Times Now Navbharat Special: 12 जून 2025 की वो काली दोपहर... जब आसमान से मौत बरसने की एक खौफनाक आवाज आई और कुछ ही सेकंड में कई हंसते-खेलते परिवारों की दुनिया हमेशा के लिए उजड़ गई। आज इस भयावह विमान हादसे को पूरा एक साल बीत चुका है। वक्त बीतने के साथ सरकारी फाइलों में तारीखें बदली हैं और पीड़ित परिवारों के खातों में मुआवजे की रकम भी पहुंची है, लेकिन अपनों को खोने का जो खालीपन है, वह आज भी जस का तस है।
अहमदाबाद प्लेन क्रैश हादसे (Ahmedabad Plane Crash) की पहली बरसी पर टाइम्स नाउ नवभारत ने अहमदाबाद, वडोदरा, सूरत, जामनगर, खेड़ा और दीव में उन पीड़ित परिवारों से बात की, जिनका कोई अपना इस हादसे में खोया था। जब हम इनसे उस काले हादसे के बारे में बात कर रहे थे, तब उनकी आंखें एक ही बात कह रही थी- "हमें सिर्फ मुआवजा नहीं, हादसे की सच्चाई और इंसाफ चाहिए।"
तीन महीने बाद ही मिट गया माथे का सिंदूर
वडोदरा की हेतल प्रजापति की दुनिया शादी के महज तीन महीने बाद ही बिखर गई। उन्होंने अपने पति महेश कालावाडिया के साथ मिलकर भविष्य के कई हसीन सपने बुने थे। लेकिन उस मनहूस दिन, जब महेश अपनी एक्टिवा से जा रहे थे, वे अचानक इस विमान हादसे की चपेट में आ गए। हेतल बताती हैं कि प्रेम विवाह के कारण उनके ससुराल वालों ने उन्हें कभी स्वीकार नहीं किया और हादसे के बाद पैसों को लेकर विवाद शुरू हो गया। हेतल ने बड़प्पन दिखाते हुए टाटा समूह और सरकार से मिले 1.25 करोड़ रुपये के मुआवजे में से करीब 60 लाख रुपये अपने सास-ससुर को सौंप दिए।
हेतल नम आंखों से सवाल करती हैं- "आर्थिक सहायता से जीवन की कुछ मुश्किलें कम हो सकती हैं, लेकिन मेरे जीवनसाथी को खोने का दर्द कभी कम नहीं होगा। सरकार को ब्लैक बॉक्स का पूरा डेटा सार्वजनिक करना चाहिए, हमें सच्चाई जानने का पूरा हक है।"
हेतल प्रजापति अपने पति के साथ
आज भी प्लेन की आवाज से नींद उड़ जाती है
सूरत के रहने वाले और बी.जे. मेडिकल कॉलेज के सेकंड ईयर के छात्र यश खत्री आज भी उस खौफ से उबर नहीं पाए हैं। हादसे के वक्त वे मेस में खाना खाकर निकल ही रहे थे कि लगातार 10-12 धमाके हुए और मेस की दीवार उनके ऊपर गिर गई। यश मलबे में दब गए थे, उनके हाथ-पैर और पीठ पर गंभीर चोटें आईं। लेकिन इस शारीरिक दर्द से कहीं बड़ा जख्म उनके दिल पर लगा, जब उन्हें पता चला कि इस हादसे में उनके बैच के दो और सीनियर बैच के दो साथियों की मौत हो गई है।
यश कहते हैं, "हम रोज साथ बैठते थे, पढ़ते थे... आज भी हॉस्टल में जब रात को विमान की तेज आवाज आती है, तो डर से मेरी नींद उड़ जाती है।"
बेटे को खो दिया, पत्नी का इलाज अब भी जारी
अहमदाबाद विमान हादसे में जान गंवाने वाले आकाश पटनी के पिता सुरेशभाई ने हादसे के एक साल बाद उस भयावह दिन को याद करते हुए कहा कि विस्फोट की आवाज इतनी तेज थी कि उन्हें पहले लगा जैसे कोई बड़ा बम धमाका हुआ हो। हादसे में उनके बेटे आकाश की मौत हो गई थी, जबकि उनकी पत्नी गंभीर रूप से झुलस गई थीं और आज भी उनका इलाज जारी है। सुरेशभाई ने बताया कि हादसे वाले दिन उन्होंने बेटे को टिफिन देकर भेजा था और खुद ऑटो रिक्शा लेकर पास के इलाके में सवारी छोड़ने गए थे। तभी अचानक जोरदार धमाके की आवाज सुनाई दी और आसमान में काले धुएं का विशाल गुबार दिखाई दिया। उन्हें अंदाजा हो गया कि इलाके में कोई बड़ा हादसा हुआ है, जिसके बाद वे तुरंत घटनास्थल की ओर लौटे। उन्होंने कहा कि जब वे मौके पर पहुंचे तो आग इतनी भीषण थी कि अंदर जाना संभव नहीं था। इसी दौरान उनके भतीजे का फोन आया, जिसने बताया कि उनकी पत्नी को इलाज के लिए सिविल अस्पताल ले जाया गया है, लेकिन बेटे आकाश का कोई पता नहीं चल रहा है। सुरेशभाई के अनुसार, कुछ देर बाद उन्हें सिविल अस्पताल बुलाया गया। वहां पहुंचने पर पता चला कि उनकी पत्नी गंभीर रूप से झुलसी हुई हैं और ट्रॉमा सेंटर में भर्ती हैं। वहीं आकाश को पोस्टमॉर्टम प्रक्रिया के लिए भेज दिया गया था। उन्होंने कहा कि उसी समय उन्हें समझ आ गया था कि उनका बेटा अब इस दुनिया में नहीं रहा। उन्होंने बताया कि उनकी पत्नी आज भी झुलसने से हुई गंभीर चोटों का इलाज करा रही हैं। फिलहाल उनका उपचार निजी अस्पताल में चल रहा है और आगे भी लंबा इलाज बाकी है। सुरेशभाई का आरोप है कि उन्होंने इलाज और संभावित प्लास्टिक सर्जरी को लेकर एयर इंडिया और टाटा समूह से संपर्क किया था, लेकिन उन्हें कोई स्पष्ट सहायता नहीं मिली। उनका कहना है कि कंपनी की ओर से उन्हें केवल दस्तावेज और मेडिकल रिकॉर्ड ईमेल करने के लिए कहा गया और आगे की बातचीत वकीलों के माध्यम से करने की सलाह दी गई। उन्होंने दावा किया कि अब तक उन्हें इलाज या सर्जरी के लिए किसी विशेष अस्पताल में व्यवस्था कराने अथवा आर्थिक सहायता को लेकर कोई ठोस आश्वासन नहीं मिला है। फिलहाल परिवार अपने स्तर पर निजी अस्पताल में उपचार का खर्च उठा रहा है। सुरेशभाई ने कहा कि बेटे को खोने का दर्द कभी कम नहीं हो सकता, जबकि उनकी पत्नी आज भी उस हादसे के शारीरिक और मानसिक घावों से जूझ रही हैं। उनका मानना है कि पीड़ित परिवारों को केवल मुआवजा ही नहीं, बल्कि लंबे समय तक चिकित्सा और पुनर्वास सहायता भी मिलनी चाहिए।
मासूम बेटी और भाई को खोने वाले रोमिल का सवाल
खेड़ा जिले के ठासरा गांव के परवेज वोहरा पिछले चार साल से लंदन में रह रहे थे। हादसे से महज दस दिन पहले ही वे अपनी 5 साल की मासूम बेटी के साथ भारत आए थे। 12 जून को उनके भाई रोमिल वोहरा उन्हें अहमदाबाद एयरपोर्ट छोड़कर लौटे ही थे कि क्रैश की खबर आ गई। अस्पताल में जब डीएनए (DNA) सैंपल मांगा गया, तब रोमिल की बची-खुची उम्मीद भी टूट गई। दिल दहला देने वाली बात यह है कि हादसे के वक्त परवेज की पत्नी लंदन में 9 महीने की गर्भवती थीं। भारत आकर जब उन्हें इस त्रासदी का पता चला, तो वे पूरी तरह टूट गईं। परवेज के अंतिम संस्कार के कुछ दिनों बाद उन्होंने एक बेटे को जन्म दिया। बेटा पिता की निशानी तो है, पर उसके सिर पर पिता का साया कभी नहीं होगा।
भाई रोमिल कहते हैं, "हमें सिर्फ यह जानना है कि इस हादसे का गुनहगार कौन है, ब्लैक बॉक्स की जांच में पारदर्शिता होनी चाहिए।"
पूरा परिवार बिखर गया
दीव के महेंद्र लालजी के परिवार के चार सदस्य-उनकी भाभी और दो बच्चे-उसी बदकिस्मत फ्लाइट में सवार थे। इस हादसे ने उनके हंसते-खेलते परिवार को मानसिक रूप से इस कदर तोड़ दिया है कि उनकी बूढ़ी मां अपनी सुध-बुध खो बैठी हैं। मां 24 घंटे उन्हीं बच्चों को याद करती रहती हैं और कई बार भ्रम की स्थिति में शून्य में देखकर उनसे बातें करने लगती हैं।
महेंद्र कहते हैं, "हम तीन लोग बचे हैं, लेकिन हमारा दिमाग काम नहीं करता। एक पल में हमारा पूरा संसार बिखर गया।"
महेंद्र लालजी
धार्मिक यात्रा अधूरी रह गई
जामनगर के अतुल परमार ने इस हादसे में अपने छोटे भाई शैलेश और भाभी निहल को खो दिया। दोनों हाल ही में लंदन से लौटे थे और बहुत ही आध्यात्मिक और सामाजिक प्रवृत्ति के थे। परिवार ने तय किया था कि दिसंबर 2026 में वे सब मिलकर हरिद्वार में भागवत सप्ताह का भव्य आयोजन करेंगे। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। अतुल परमार कहते हैं, "समय बीतने के बावजूद उनका खालीपन कभी पूरा नहीं हो सकता, दर्द आज भी उतना ही गहरा है। अब आगामी भागवत सप्ताह उन्हीं की पवित्र स्मृति को समर्पित रहेगा।"
अब इंसाफ की आस
यह त्रासदी सिर्फ विमान के क्रैश होने की कहानी नहीं है, बल्कि उन परिवारों की जिंदगी के क्रैश होने की दास्तान है जो आज भी हर रात उस खौफनाक मंजर को जीते हैं। सरकारें और कंपनियां मुआवजे की रकम देकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकतीं। इन सभी पीड़ित परिवारों की आंखों में आंसू के साथ अब केवल एक ही उम्मीद बची है- जांच पूरी हो, ब्लैक बॉक्स का सच सामने आए और दोषियों को सख्त सजा मिले।
