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सड़क से ज्यादा स्क्रीन पर लड़ी गई लड़ाई! विश्व भर में Gen Z ने कैसे बदला विरोध का तरीका

कार्नेगी एंडाउमेंट की रिपोर्ट के मुताबिक डिजिटल तकनीक के दम पर लाखों युवाओं को एकजुट करने की क्षमता ने कई देशों में सरकारों के खिलाफ अभूतपूर्व असंतोष को जन्म दिया है, फिर भी कई सरकारें इन मुद्दों को सुलझाने के बजाय डिजिटल दमन और युवाओं को सत्ता से दूर रखने पर ही अड़ी रहीं।

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हाल के वर्षों में विश्व के कई हिस्सों में हुए जेन जी के प्रोटेस्ट। तस्वीर-AI
Written by: Alok Rao
Updated Jul 26, 2026, 14:29 IST
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Gen Z Protest : एक क्रांति बिना किसी नेता के। एक आंदोलन जो व्हाट्सऐप ग्रुप में शुरू होता है और कुछ ही घंटों में सरकार गिरा देता है। ये कोई फिल्म का सीन नहीं है, ये 2025-26 की असली कहानी है। नेपाल में एक प्रधानमंत्री की कुर्सी गई, बांग्लादेश में सरकार बदली, मोरक्को की सड़कों पर हजारों नौजवान उतरे और अब भारत में शिक्षा मंत्री की कुर्सी चली गई। इन सबके पीछे एक ही 'हथियार' था और वह था स्मार्टफोन की स्क्रीन। सवाल ये है कि धरना-प्रदर्शन का पुराना तरीका क्या अब खत्म हो चुका है? क्या अब क्रांतियां चौक-चौराहों पर नहीं, बल्कि इंस्टाग्राम रील्स के जरिए लड़ी जाएंगी?

नेपाल में ओली को देना पड़ा PM पद से इस्तीफा

सितंबर 2025 में नेपाल सरकार ने भ्रष्टाचार और परिवारवाद के खिलाफ उठ रही आवाजों को दबाने के लिए 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बैन कर दिए-यूट्यूब, एक्स, सब कुछ बंद। लेकिन नतीजा उल्टा निकला। इस बैन, भ्रष्टाचार और सरकारी जवाबदेही की मांग को लेकर Gen Z के विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। पांच दिनों के हिंसक आंदोलन में प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली को इस्तीफा देना पड़ा, संसद और राष्ट्रपति भवन तक में आग लगा दी गई, और सोशल मीडिया पर बैन वापस लेना पड़ा।

nepal protest

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मोरक्को में सरकार के खिलाफ उतरे युवा

ये सिलसिला अकेले नेपाल तक सीमित नहीं रहा। कार्नेगी एंडाउमेंट की रिपोर्ट के मुताबिक डिजिटल तकनीक के दम पर लाखों युवाओं को एकजुट करने की क्षमता ने कई देशों में सरकारों के खिलाफ अभूतपूर्व असंतोष को जन्म दिया है, फिर भी कई सरकारें इन मुद्दों को सुलझाने के बजाय डिजिटल दमन और युवाओं को सत्ता से दूर रखने पर ही अड़ी रहीं। मोरक्को में भी यही देखने को मिला नौजवानों ने बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, आवास और रोजगार जैसी मांगों को सीधे सोशल मीडिया पर रखा। मोरक्को में भी युवाओं ने लड़ाई बिना किसी पारंपरिक यूनियन या पार्टी के सहारे लड़ी। यहां भी उनका सबसे बड़ा 'हथियार' सोशल मीडिया ही था।

'मीम फेस्ट' जैसा बन गया प्रदर्शन

अब बात करते हैं भारत की। जुलाई 2026 में दिल्ली के जंतर-मंतर पर हजारों छात्र सड़कों पर उतरे। मांग थी नीट पेपर लीक के लिए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा होना चाहिए। यह प्रदर्शन भारत के इंटरनेट पर एक 'मीम फेस्ट' जैसा बन गया। दिल्ली की सड़कें किसी इंस्टाग्राम फीड जैसी दिखने लगीं। पोस्टर और ग्रैफिटी से सजी सड़कें, प्रदर्शनकारियों की भाषा में सरकार पर तंज कसते वन-लाइनर्स। एक 20 साल की प्रदर्शनकारी ने कहा कि सरकार युवाओं के प्रति अपनी जिम्मेदारी से 'लीक' कर रही है। एक ऐसा शब्द जो सीधे पेपर लीक विवाद पर तंज है। एक और युवती ने प्रदर्शन के दिन का वीडियो बनाकर इंस्टाग्राम पर डाला और कैप्शन दिया 'आज हमने संसद की घंटी बजाई और भाग गए।' ये है नई पीढ़ी का प्रदर्शन गुस्सा भी है, लेकिन अंदाज पूरी तरह डिजिटल-देसी है।

gen z protest

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युवाओं में है एक गहरी बेचैनी

आज की जेनजी के बारे में मशहूर लेखक जोनाथन हाइड की किताब है 'द एंक्शस जेनरेशन'। इस किताब में उन्होंने लिखा है कि आज की युवा पीढ़ी दुनिया के सामने आत्मविश्वास से लबरेज दिखती है लेकिन अपने भीतर से एक गहरी बेचैनी लिए जी रही है। उनकी ये बेचैनी व्यवस्था, सरकार और अपने भविष्य को लेकर है। हर चीज पर रील बनाओ, शेयर और वायरल करो। यह एक ऐसा बोध है जो सिर्फ 'पैशन' से नहीं आती। वो एक बेचैनी से आती है कि अगर मैंने शेयर नहीं किया तो उसमें मेरी आवाज नहीं है।

क्या सच में टिकाऊ बदलाव ला पाते हैं ऐसे आंदोलन?

यहीं पर एक बड़ा सवाल खड़ा होता है। क्या बिना नेता वाले, सोशल मीडिया से जन्मे ये आंदोलन सच में टिकाऊ बदलाव ला पाते हैं? काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के जोशुआ कर्लांत्जिक की राय इस पर बेहद दिलचस्प है। उनका कहना है कि सोशल मीडिया के भरोसे संगठित होने वाले प्रदर्शन अक्सर सतही साबित होते हैं और सरकारें आसानी से इन्हें कुचल सकती हैं, या ये असरदार शासन में तब्दील ही नहीं हो पाते। उनका ये भी कहना है कि सरकारें अब सोशल मीडिया को हथियार बनाकर दुष्प्रचार फैला रही हैं, प्रदर्शनकारियों में फूट डाल रही हैं, और ताकत के दम पर उन प्रदर्शनकारियों को डरा रही हैं जिनकी प्रतिबद्धता वैसे भी सतही होती है।

jantar mantar

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इस पीढ़ी की भाषा मीम्स, रील्स और हैशटैग की

फिर भी, विशेषज्ञ मानते हैं कि ये सिर्फ शुरुआत है। 2026 में अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, फ्रांस और बांग्लादेश जैसे देशों में और भी युवा-नेतृत्व वाले आंदोलनों की आशंका जताई जा रही है जिनका असर आने वाले चुनावों पर भी पड़ सकता है। तो सवाल ये नहीं कि अगला आंदोलन कहां भड़केगा? सवाल ये है कि क्या सरकारें आखिरकार समझेंगी कि इस पीढ़ी की भाषा मीम्स, रील्स और हैशटैग की है, या फिर हर बार लाठी और इंटरनेट बैन से ही जवाब देती रहेंगी? इस पीढ़ी ने विरोध का व्याकरण बदल दिया है। यह गुस्सा, आक्रोश अब सड़क से स्क्रीन तक जा रहा है।

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