हूती (Houthi) जिन्हें आधिकारिक तौर पर अंसार अल्लाह (Allah के समर्थक) कहा जाता है, यमन का एक शिया इस्लामी राजनीतिक और सशस्त्र विद्रोही संगठन है। यह समूह मुख्य रूप से यमन के अल्पसंख्यक जैदी शिया समुदाय से बना है। साल 2004 में हुसैन अल-हूती की मौत के बाद, उनके भाई अब्दुल मलिक अल-हूती इसके राजनीतिक और सैन्य नेता हैं। जानिए इससे जुड़ी अहम और दिलचस्प बातें...
हूती कोई अचानक नहीं बने हैं, कई सालों के दबे गुस्से, धार्मिक पहचान की लड़ाई और हुसैन अल-हूती के परिवार ने इन्हें 'चप्पल वाली सेना' के रूप में पहचान दी है। हूती यमन के करीब 70 फीसदी आबादी वाले इलाके पर राज करते हैं। इनकी अपनी सरकार, अपनी सेना और अपना टैक्स सिस्टम है। और वर्तमान में तो हूतियों के कारनामे रोजाना ही सुर्खियां बटोर रहे हैं।
क्यों मिला हूती नाम?
हूतियों का आधिकारिक नाम अंसार अल्लाह है, जिसका मतलब है Allah के समर्थक। लेकिन दुनिया इन्हें हूती कहती है।इसकी वजह है एक परिवार वो है-अल-हूती परिवार। यमन के सादा प्रांत में अल-हूती परिवार जैदी शिया समुदाय का सबसे बड़ा धार्मिक परिवार माना जाता है। इस परिवार के हुसैन बदरुद्दीन अल-हूती ने 1992 में 'अल-शबाब अल-मोमिन' यानी Believing Youth नाम का एक आंदोलन शुरू किया। ये आंदोलन जैदी युवाओं को फिर से अपनी जड़ों से जोड़ने के लिए था। लोग उनके फॉलोअर्स को 'हूती' कहने लगे और फिर धीरे-धीरे यही नाम पूरी दुनिया में फैल गया।
कैसे हुआ हूतियों का उदय
इतिहासकार बताते हैं कि यमन में 1000 साल तक जैदी इमामों का राज था। 1962 में तख्तापलट हुआ और राजशाही खत्म हो गई। जैदी समुदाय सत्ता से बाहर हो गया। सऊदी अरब के पैसों से यमन में सुन्नी वहाबी विचारधारा फैलने लगी। जैदियों को लगा उनकी पहचान और धर्म खतरे में है। हुसैन अल-हूती ने यमन सरकार और सऊदी अरब दोनों को दुश्मन बताया। उन्होंने कहा-यमन सरकार अमेरिका और इजरायल की गुलाम है।
हूतियों के ज्यादातर लड़ाके पहाड़ी गांवों के गरीब कबायली युवा
हूतियों को 'चप्पल वाली सेना' (Chappal Wali Sena) क्यों कहते हैं?
हूतियों के ज्यादातर लड़ाके यमन के सादा, अमरान जैसे पहाड़ी गांवों के गरीब कबायली युवा हैं। इनके पास प्रोफेशनल सेना जैसी वर्दी, जूते नहीं होते। ये पारंपरिक यमनी लुंगी फूटा और रबड़ की चप्पल पहनकर लड़ते हैं। हूतियों की कोई भी वीडियो देखें तो पहाड़ पर चढ़ते हुए, मिसाइल लॉन्च करते हुए, जहाज हाईजैक करते हुए उनके पैर में हवाई चप्पल ही दिखेगी। यमन में चप्पल को 'नअल' कहते हैं। ये सस्ती, हल्की और पहाड़ों पर भागने में आसान होती है।ये नाम मजाक में शुरू हुआ था, पर अब इज्जत बन गया है। प्रोफेशनल सेना भारी जूतों और 20 किलो के सामान के साथ लड़ती है वहीं हूती हल्की चप्पल में पहाड़ों पर कई किलोमीटर तक भाग सकते हैं।
'चप्पल वालों ने अरबों डॉलर वाली सेना को हरा दिया...!'
2015 में सऊदी अरब ने दुनिया की सबसे महंगी सेनाओं में से एक के साथ हूतियों पर हमला किया। सऊदी के पास F-15 फाइटर जेट, अमेरिकी पैट्रियट मिसाइलें, अरबों डॉलर के हथियार थे। सामने थे चप्पल पहने हूती जिनके पास AK-47 और पहाड़ों का ज्ञान था। दुनिया को लगा था सऊदी 2 हफ्ते में जीत जाएगा। पर 8 साल की जंग में सऊदी नहीं जीत पाया। 2023 में सऊदी को सीजफायर करना पड़ा। तब से मीडिया ने कहना शुरू किया 'चप्पल वालों ने अरबों डॉलर वाली सेना को हरा दिया!'
'चप्पल वालों ने अरबों डॉलर वाली सेना को हरा दिया!'
ईरान हूतियों की मदद क्यों करता है?
हूतियों को ईरान का कड़ा समर्थन प्राप्त है, यह ईरान के नेतृत्व वाले 'प्रतिरोध के धुरी' (Axis of Resistance) का हिस्सा हैं, जिसमें लेबनान का हिजबुल्लाह और फिलिस्तीन का हमास भी शामिल हैं। ये अमेरिका, इजराइल और सऊदी अरब के कट्टर विरोधी माने जाते हैं। ईरान और हूती दोनों शिया हैं, पर दोनों के शिया में भी फर्क है-ईरान शिया इस्लाम की इथना अशरी शाखा मानता है और हूती जैदी शाखा। पर दुश्मन का दुश्मन दोस्त वाली थ्योरी यहां काम कर गई। ईरान का सबसे बड़ा दुश्मन है सऊदी अरब और अमेरिका। ईरान ने सोचा कि अगर यमन में हूतियों को मजबूत कर दिया तो सऊदी अरब हमेशा उलझा रहेगा और इजरायल के करीब लाल सागर में ईरान का एक मोहरा तैयार हो जाएगा।
ईरान सीधे हथियार नहीं भेजता, बल्कि 'पार्ट्स' भेजता है!
ईरान हूतियों को हथियार देता है, हूती ईरान को लाल सागर में अमेरिका और इजरायल को घेरने के लिए जमीन देते हैं। ईरान कैसे मदद करता है-हथियार के रूप में सबसे बड़ी मदद। ईरान सीधे हथियार नहीं भेजता, बल्कि पार्ट्स भेजता है। हूतियों के पास जो बुरकान, कुद्स मिसाइलें हैं, वो ईरान की शाहाब और कुद्स मिसाइलों की कॉपी हैं। जो ड्रोन आज लाल सागर में जहाजों पर हमला कर रहे हैं-सामद, कासिफ ड्रोन-वो ईरान के शहीद-136 ड्रोन की कॉपी हैं। ईरान हर साल हूतियों को करोड़ों डॉलर की मदद देता है।
हूतियों ने चार लेवल पर चुनौती दी है (AI Generated/News Room Verified)
मौत वाला कॉरिडोर (Houthi Death Corridor) है क्या?
लाल सागर दुनिया का सबसे बिजी समुद्री रास्ता है। दुनिया का 12 फीसदी व्यापार इसी रास्ते से होता है। यूरोप और एशिया को जोड़ने वाला यही शॉर्टकट है स्वेज नहर वाला रास्ता। इस रास्ते का सबसे संकरा हिस्सा है बाब-अल-मंदेब - सिर्फ 29 किलोमीटर चौड़ा। हूतियों ने यमन के काफी लंबे समुद्री किनारे पर कब्जा कर रखा है। यहां से वो बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट को कंट्रोल करते हैं। इसी इलाके को एक्सपर्ट्स 'मौत वाला कॉरिडोर' या Death Corridor कह रहे हैं। क्योंकि यहां से गुजरने वाला हर जहाज हूतियों की मिसाइल रेंज में होता है।
लाल सागर में अमेरिका को चुनौती दे रहे हैं
हूतियों ने अमेरिका को 4 लेवल पर चुनौती दी है-समुंदर में उसकी बादशाहत तोड़ी, जमीन पर उसकी बमबारी झेली, जेब पर खर्चा बढ़ाया और रोज ललकारा। सऊदी अरब ने अमेरिका के साथ मिलकर हूतियों पर 8 साल तक बमबारी की, पर हरा नहीं पाया। इसी जंग में हूती एक लोकल विद्रोही गुट से दुनिया को चुनौती देने वाली सेना बन गए। दुनिया को लगा हूती 2 हफ्ते में खत्म हो जाएंगे। लेकिन इस लंबी जंग में हूती नहीं हारे। उल्टा उन्होंने मिसाइल, ड्रोन बनाना सीख लिया और आज लाल सागर में अमेरिका और सऊदी अरब को कड़ी चुनौती दे रहे हैं।
