H-1B Visa Rule Change: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Trump On H-1B Visa) एक तरफ जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करते हैं तो दूसरी तरफ भारतीयों की सिरदर्दी को बढ़ा देते हैं। भारत पर 50 फीसदी (25+25) टैरिफ लगाने के बाद उन्होंने 'वीजा बम' फोड़ा है।
ट्रंप ने शुक्रवार को एक घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए जिसके तहत एच1बी वीजा शुल्क को सालाना 100,000 अमेरिकी डॉलर तक बढ़ा दिया जाएगा। बात करें भारतीय करेंसी की तो नए एप्लीकेशन के लिए अमेरिका हर साल 88 लाख रुपए की वसूली करेगा। वर्तमान में H-1B वीजा एप्लीकेशन की फीस 1 से लेकर 6 लाख रुपये तक है।
ट्रंप के इस फैसले ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। नया H-1B वीजा आवेदन नियम क्या है? आखिर अमेरिका ने यह फैसला क्यों लिया? इसका सीधा असर भारतीयों पर क्यों पड़ेगा? H-1B वीजा आवेदन का नया नियम क्या है? आइए H-1B वीजा से जुड़े हर सवालों का जवाब जान लें।
trump news 1
H-1B वीजा आवेदन का नया नियम क्या है?
ट्रंप प्रशासन ने ऐलान किया है कि H-1B वीजा के लिए आवेदन करने वाले किसी भी व्यक्ति को अपने आवेदन को संसाधित करने के लिए हर साल $100,000 का शुल्क देना होगा। भारतीय करेंसी में यह करीब 88 लाख रुपए सालाना होता है।
गौरतलब है कि नियम नए आवेदनों के साथ-साथ मौजूदा पर भी लागू होता है। यह नया शुल्क मौजूदा शुल्कों के अतिरिक्त होगा, जो काफी कम हैं। बता दें कि वर्तमान एच-1बी शुल्कों में वार्षिक लॉटरी के लिए 215 डॉलर का पंजीकरण शुल्क और अन्य आवेदन शुल्क शामिल हैं।
H-1B वीजा धारकों को, वीजा के बदले किए गए भुगतान का सर्टिफिकेट रखना होगा। वीजा प्रक्रिया के दौरान राज्य सचिव यह पुष्टि करेंगे कि भुगतान किया गया था या नहीं. अगर भुगतान गायब है तो याचिका को राज्य विभाग या होमलैंड सुरक्षा विभाग (DHS) द्वारा अस्वीकार कर दिया जाएगा।
h 1 b visa
भारतीयों पर क्या पड़ेगा असर?
कहावत है कि भारत, अमेरिका को सामान से ज्यादा स्किल्ड वर्कर्स एक्सपोर्ट करता है। अमेरिका के आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि एच1-बी वीजा हासिल करने वालों में 71% भारत से हैं, जबकि चीन 11.7% प्रतिशत के साथ दूसरे नंबर पर है। इसलिए कहा जा रहा है कि ट्रंप के नए फरमान की सबसे ज्यादा असर भारतीयों पर पड़ेगा। जिस H-1B वीजा पाने के लिए भारतीयों को फिलहाल 6 लाख रुपये देने पड़ते थे। उन्हें अब 88 लाख रुपये खर्च करने पड़ेंगे।
इस नए बदलाव से इंफोसिस, टीसीएस और विप्रो जैसी भारतीय आईटी कंपनियों पर बड़ा असर पड़ेगा। ये कंपनियां एच-1बी वीजा का इस्तेमाल कर जूनियर और मिड-लेवल इंजीनियरों को अमेरिकी क्लाइंट प्रोजेक्ट्स और स्किल डेवलपमेंट के लिए अमेरिका भेजती है। इस नए बदलाव की वजह से भारतीय पेशेवर अमेरिकी की जगह यूरोपीय देश जाकर नौकरी करना ज्यादा पसंद करेंगे।
h 1 b visa nn
कौन कर सकता है H-1B वीजा के लिए आवेदन?
- H-1B Visa के लिए कोई भी व्यक्ति आवेदन नहीं कर सकता, उसकी तरफ से कंपनी को आवेदन करना होता है।
- वीजा आवेदक को 12 साल काम करने का अनुभव होना चाहिए। गौरतलब है कि कुछ शर्तों के साथ इसमें छूट भी दी गई है
- आवेदक को जिस नौकरी के लिए बुलाया गया है, वह उसमें कुशल हो।
- वेतन कम से कम 40 लाख रुपये सालाना हो।
- आवेदक के पास अमेरिका की कोई बैचलर डिग्री या यूएस की बैचलर डिग्री के समकक्ष विदेशी यूनिवर्सिटी से डिग्री हो।
ट्रंप प्रशासन ने क्या दलील दी है?
ट्रंप प्रशासन ने कहा कि इस कदम का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि देश में लाए जा रहे लोग "वास्तव में अत्यधिक कुशल" हों और अमेरिकी कर्मचारियों की जगह न लें। एच-1बी वीजा कार्यक्रम उन विदेशियों के लिए होता है जो अमेरिका में विशेष व्यवसायों खासकर प्रौद्योगिकी क्षेत्र में कार्यरत हैं।
ट्रंप का आरोप है कि भारत और चीन के लोगों की वजह से अमेरिका वासियों को अपने ही देश में नौकरियां नहीं मिलती। राष्ट्रपति बनने से पहले उन्होंने चुनावी कैंपेन में भी इस बात को जोरों-शोरों से उठाया था कि अगर वो चुनाव जीत जाते हैं तो प्रवासियों पर नकेल कसेंगे। ट्रंप फिलहाल वैसा ही कर रहे हैं।
भले ही प्रवासियों पर नकेल कस कर ट्रंप अपनी पीठ थपथपा लें लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इसका अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर इस फैसला का नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, विशेष रूप से उन उद्योगों में जो वैश्विक प्रतिभा पर भारी निर्भर हैं।
trump news h
क्या है H-1B वीजा का इतिहास?
अब H-1B वीजा के इतिहास की भी बात कर लेते हैं। इसकी शुरुआत 1990 में अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के कार्यकाल में की गई थी। कार्यक्रम को उन लोगों के लिए बनाया गया था, जिनके पास ऐसे क्षेत्रों में स्नातक या ग्रेजुएशन की डिग्री है। सरकार का उद्देश्य था कि अमेरिकी कंपनियों में दुनिया के बेस्ट स्किल्ड वर्कर्स काम करें।
