Akhilehs Yadav Sanatan Push: 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में एक साल से भी कम समय बचा है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव रणनीति को धार देने में जुटे हैं। वह अपने अभियान को नया रूप देते नजर आ रहे हैं। उनकी रणनीति बीजेपी की पिच पर ही बैटिंग करके ताबड़तोड़ रन बनाने की है। इसी सिलसिले में वह सियासी पिच पर सनातन का तड़का लगा रहे हैं। यानी बीजेपी को उसी के हिदुत्व मुद्दे पर घेरने की योजना के साथ आगे बढ़ रहे हैं। बीजेपी पर शासन और भ्रष्टाचार के मुद्दों पर हमले जारी रखते हुए, अखिलेश धार्मिक प्रतीकों और सनातन धर्म का समर्थक बनकर नई रणनीति पर काम कर रहे हैं। हिंदुत्व और सनातन बीजेपी का सबसे मजबूत राजनीतिक मुद्दा रहा है और पार्टी ने इसी लाइन पर रहकर अपना सियासी सफर मजबूती से आगे बढ़ाया है। अब अखिलेश, बीजेपी को उसके ही मैदान और पिच पर क्लीन बोल्ड करना चाहते हैं।
हिंदुत्व और सनातन की पिच पर उतरकर बैटिंग
2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अब एक साल से भी कम का समय बचा है। ऐसे में समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव अपने राजनीतिक जीवन के सबसे बड़े और साहसिक वैचारिक बदलाव से गुजर रहे हैं। पारंपरिक रूप से "MY" (मुस्लिम-यादव) और हालिया "PDA" (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के इर्द-गिर्द राजनीति करने वाली सपा अब भारतीय जनता पार्टी के सबसे मजबूत गढ़—हिंदुत्व और सनातन—की पिच पर उतरकर बैटिंग कर रही है। अखिलेश यादव का यह कदम महज एक चुनावी हथकंडा है या बीजेपी के धार्मिक एकाधिकार को तोड़ने की कोई गहरी रणनीतिक बिसात? आइए इसके आंतरिक समीकरणों और राजनीतिक प्रभाव को डिकोड करते हैं।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से मुलाकात के मायने
अखिलेश की उत्तराखंड के जोशीमठ स्थित ज्योतिर्मठ के प्रमुख जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से हुई हालिया मुलाकात को इसी दिशा में उनकी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। यह मुलाकात ऐसे समय हुई है जब अयोध्या राम मंदिर के दान में कथित अनियमितताओं को लेकर उत्तर प्रदेश में बड़ा राजनीतिक मुद्दा खड़ा हो गया है। पिछले सप्ताह लखनऊ में सरस्वती से मुलाकात के बाद, अखिलेश ने सोशल मीडिया पर तस्वीरें साझा करते हुए लिखा- “पूज्य शंकराचार्य जी के दर्शन और आशीर्वाद प्राप्त करना और सनातन धर्म के संकट को दूर करने और धर्म को दुष्टों के चंगुल से मुक्त करने के लिए सार्थक चर्चा करना सौभाग्य का क्षण था।”
संतों का साथ से लेकर मंदिर निर्माण तक अखिलेश यादव ने अपनी इस नई छवि को गढ़ने के लिए पिछले कुछ महीनों में बेहद नपे-तुले कदम उठाए हैं। इसे इस तरह समझा जा सकता है।
शंकराचार्य से बढ़ती नजदीकियां और 2015 की 'भूल सुधार': हाल ही में लखनऊ में ज्योतिर्मठ के प्रमुख जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से अखिलेश यादव की मुलाकात इस रणनीति का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट है।
अतीत का बोझ हटाना: सितंबर 2015 में वाराणसी में गणेश प्रतिमा विसर्जन विवाद के दौरान सपा सरकार में संतों पर लाठीचार्ज हुआ था। अप्रैल 2021 और अब 2026 में लगातार मुलाकातें कर अखिलेश ने न सिर्फ इस लाठीचार्ज के लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांगी, बल्कि खुद को संतों के सम्मान के रक्षक के रूप में पेश किया।
शंकराचार्य का रुख: स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद खुद कई मुद्दों (जैसे जनवरी 2024 में अधूरे मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा का विरोध और महाकुंभ में पवित्र स्नान से रोकने के आरोप) पर बीजेपी नेतृत्व से असहमत रहे हैं। अखिलेश इसी 'असंतोष' को राजनीतिक धार दे रहे हैं।
अयोध्या चंदे के विवाद को 'सनातनी अस्मिता' बनाना: अयोध्या राम मंदिर के चंदे और जमीन खरीद में लगे कथित अनियमितताओं के आरोपों को उठाने वाले अखिलेश पहले नेताओं में से थे। लेकिन यहां उनका शब्दों का चयन बदल गया है, उन्होंने कहा "इस घटना ने दुनिया भर के सनातनियों को चिंतित कर दिया है। उन्होंने भगवान राम द्वारा स्थापित गरिमा को ठेस पहुंचाकर घोर पाप किया है।" यानी सपा अब बीजेपी पर 'हिंदू-विरोधी' होने का आरोप नहीं लगा रही, बल्कि खुद को 'सच्चा सनातनी' और बीजेपी को 'धर्म का व्यापार करने वाली पार्टी' के रूप में चित्रित कर रही है।
पैतृक गृह में केदारेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण: छवि बदलने की इस कवायद को स्थायी बनाने के लिए अखिलेश ने इटावा स्थित अपने पैतृक गाँव में केदारेश्वर महादेव मंदिर का भव्य निर्माण शुरू करवाया है। यह कदम बीजेपी के उस पुराने नैरेटिव को सीधे काउंटर करता है जिसमें सपा को केवल अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की राजनीति करने वाली पार्टी बताया जाता था।
'कारसेवक फायरिंग' के भूत को काउंटर करने का नया दांव
दशकों से बीजेपी मुलायम सिंह यादव सरकार के 1990 के कारसेवक फायरिंग मामले को उठाकर सपा को घेरती रही है। इस बार अखिलेश ने इस नैरेटिव को पूरी तरह से पलटने की कोशिश की है।अखिलेश ने तर्क दिया कि वर्तमान में राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा, 1990 के दौर में उत्तर प्रदेश प्रशासन के बेहद वरिष्ठ और प्रभावशाली नौकरशाह थे।
सपा का सीधा नैरेटिव: अगर उस समय का प्रशासन दोषी था, तो उस प्रशासन के सबसे महत्वपूर्ण चेहरे आज राम मंदिर की देखरेख कैसे कर रहे हैं? इस एक तर्क से अखिलेश ने बीजेपी के सबसे पुराने चुनावी नैरेटिव की धार को कुंद करने का प्रयास किया है।
राजनीतिक नफा-नुकसान: ब्राह्मण और PDA समीकरण पर क्या होगा असर? इस सॉफ्ट-हिंदुत्व या 'सनातन कार्ड' के गहरे चुनावी मायने हैं, जो उत्तर प्रदेश की जातिगत राजनीति को सीधे प्रभावित करेंगे।
ब्राह्मण मतदाता: यूपी में ब्राह्मण मतदाता पारंपरिक रूप से बीजेपी के साथ रहे हैं, लेकिन विकास दुबे एनकाउंटर के बाद से एक अदृश्य नाराजगी की चर्चा होती रही है। शंकराचार्य के माध्यम से अखिलेश इस वर्ग को यह संदेश देना चाहते हैं कि सपा उनके धार्मिक गुरुओं का सम्मान करती है।
PDA फॉर्मूला : (पिछड़ा-दलित)गैर-यादव ओबीसी (जैसे मौर्य, शाक्य, सैनी, कुर्मी) और गैर-जाटव दलितों का एक बड़ा हिस्सा सांस्कृतिक रूप से धार्मिक है। सपा का यह नया रूप इन जातियों को बिना अपना धार्मिक नैरेटिव छोड़े सपा के पाले में आने का एक 'कम्फर्ट जोन' देता है।
मुस्लिम मतदाता: इस रणनीति का सबसे बड़ा जोखिम मुस्लिम वोट बैंक है। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुस्लिम मतदाताओं के पास बीजेपी को हराने के लिए सपा के अलावा कोई मजबूत विकल्प नहीं है, इसलिए वे इस 'सॉफ्ट हिंदुत्व' को एक रणनीतिक मजबूरी मानकर स्वीकार कर सकते हैं।
बीजेपी का काउंटर-नैरेटिव
चुनावी सनातनी: बीजेपी इस पूरी रणनीति को मूकदर्शक बनकर नहीं देख रही है। बीजेपी के प्रवक्ताओं और शीर्ष नेतृत्व ने अखिलेश के इस रूप को "चुनावी सनातनी" और "वैचारिक गिरगिट" करार दिया है। बीजेपी का तर्क है कि जो पार्टी कभी राम मंदिर के निमंत्रण को ठुकराती थी, वह आज केवल वोटों के ध्रुवीकरण को रोकने के लिए संतों के चक्कर काट रही है।
अखिलेश की 'सनातन रणनीति' के 3 मुख्य स्तंभ
- धार्मिक संतों का साथ: स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से हालिया मुलाकात और अतीत के लाठीचार्ज के लिए माफी मांगना
- सांस्कृतिक प्रतीकवाद: इटावा में केदारेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण करवाकर 'हिंदू-विरोधी' छवि को बदलना
- बीजेपी को घेरना: राम मंदिर से जुड़े कथित मुद्दों को 'सनातनी गरिमा' से जोड़कर बीजेपी की राजनीतिक पिच पर ही हमला करना
बीजेपी के एकाधिकार को समाप्त करने का लक्ष्य
अखिलेश यादव का 'सनातन कार्ड' इस बात का प्रमाण है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में अब कोई भी दल बहुसंख्यक समाज की धार्मिक भावनाओं की उपेक्षा करके सत्ता के शिखर तक नहीं पहुंच सकता। अखिलेश का उद्देश्य बीजेपी के कोर एजेंडे को चुराना नहीं है, बल्कि हिंदू धार्मिक मुद्दों पर बीजेपी के एकाधिकार को समाप्त करना है।यदि वह इसमें 10% भी सफल रहे और सनातनी प्रतीकों के सहारे गैर-यादव ओबीसी या ब्राह्मणों के एक छोटे हिस्से को अपनी तरफ मोड़ पाए, तो 2027 का चुनावी मुकाबला बेहद कड़ा और दिलचस्प होने जा रहा है।