स्विट्जरलैंड में चलेंगे AC, भारत गर्मी से जलेगा; ऐसी होगी 2050 की डराने वाली तस्वीर
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के अध्ययन के मुताबिक, अगर वैश्विक तापमान 2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ता है तो 2050 तक दुनिया की करीब आधी आबादी जानलेवा गर्मी झेलने को मजबूर होगी। भारत सहित कई देशों पर इसका बेहद गंभीर असर पड़ेगा। 1.5 डिग्री पार करते ही हालात बिगड़ने लगेंगे, जिससे ऊर्जा, स्वास्थ्य और जीवनशैली पर बड़ा संकट खड़ा होगा और यह हकीकत बहुत जल्द सामने आ सकती है।
- Authored by: Digpal Singh
- Updated Jan 30, 2026, 05:13 PM IST
जलवायु परिवर्तन हम सभी के लिए एक बड़ी समस्या है। आज भले ही इसके दुष्प्रभाव न दिख रहे हों या बहुत कम नजर आ रहे हों, भविष्य में यह विकराल रूप ले सकते हैं। जो हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए बहुत ही खतरनाक हो सकते हैं। संभव है कि हम लोगों में से बहुत से लोग उन दुष्प्रभावों को अपनी आंखों से देखें और महसूस करें। क्योंकि 2050 ज्यादा दूर नहीं है, जब ग्लोबल वॉर्मिंग और जलवायु परिवर्तन के कारण प्रचंड गर्मी का सामना करना पड़ेगा। गर्मी भी ऐसी-वैसी नहीं, बल्कि जानलेवा गर्मी।
जलवायु परिवर्तन को लेकर एक चिंताजनक चेतावनी सामने आई है। यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड के एक नए अध्ययन में कहा गया है कि यदि वैश्विक तापमान औद्योगिक काल से पूर्व के स्तर (pre-industrial levels) से 2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ता है, तो साल 2050 तक दुनिया की लगभग आधी आबादी यानी 3.79 अरब लोग अत्यधिक गर्मी की चपेट में आ जाएंगे। वैज्ञानिकों के मुताबिक यह भविष्य की यह तस्वीर अब तेजी से संभावना के और करीब पहुंचती जा रही है।
43 फीसद आबादी अत्यधिक गर्मी से जूझेगी
यह अध्ययन प्रतिष्ठित जर्नल Nature Sustainability में छपा है। शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि गर्मी के सबसे बड़े असर 1.5 डिग्री सेल्सियस के उस लक्ष्य को पार करते ही दिखने लगेंगे, जिसे पेरिस जलवायु समझौते में तय किया गया था। आंकड़ों के मुताबिक, 2010 में दुनिया की 23 फीसद आबादी अत्यधिक गर्मी वाले हालात से जूझ रही थी, जो आने वाले दशकों में बढ़कर 41 फीसद तक पहुंच सकती है।
इन देशों में होगा गर्मी से बुरा हाल
रिपोर्ट के मुताबिक, सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक, नाइजीरिया, साउथ सूडान, लाओस और ब्राजील जैसे देशों में तापमान में बढ़ोतरी का सबसे ज्यादा असर देखने को मिलेगा। वहीं, अगर प्रभावित आबादी की बात करें तो, सबसे ज्यादा प्रभावित देशों में भारत के साथ ही पड़ोसी देश पाकिस्तान और बांग्लादेश के अलावा फिलीपींस, नाइजीरिया और इंडोनेशिया शामिल हैं। इन देशों में करोड़ों लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर इसका सीधा असर देखने को मिलेगा।
गर्मी से तपेंगे ऑस्ट्रिया-कनाडा
अपेक्षाकृत ठंडी जलवायु वाले देशों में भी असहज गर्म दिनों की संख्या में काफी तेज बढ़ोतरी देखने को मिलेगी, जो अभी से दोगुनी हो सकती है। अध्ययन के मुताबिक, 2006–2016 की अवधि से अगर तुलना की जाए तो उस दौरान वैश्विक तापमान में 1 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हुई थी, इसके 2 डिग्री तक पहुंचने पर ऑस्ट्रिया और कनाडा जैस देशों में गर्म दिनों की संख्या दोगुनी हो जाएगी। ब्रिटेन, स्वीडन और फिनलैंड जैसे देशों में गर्म दिनों की संख्या 150 फीसद, नॉर्वे में 200 फीसद और आयरलैंड में 230 फीसद तक बढ़ सकती है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि इन अपेक्षाकृत ठंडे देशों का बुनियादी ढांचा और यहां की इमारतें ठंडे मौसम को ध्यान में रखकर बनाई गई हैं। ऐसे में तापमान में थोड़ी सी भी बढ़ोतरी होने पर लोगों को दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। विशेष तौर पर उन जगहों के मुकाबले, जहां अभी गर्मी ज्यादा पड़ती है और वे उसके लिए तैयार रहते हैं।
ठंडे देशों में एयर कंडीशनर की जरूरत पडेगी
इस अध्ययन के प्रमुख लेखक डॉ. जीसस लिजाना का कहना है कि तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी होने से पहले ही एयर कंडीशनिंग और हीटिंग की मांग में बड़े बदलाव आ जाएंगे। आने वाले पांच वर्षों में ही यहां के कई घरों में एयर कंडीशनिंग की जरूरत पड़ सकती है, जबकि अगर ग्लोबल वॉर्मिंग 2 डिग्री तक बढ़ती है तो तापमान आगे और भी बढ़ता रहेगा।
वेक-अप कॉल है ये रिपोर्ट
ऑक्सफोर्ड मार्टिन फ्यूचर ऑफ कूलिंग प्रोग्राम की प्रमुख डॉ. राधिका खोसला ने इसे 'वेक-अप कॉल' बताते हुए कहा कि 1.5 डिग्री से अधिक गर्मी शिक्षा, स्वास्थ्य, खेती और माइग्रेशन जैसी व्यवस्थाओं पर अभूतपूर्व असर डालेगी। उनके अनुसार, नेट-जीरो और टिकाऊ विकास ही इस बढ़ती गर्मी से निपटने का एकमात्र उपाय है।
अध्ययन में यह भी कहा गया है कि अत्यधिक गर्मी के कारण कूलिंग सिस्टम्स की मांग बढ़ेगी, जिससे कार्बन उत्सर्जन में और भी इजाफा होगा। कनाडा और स्विट्जरलैंड जैसे अपेक्षाकृत ठंडे देशों में हीटिंग की मांग घटेगी और गर्मी बढ़ने लगेगी।