Digvijay Singh Ayodhya Yatra: 20 अक्टूबर, विजयादशमी का दिन और उज्जैन में महाकाल के दर्शन के बाद 79 साल के दिग्विजय सिंह पत्नी अमृता राय के साथ पैदल निकल पड़े। मंजिल अयोध्या का राम मंदिर है। यात्रा का नाम है 'सत्य सनातन स्वाभिमान यात्रा'। एक तरफ आस्था है, दूसरी तरफ सियासत। सवाल यह है कि कांग्रेस इससे क्या साधना चाहती है। इस यात्रा के सियासी मायने निकाले जा रहे हैं। खास बात यह है कि कांग्रेस नेता की यह यात्रा उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से ठीक पहले हो रही है। चढ़ावे में हेर-फेर को लेकर राम मंदिर चर्चा में रहा है और इसके पदाधिकारियों पर कार्रवाई हो रही है। मामले की जांच भी चल रही है। तो क्या दिग्विजय सिंह अपनी इस यात्रा के जरिए विधानसभा चुनाव तक चढ़ावे में हेर-फेर के मामले को हवा देते रहना चाहते हैं।
पदयात्रा पर क्यों निकले दिग्विजिय सिंह?
सिंह का कहना है कि यात्रा का मुख्य मुद्दा राम मंदिर के चंदे और चढ़ावे में कथित गड़बड़ी है। जुलाई में उन्होंने दावा किया था कि मंदिर निर्माण का फंड दो बार इकट्ठा किया गया और रोज के चढ़ावे का 10 से 20 प्रतिशत हिस्सा इधर-उधर हो रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि अपने दिए 1,11,000 रुपये की जवाबदेही के लिए वे अयोध्या की अदालत जाएंगे। इसके अलावा वे उज्जैन और अयोध्या की तीर्थ-भूमि से जुड़ी जमीन संबंधी गड़बड़ियों का मुद्दा भी उठा रहे हैं। यहां एक जरूरी बात है। ये सिंह के आरोप हैं, जांच में साबित तथ्य नहीं। जांच की मांग करना और गबन सिद्ध होना, दोनों अलग बातें हैं।
किन रास्तों से जाएगी यात्रा?
इस यात्रा की कुल दूरी करीब 930 किमी बताई गई है, हालांकि कुछ रिपोर्टों में 950 से 960 किमी का आंकड़ा भी है। रोज करीब 15 किमी चलने की योजना है और पूरी यात्रा में लगभग 70 दिन लगेंगे। दिवाली पर पांच दिन का ठहराव रखा गया है। यात्रा मध्य प्रदेश के कई जिलों से गुजरेगी। इसके बाद ओरछा के रामराजा सरकार मंदिर से होते हुए उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड में प्रवेश करेगी। यूपी में रूट इस तरह बताया गया है:
- चिरगांव, उरई और कालपी
- कानपुर देहात और लखनऊ देहात
- बाराबंकी
- अंत में अयोध्या
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सिंह ने महाकाल (उज्जैन), रामराजा (ओरछा) और राम मंदिर (अयोध्या) को जोड़ने की बात कही है। इस रूट में तीन बड़े धार्मिक केंद्र आते हैं।
इस यात्रा का मकसद क्या है?
सिंह खुद इसे 'गैर-राजनीतिक' यात्रा कहते हैं। उनके मुताबिक इसमें किसी दल का झंडा नहीं होगा और राम में आस्था रखने वाला कोई भी शामिल हो सकता है। उन्होंने मंदिर के चढ़ावे में पारदर्शिता, धार्मिक स्थलों के प्रबंधन और चंदा चोरी की निष्पक्ष जांच की बात कही है। इसके साथ 'वोट चोरी' पर जागरूकता का मुद्दा भी जुड़ा है। तीसरे दिन उन्होंने EVM और मतदाता सूची पर भी सवाल उठाए। सिंह का एक और संदेश है कि आस्था पर किसी राजनीतिक संगठन का एकाधिकार नहीं होना चाहिए। उनका आरोप है कि RSS और VHP सनातन धर्म की व्याख्या को हिंदुत्व की राजनीति में बदल रहे हैं। यानी वे सनातन आस्था और हिंदुत्व की राजनीति के बीच लकीर खींचना चाहते हैं। यात्रा से पहले उन्होंने सोशल मीडिया से दूरी का ऐलान किया था और भाषण न देने की बात कही थी। पर रिपोर्टों के मुताबिक तीसरे दिन वे चुनावी मुद्दों पर बोले भी। यह फर्क आगे देखने लायक है।
कांग्रेस की रणनीति क्या है?
विश्लेषकों के हिसाब से इसके कई स्तर हैं। पहला, हिंदू पहचान की बहस में वापसी। कांग्रेस पर अक्सर आरोप लगता है कि वह हिंदू आस्था के सवाल से कतराती है या बचाव की मुद्रा में रहती है। सिंह की यात्रा पार्टी को उसी मैदान पर खड़ा करती है जहां भाजपा खुद को दावेदार मानती है। इसमें खतरा भी है। भाजपा पहले ही इसे हिंदुओं के अपमान का मुद्दा बनाने की कोशिश कर रही है। मध्य प्रदेश के मंत्री विश्वास सारंग ने सिंह पर हिंदुओं का अपमान और तुष्टिकरण की राजनीति का आरोप लगाया है। दूसरा, संगठन में जान फूंकना। 2023 में मध्य प्रदेश की 230 सीटों में कांग्रेस को 66 और भाजपा को 163 सीटें मिली थीं। यात्रा उन इलाकों से गुजरेगी जहां कांग्रेस का स्वतंत्र संगठन कमजोर रहा है, जिनमें केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया से जुड़े क्षेत्र भी हैं। पैदल यात्रा कार्यकर्ताओं को सड़क पर उतारने का तरीका है।
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तीसरा, उत्तर प्रदेश 2027। बुंदेलखंड से अवध तक का रास्ता यूपी चुनाव से पहले पार्टी की जमीनी मौजूदगी जांचने का मौका भी देता है। चौथा, दो मुद्दों का मेल। चंदा चोरी (आस्था से जुड़ा मुद्दा) और वोट चोरी (लोकतंत्र से जुड़ा मुद्दा) को साथ रखकर कांग्रेस जवाबदेही का एक बड़ा नैरेटिव बनाना चाहती है। हालांकि दोनों पर सबूत अलग-अलग चाहिए। एक की जांच दूसरे का प्रमाण नहीं बन सकती।
आगे की चुनौतियां
ऐसी रिपोर्टें हैं कि राम मंदिर के चंदे के मुद्दे पर कांग्रेस के भीतर भी एक राय नहीं थी। सिंह की बात पार्टी लाइन बनती है या उनकी निजी मुहिम रहती है, यह देखना होगा। इसके अलावा यात्रा से मिली सुर्खियां पार्टी के वोट और संगठन में बदल पाएंगी या नहीं, यह इस पर निर्भर करेगा कि यात्रा के बाद कांग्रेस इन मुद्दों को कितना आगे ले जाती है। 2017 में सिंह नर्मदा परिक्रमा कर चुके हैं। उस यात्रा को उन्होंने आध्यात्मिक बताया था, जबकि 2018 के विधानसभा चुनाव में उसका राजनीतिक असर भी गिना गया।
तो यह यात्रा आस्था है या रणनीति? शायद दोनों। 70 दिन बाद जब सिंह अयोध्या पहुंचेंगे, तब तक पता चलेगा कि लोग उनके सवालों को भ्रष्टाचार के मुद्दे के रूप में लेते हैं या चुनावी स्टंट के रूप में।
