क्या विदेशी चंदे से बने स्कूल, अस्पताल और अनाथालय अब सीधे सरकार के नियंत्रण में आ जाएंगे? क्या नया FCRA बिल वाकई देश के NGO और धार्मिक संस्थाओं की स्वायत्तता पर लगाम लगाने के लिए है या यह केवल पारदर्शिता का जरिया है? भारत के संसद भवन से उठा यह सवाल अब एक बड़ा कूटनीतिक मुद्दा बन चुका है। अमेरिकी सांसद राइली मूर के तीखे आरोपों के बाद भारत के विदेश मंत्रालय को खुद सामने आकर मोर्चा संभालना पड़ा। आखिर FCRA Amendment Bill, 2026 को लेकर इतना बवाल क्यों मचा है और सरकार इस पर क्या सफाई दे रही है आइए समझते हैं।
क्या है FCRA कानून और नए बिल में क्या है खास?
आइे पहले जान लेते हैं कि FCRA बिल क्या है। Foreign Contribution (Regulation) Act या FCRA भारत में वह मुख्य कानून है जो गैर-सरकारी संगठनों (NGOs), ट्रस्टों, शैक्षणिक संस्थानों, धर्मार्थ संस्थाओं और धार्मिक संगठनों को विदेश से मिलने वाले चंदे को नियंत्रित और रेगुलेट करता है। भारत की संप्रभुता, लोकतांत्रिक संस्थाओं और आंतरिक सुरक्षा को किसी भी तरह के विदेशी दखल से सुरक्षित रखने के लिए विदेश से चंदा लेने वाली हर संस्था के लिए गृह मंत्रालय से FCRA रजिस्ट्रेशन लेना अनिवार्य होता है। इसके 4 मुख्य प्रावधान हैं।
विधेयक के 4 मुख्य प्रावधान:
डेजिग्नेटेड अथॉरिटी का गठन: यदि किसी संस्था का FCRA लाइसेंस रद्द होता है, एक्सपायर होता है या वह इसे सरेंडर करती है, तो सरकार द्वारा नियुक्त एक 'नामित अधिकारी' अस्थायी रूप से उस संस्था की संपत्तियों और विदेश-वित्तपोषित प्रोजेक्ट्स का प्रबंधन अपने हाथ में ले सकेगा।
कम से कम खर्च का मानदंड: लाइसेंस के नवीनीकरण के लिए संस्था को पिछले दो वित्तीय वर्षों में न्यूनतम 10 लाख रुपये का विदेशी फंड उपयोग करना अनिवार्य होगा।
पारदर्शिता और सोशल मीडिया डिस्क्लोजर: संस्थाओं को अपने भौतिक पते, चालू वेबसाइट्स और सोशल मीडिया खातों का विवरण सरकार को देना होगा।
धार्मिक स्थलों का संरक्षण: बिल में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि यदि किसी टेकओवर की गई संपत्ति में कोई पूजा स्थल या धार्मिक स्थल शामिल है, तो उसके धार्मिक चरित्र को हर हाल में सुरक्षित रखा जाएगा।
अमेरिका को क्यों है ऐतराज?
इस विधेयक पर सबसे तीखी प्रतिक्रिया अमेरिका के रिपब्लिकन सांसद राइली मूर की तरफ से आई है। मूर ने सोशल मीडिया पर इस बिल को निशाना बनाते हुए इसे 'ईसाइयों पर सीधा हमला' करार दिया।
अमेरिकी सांसद राइली मूर ने दावा किया कि ईसाई धर्म का भारत में इतिहास संत थॉमस के आगमन के समय से रहा है। लेकिन इस विधेयक के जरिए भारतीय सरकार के पास लाइसेंस रद्द होने की आड़ में चर्चों, धार्मिक संस्थाओं, स्कूलों और अस्पतालों को अपने नियंत्रण में लेने का अधिकार आ जाएगा। अगर यह बिल इसी रूप में आगे बढ़ता है, तो यह भारत-अमेरिका के द्विपक्षीय संबंधों के लिए गंभीर चिंता का विषय बन सकता है।
'यह भारत का आंतरिक मामला है': विदेश मंत्रालय का जवाब
अमेरिकी सांसद के इस बयान पर भारत सरकार ने कड़ा ऐतराज जताया है। विदेश मंत्रालय (MEA) के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने विदेशी आलोचना को पूरी तरह खारिज कर दिया। रणधीर जायसवाल ने साफ कहा, "भारत का कानून बनाना और उसकी विधायी प्रक्रियाएं देश का विशुद्ध रूप से आंतरिक मामला है, जिस पर फैसला केवल भारत की संसद करती है।"
भारत ने यह भी याद दिलाया कि अमेरिका सहित दुनिया के कई अन्य देश भी अपने यहां विदेश से आने वाले पैसों और फंडिंग को कड़ाई से रेगुलेट करते हैं।
विपक्ष और सिविल सोसाइटी को क्या है डर?
विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस और उनके सहयोगी दल, पूर्वोत्तर राज्यों के जनप्रतिनिधि और चर्च निकायों का तर्क है कि
लाइसेंस का नवीनीकरण न होना केवल प्रक्रियात्मक खामी हो सकती है, न कि कोई अपराध। ऐसे में सरकार को किसी भी संस्था की संपत्ति जैसे स्कूल, अस्पताल या आश्रम जब्त करने या अपने नियंत्रण में लेने का अधिकार देना स्वतंत्र NGO के वजूद पर हमला है। इससे स्वतंत्र संगठनों पर सरकारी नियंत्रण और दबाव बहुत ज्यादा बढ़ जाएगा।
गृह मंत्री ने साफ की मंशा
बढ़ती आशंकाओं और विवाद के बीच गृह मंत्री अमित शाह ने खुद मोर्चा संभाला और चर्च निकायों व पूर्वोत्तर के प्रतिनिधिमंडलों, जिसमें मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा भी शामिल थे, उनके साथ मैराथन बैठकें कीं। जिसमें अमित शाह ने आश्वासन दिया कि यह बिल किसी खास समुदाय या धर्म के खिलाफ नहीं है। साथ ही सरकार ने साफ किया है कि यह कानून पिछली तारीखों से लागू नहीं किया जाएगा। सरकार का कहना है कि नामित अधिकारी का प्रावधान केवल इसलिए बनाया गया है ताकि विदेशी पैसों से बनाई गई राष्ट्रीय संपत्तियों का गलत इस्तेमाल, धोखाधड़ी या डायवर्जन न हो सके।
आगे क्या होगा?
संसद का मानसून सत्र अपने अंतिम चरण में है। सरकार इस विधेयक को जल्द से जल्द पारित कराने की तैयारी में है, जबकि विपक्षी दल इसे संयुक्त संसदीय समिति (JPC) या प्रवर समिति के पास भेजने की मांग कर रहे हैं।
संसद के भीतर होने वाली यह बहस न केवल देश के NGO और चैरिटी सेक्टर के भविष्य को तय करेगी, बल्कि वैश्विक स्तर पर भारत के कूटनीतिक रुख को भी रेखांकित करेगी।