"सच है, विपत्ति जब आती है, कायर को ही दहलाती है,
सूरमा नहीं विचलित होते, क्षण एक नहीं धीरज खोते,
विघ्नों को गले लगाते हैं, काँटों में राह बनाते हैं।
मुख से न कभी उफ़ कहते हैं, संकट का चरण न गहते हैं,
जो आ पड़ता सब सहते हैं, उद्योग-निरत नित रहते हैं,
शुलों का मूल नसाते हैं, बढ़ खुद विपत्ति पर छाते हैं।"
ये पंक्तियां राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की प्रमुख रचना 'रश्मिरथी' की हैं। इनके जरिए ये समझा जा सकता है कि कठिनाइयां और विपत्तियां सिर्फ कमजोर और कायर लोगों को डराती हैं, जबकि साहसी और वीर लोग संकट आने पर भी अपना धैर्य नहीं खोते और उनका डटकर सामना करते हैं। कुछ घटनाएं ऐसी ही होती हैं, जो महज खबर बनकर नहीं रह जातीं, बल्कि लोगों के दिलों पर गहरी छाप छोड़ जाती हैं। करीब चार दशक पहले नीरजा भनोट (Neerja Bhanot) ने विमान में अपनी बहादुरी से दुनिया को हैरान कर दिया था। अब भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मच्छार (Smit Macchar) के साहस ने एक बार फिर उस जज्बे की याद ताजा कर दी है।
उड़ान के दौरान कॉकपिट में उन पर चाकू से हमला हुआ, जिसके बाद विमान बेकाबू होकर तेजी से नीचे जाने लगा। उस वक्त विमान में सवार करीब 174 यात्रियों की जिंदगी चंद पलों में गंभीर खतरे में आ गई थी। ऐसे मुश्किल हालात में कैप्टन स्मित ने अपनी सुरक्षा से पहले विमान में मौजूद लोगों की जिंदगी बचाने की जिम्मेदारी को अहमियत दी। लहूलुहान होने के बावजूद कैप्टन स्मित मच्छार ने हिम्मत नहीं छोड़ी। उन्होंने हमलावर का डटकर मुकाबला किया और किसी तरह कॉकपिट का दरवाजा खोल दिया। दरवाजा खुलते ही यात्रियों और क्रू के सदस्यों को अंदर पहुंचने का रास्ता मिल गया। इसके बाद विमान में मौजूद यात्रियों और अन्य पायलटों ने मिलकर हमलावर को काबू में कर लिया। तमाम मुश्किलों के बीच विमान को सऊदी अरब के तबुक में सुरक्षित लैंड किया गया। कैप्टन स्मित के इस साहस और सूझबूझ ने विमान में सवार लोगों की जान बचाने में अहम भूमिका निभाई, जिसके बाद उनकी बहादुरी की चर्चा दुनियाभर में हो रही है।
Captain Smit Machchhar (File Photo)
आखिर क्या हुआ था?
30 सितंबर 2026 को फ्लाईदुबई की फ्लाइट FZ1073 दुबई से तेल अवीव के लिए रवाना हुई थी। विमान में 27 बच्चों समेत 174 यात्री सवार थे। उड़ान सामान्य रूप से आगे बढ़ रही थी, लेकिन अचानक कॉकपिट में हालात बिगड़ गए। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ओमान के नागरिक सह-पायलट ने भारतीय कैप्टन स्मित मच्छार पर चाकू से हमला कर दिया। इसके बाद विमान के सिस्टम के साथ छेड़छाड़ की गई, जिससे विमान तेजी से नीचे जाने लगा। लगभग दो मिनट के अंदर विमान 17 हजार फीट से ज्यादा नीचे आ गया। इस अचानक हुए बदलाव से यात्रियों में दहशत फैल गई और किसी को भी यह अंदाजा नहीं था कि कॉकपिट के अंदर आखिर क्या स्थिति बनी हुई है। इस बेहद तनावपूर्ण माहौल के बीच कैप्टन स्मित मच्छार खुद गंभीर रूप से घायल हो चुके थे। इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं छोड़ी। घायल अवस्था में उन्होंने किसी तरह कॉकपिट का दरवाजा खोलने में सफलता हासिल की। दरवाजा खुलने के बाद यात्रियों और क्रू के सदस्यों को कॉकपिट तक पहुंचने का मौका मिला। यही कदम आगे चलकर विमान में सवार लोगों की सुरक्षा के लिए बेहद अहम साबित हुआ।
विश्व नेताओं ने बताया कैप्टन स्मित मच्छार 'हीरो'
इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के कार्यालय के अनुसार, गंभीर रूप से घायल कैप्टन स्मित मच्छार ने अपनी बची हुई ताकत जुटाकर कॉकपिट के दरवाजे का रिलीज सिस्टम एक्टिव कर दिया। दरवाजा खुलते ही कुछ यात्री तेजी से कॉकपिट में पहुंचे और हमलावर को काबू करने में मदद की। विमान में मौजूद ऑफ-ड्यूटी पायलटों ने भी स्थिति संभालने में अहम भूमिका निभाई। इसके बाद विमान को सऊदी अरब के तबुक एयरपोर्ट पर सुरक्षित उतारा गया। कल्पना कीजिए, उस वक्त कैप्टन मच्छार खुद गंभीर रूप से घायल थे और उनकी अपनी जिंदगी भी खतरे में थी। इसके बावजूद उन्होंने ऐसा कदम उठाया, जिससे विमान में सवार लोगों को बचाने का रास्ता खुला।
घटना के बाद इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कैप्टन स्मित मच्छार की बहादुरी की सार्वजनिक रूप से प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद मच्छार ने हमलावर का सामना किया, कॉकपिट का दरवाजा खोलने में सफलता हासिल की और यात्रियों व क्रू को हमलावर पर काबू पाने का मौका दिया। नेतन्याहू ने कहा कि इस कार्रवाई से लोगों की जान बची और मच्छार को 'सच्चा हीरो' बताया। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कैप्टन मच्छार के साहस और दूसरों की सुरक्षा को प्राथमिकता देने के उनके प्रयास की सराहना की। इस घटना के बाद भारतीय पायलट की बहादुरी की चर्चा भारत के साथ-साथ इजरायल और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हुई।
हालांकि, स्मित मच्छार की कहानी को सिर्फ एक विमान में हुई घटना तक सीमित नहीं देखा जा रहा है। यह उस मानवीय साहस की याद भी दिलाती है, जिसमें संकट की घड़ी में इंसान अपनी सुरक्षा से पहले दूसरों की जिंदगी की चिंता करता है। तभी तो कवि मैथिलीशरण गुप्त अपनी कविता 'मनुष्यता' में लिखते हैं कि-
"विचार लो कि मर्त्य हो न मृत्यु से डरो कभी¸
मरो परन्तु यों मरो कि याद जो करे सभी।
हुई न यों सु–मृत्यु तो वृथा मरे¸ वृथा जिये¸
मरा नहीं वहीं कि जो जिया न आपके लिए।
यही पशु–प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे¸
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।"
Neerja Bhanot (File Photo)
1986 में नीरजा भनोट ने भी दिखाई थी ऐसी ही मिसाल
वहीं इस घटना से ठीक 40 साल पहले एक भारतीय महिला ने भी अद्यम साहस का उदाहरण दिया था। वो नाम 'नीरजा भनोट' का है। "आँखें मिलाएंगे डर से, गुज़रेंगे मुश्किलों के मोहल्ले से, निकले हैं जूनून ले के घर से, आँखें मिलायेंगे डर से"- ये लाइनें 'नीरजा' फिल्म के एक गीत की हैं, जो उनके जज्बे को बखूबी ढंग से बयां करती हैं। साल 2016 आई नीरजा भनोट के जीवन पर आधारित यह फिल्म हम सब ने देखी ही होगी। स्मित मच्छार की घटना ने एक बार फिर नीरजा भनोट के बलिदान को भी ताजा कर दिया है।
5 सितंबर 1986 को पैन एम की फ्लाइट 73 कराची एयरपोर्ट पर खड़ी थी। विमान में बड़ी संख्या में यात्री मौजूद थे। तभी हथियारों से लैस आतंकियों ने विमान को हाईजैक कर लिया। उस वक्त फ्लाइट की सीनियर पर्सर थीं नीरजा भनोट। विमान का कॉकपिट क्रू किसी तरह वहां से बाहर निकलने में सफल हो गया था। इसके बाद यात्रियों की सुरक्षा की सबसे बड़ी जिम्मेदारी नीरजा और केबिन क्रू के दूसरे सदस्यों पर आ गई। मुश्किल हालात के बीच नीरजा ने बेहद सूझबूझ दिखाई। उन्होंने यात्रियों के पासपोर्ट छिपाने शुरू कर दिए, ताकि आतंकियों को अमेरिकी यात्रियों की पहचान करने में मुश्किल हो। वह लगातार यात्रियों को संभालती रहीं और जब मौका मिला तो इमरजेंसी एग्जिट खोलकर लोगों को विमान से बाहर निकलने में मदद की।
गोलियों की बौछार के बीच भी नहीं भागीं नीरजा
हालात उस समय और भयावह हो गए, जब आतंकियों ने यात्रियों पर गोलियां चलानी शुरू कर दीं। नीरजा के पास खुद को सुरक्षित बाहर निकालने का मौका था, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। वह यात्रियों और खासकर बच्चों को सुरक्षित निकालने में जुटी रहीं। इसी दौरान वह गोलियों की चपेट में आ गईं। नीरजा भनोट उस समय महज 22 साल की थीं। उन्होंने अपनी जान गंवाई, लेकिन उनके साहस और सूझबूझ की वजह से बड़ी संख्या में यात्रियों को सुरक्षित निकलने का मौका मिला। उनकी बहादुरी को सम्मान देते हुए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया। वह इस सम्मान को पाने वाली पहली महिला और सबसे कम उम्र की शख्सियतों में शामिल थीं।
नीरजा की कहानी और कैप्टन स्मित मच्छार की घटना के बीच करीब चार दशकों का अंतर है। दोनों की भूमिकाएं अलग थीं- नीरजा फ्लाइट पर्सर थीं, जबकि स्मित मच्छार पायलट हैं। एक के सामने हथियारबंद आतंकियों का खतरा था, तो दूसरे को कॉकपिट के अंदर ही हमले का सामना करना पड़ा। समय, परिस्थितियां और खतरा अलग होने के बावजूद दोनों घटनाओं में एक समान बात नजर आती है। जब उनकी अपनी जिंदगी खतरे में थी, तब भी उन्होंने सिर्फ खुद को बचाने के बारे में नहीं सोचा। उनके सामने मौजूद दूसरे लोगों की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण थी। यही साहस इन दोनों घटनाओं को एक-दूसरे से जोड़ता है।
