्तान की बुनियाद को हिला रखा है। हाल ही में बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) ने ऑपरेशन “हेरोफ” छेड़कर कई बड़े हमलों को अंजाम दिया। बीते मार्च महीने के दूसरे हफ्ते के दौरान बलूच विद्रोहियों ने ट्रेन अगवाकर पाक सेना और सरकार को बैकफुट पर ला दिया। हालिया घटनाक्रम में BLA ने सुराब शहर को अपने कब्जे में ले लिया। सामरिक तौर पर ये शहर काफी अहम है, क्योंकि ये शहर क्वेटा को कराची से जोड़ने वाली अहम कड़ी है।

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बलोच कार्यकर्ताओं पर अत्याचार करती रही है पाक सरकार (फाइल फोटो)

बलूचिस्तान पर पाक का नापाक कब्जा

साल 1947 जहां एक ओर सरदार वल्लभ भाई पटेल ने एकाध अपवादों को छोड़कर (हैदराबाद और जूनागढ़) कई रजवाड़ों और रियासतों का भारतीय संघ में शांतिपूर्ण विलय करवाया, वहीं दूसरी ओर मार्च 1948 में मोहम्मद अली जिन्ना के तुगलकिया फरमान पर कलात रियासत को जबरन पाकिस्तान में मिला लिया गया। दिलचस्प है कि कलात रियासत प्रमुख ने उस दौरान दावा किया था कि उन्होनें ब्रिटिश सरकार के साथ संधि की और रियासत को क्षेत्रीय रूप से संप्रभु माना। बावजूद इसके जिन्ना के सैन्य दबाव और रणनीतिक घेराव के चलते रियासत के मुखिया से जबरन विलय के कथित दस्तावेजों पर लिखित रजामंदी ले ली गयी। जैसे ही ये खबर बलूचों में फैली तो विद्रोह के शोले भड़क उठे। कलात रियासत के शहजादे अब्दुल करीम ने सबसे पहले पाकिस्तान के खिलाफ बगावत की, उसके बाद नवाब नौरोज खान इस फेहरिस्त में आगे आए। इस मुहिम में नवाब अकबर खान बुगती का नाम आज भी आम बलूच के दिलों में जिंदा है। मार्च 1948 में उठी लपटों ने बलूचिस्तान को अब तक जलाये रखा है। दशकों से चला आ रहा ये विद्रोह पाकिस्तान के लिए गले में फंसी हड्डी की तरह बना हुआ है। बलूचों का मानना है कि पाकिस्तानी सरकार उनकी जिंदगी और जमीन से खिलवाड़ कर रही है। 1948 से लेकर आज बलूच बहुल इलाके मकरान, रक्सन, कलात, क्वेटा, नसीराबाद, सिब्बी, लोरालाई और जोब पूर्वी पाकिस्तान इलाकों के मुकाबले काफी पिछड़े हुए है। इस्लामाबाद ने कथित संघर्ष विराम की आड़ में कई बड़े बलूच नेताओं को हलाक कर दिया। उन पर बेबुनियादी मुकदमे चलाये गए और फांसी पर लटकाया गया। रावलपिंड़ी के आतताइयों ने बलूचों पर F-16 से हवाई हमला हमले तक किए।

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