बाढ़ के पानी ने गांवों, सड़कों और सीमावर्ती बुनियादी ढांचे को तहस-नहस कर दिया। लेकिन नेपाल-तिब्बत सीमा के चीनी हिस्से में एक अलग ही तरह नजारा दिखाई दे रहा है। तिब्बत के स्थानीय लोगों द्वारा तबाही की भयावहता दर्शाने वाले वीडियो कथित तौर पर राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा चीनी सोशल मीडिया से हटा दिए गए हैं। इस विरोधाभास ने आपदा से निपटने के चीन के तरीके पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जहां नेपाल में पत्रकार प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और जमीनी स्तर से तस्वीरें एकत्र कर रहे हैं और नेपाली सरकार भी मौजूदा घटनाक्रमों के बारे में पारदर्शी है, वहीं सीमा के चीनी हिस्से से उभरने वाली जानकारी ज्यादातर सरकारी नियंत्रण वाले मीडिया के माध्यम से ही आ रही है।
नेपाल और तिब्बत सीमा पर ग्लेशियर फटने (Glacial Collapse) से आई भीषण फ्लैश फ्लड ने एक ओर जहां नेपाल में 730 से अधिक लोगों की जान ले ली और तबाही का मंजर पूरी दुनिया के सामने है, वहीं सीमा के दूसरी तरफ चीनी कब्जे वाले तिब्बत में घटी भयानक त्रासदी पर बीजिंग ने सेंसरशिप का पर्दा डाल दिया है। स्थानीय तिब्बतियों द्वारा सोशल मीडिया (Wechat, Douyin) पर पोस्ट किए गए तबाही और कीचड़ के सैलाब के वीडियो चीनी इंटरनेट से रहस्यमय तरीके से गायब किए जा रहे हैं।
सच दबाने का 'डिजिटल खेल'
मीडिया रिपोर्ट्स और 'द न्यूयॉर्क टाइम्स' की जांच के अनुसार, 26 अगस्त को आए सैलाब ने चीन-नेपाल सीमा पर स्थित रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण कीरोंग पोर्ट (Gyirong Port) को बुरी तरह तबाह कर दिया। स्थानीय लोगों ने कीरोंग सीमा पर पानी और मलबे के भयंकर सैलाब में इमारतों को बहते हुए वीडियो पोस्ट किए थे। लेकिन 24 से 48 घंटे के भीतर इन सभी नागरिक वीडियो को हटा दिया गया या उनके अकाउंट्स को ब्लॉक कर दिया गया।
हेरफेर की गई मीडिया कवरेज
'द टेलीग्राफ' के मुताबिक, चीन के सरकारी मीडिया (जैसे CCTV और पीपुल्स डेली) ने तबाही की जगह केवल आधिकारिक बचाव दल, हेलिकॉप्टर और सेना की मदद की चुनिंदा तस्वीरें दिखाईं और जमीनी तबाही के वीडियो को पूरी तरह ब्लर या गायब कर दिया।
क्यों खामोश है शी जिनपिंग सरकार?
बीजिंग का यह रुख नया नहीं है। जब भी चीन में कोई बड़ी आपदा या सरकार की नाकामी उजागर होने का खतरा होता है, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) का पहला कदम सूचनाओं पर रोक लगाना होता है।
मौतों के आंकड़ों पर सवाल
जहां नेपाल खुले तौर पर अपनी तबाही (730 से अधिक मौतें और 2,500 से ज्यादा लापता) को स्वीकार कर रहा है, वहीं चीन ने अपने क्षेत्र में मौतों की संख्या महज कुछ दहाई तक सीमित रखी है, जबकि कीरोंग काउंटी से ही 550 से अधिक लोग गायब बताए जा रहे हैं। लंदन यूनिवर्सिटी के एसओएएस (SOAS) चाइना इंस्टीट्यूट के निदेशक स्टीव त्सांग के अनुसार, तिब्बत में घटने वाली हर घटना को बीजिंग 'राष्ट्रीय सुरक्षा' के नजरिए से देखता है। बिना शीर्ष नेतृत्व की मंजूरी के वहां से कोई भी स्वतंत्र रिपोर्ट बाहर नहीं आ सकती।
बुहान कोविड से लेकर तिब्बत फ्लड तक लीपापोती, 4 कारण?
- चीन ने तिब्बत के संवेदनशील हिमालयी इलाकों में बड़े पैमाने पर बांध, जलविद्युत परियोजनाएं और सड़कें बनाई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस अनियंत्रित निर्माण ने क्षेत्र को और संवेदनशील बनाया। तबाही के वीडियो लीक होने से उसके बुनियादी ढांचे के दावों पर सवाल उठ सकते हैं।
- तिब्बत एक बेहद संवेदनशील और चीनी नियंत्रण वाला क्षेत्र है। वहां किसी भी तरह की नागरिक असंतोष या प्रशासनिक नाकामी की खबरें अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठने से रोकने के लिए पूर्ण सेंसरशिप लगाई गई है।
- राष्ट्रपति शी जिनपिंग की सरकार हमेशा खुद को हर आपदा से निपटने में सक्षम दिखाना चाहती है। इसलिए सोशल मीडिया पर नागरिकों की चीख-पुकार के बजाय केवल राहत अभियान में जुटी पीएलए (PLA) सेना की हीरो वाली छवि पेश की जाती है।
- विदेशी पत्रकारों को तिब्बत जाने की अनुमति नहीं है। यहां तक कि दूरभाष या इंटरनेट से वहां के लोगों से संपर्क करने पर भी निगरानी रखी जा रही है।
विशेषज्ञों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता
विशेषज्ञों ने इस सेंसरशिप पर चिंता जताते हुए कहा कि जिस तरह चीन ने वुहान में कोविड-19 की शुरुआत में जानकारी छिपाई थी, वही पैटर्न वह तिब्बत आपदा में अपना रहा है। सूचना दबाने से न सिर्फ मानवीय राहत कार्यों में बाधा आती है, बल्कि सीमापार फंसे सैकड़ों विदेशी नागरिकों और तीर्थयात्रियों की वास्तविक स्थिति का पता लगाना भी मुश्किल हो जाता है। नेपाल के पूर्व सांसदों ने भी चीन की इस अपारदर्शिता पर सवाल खड़े करते हुए कहा है कि सबूतों और वीडियो को हटाने से सच नहीं छिपता, बल्कि यह ड्रैगन के इरादों पर गहरे सवाल खड़े करता है।