Batwara 1947 Review: सबकुछ है मगर बंटा-बंटा
Sunny Deol,Shabana Azmi,Karan Deol,preity zinta
History
Aug 14, 20262 hr 40 mins
Batwara 1947 Review: आमिर खान के बैनर में बनी लाहौर 1947 इंसानियत की डोर से बंधे अंजान मां-बेटे की वो कहानी है, जिन पर धर्म की राजनीति का ऐसा काला साया है जिसने एक देश को दो हिस्सों में बांट दिया है।
Batwara 1947 Review in Hindi: भारत-पाकिस्तान बंटवारा वक्त की कैद में वो जिन्न है, जो समय-समय पर बाहर आता रहता है और दोनों देशों के बाशिंदों को ये सबक सिखाता रहता है कि इंसान का इंसानियत पर अमादा रहना बेहद जरूरी है क्योंकि जब-जब इंसान ने इंसानियत छोड़ी है तो सभ्यताओं ने तबाही का वो मंजर दे खा है, जिसने खुशहाल जिंदगी को नेस्ते-नाबूत किया है। सनी देओल, प्रीति जिंटा और शबाना आजमी स्टारर फिल्म बंटवारा 1947 भी हमें यही बताने के लिए आई है कि इंसानियत सबसे बड़ा धर्म है। राजकुमार संतोषी के डायरेक्शन में बनी इस मूवी को आमिर खान ने प्रोड्यूस किया है और ये असगर वजाहत साहब के नाटक 'जिस लाहौर नई वेख्या, ओ जम्या ए नई' पर आधारित है। ये कालजयी नाटक लाहौर में रहने वाली एक बूढ़ी हिन्दू औरत की जिंदगी के आसपास गढ़ा गया है, जिसका परिवार बंटवारे में मारा जा चुका है और उसका घर एक मुस्लिम परिवार को दिया जा चुका है। दो धर्म, दो भगवान, दो भरोसे और दो रीति-रिवाज जब एक ही छत के नीचे आएंगे तो क्या इंसानियत को सांस लेने की इजाजत मिलेगी? क्या दो अलग-अलग धर्मों के लोग जिन्होंने अपना सबकुछ धर्म के नाम पर बंटे देशों की वजह से खोया है एक साथ रह पाएंगे और अगर ये लोग एक साथ शांति से रह सकते हैं तो एक देश में अलग-अलग धर्में के लोग क्यों नहीं रह पाते हैं, यही बताने के लिए बंटवारा 1947 आई है। TimesNow NavBharat पर ये Entertainment News भी पढ़ें: Batwara 1947 X Review: एक्स पर नहीं दिख रहा Sunny Deol की मूवी का क्रेज
फिल्म की शुरुआत मेरठ में रहने वाले सिकंदर मिर्जा से होती है, जिसकी आंखें आजाद भारत को देखने के लिए तरस रही हैं लेकिन उसे नहीं पता कि 15 अगस्त की रात उसके परिवार पर कहर बनकर बरसने वाली और उसे अपना सबकुछ छोड़कर लाहौर भागना पड़ेगा। लाहौर पहुंचते-पहुंचते वो अपना बेटा खो चुका है, जमीन-जायदाद गंवा बैठा है और उसके पास अगर कुछ बचा है तो वो है एक बेटी और पत्नी। जैसे-तैसे उसे एक घर मिलता है, जहां वो अपने परिवार को लेकर पहुंचता है लेकिन वहां जाकर उसे पता चलता है कि उसमें एक बुढ़ी हिन्दू औरत रह रही है। ये घर उसी का है और उसे अपने परिवार का इंतजार है जो लाहौर में हुए दंगों में मर चुका है लेकिन उसे इस बात की जानकारी नहीं है।
सिकंदर मिर्जा का परिवार इस हिन्दू औरत से लड़ते-लड़ते, मजहब के उन ठेकेदारों से भिड़ जाता है जो बंटवारे की आग में हाथ सेंक चुके हैं और अब भी खून के प्यासे हैं। इनका मकसद लाहौर के जौहरी मोहल्ले के दुर्गा निवास में रहने वाली बूढ़ी हिन्दू औरत को भगाना है लेकिन इनके नापाक मंसूबों के सामने सिकंदर मिर्जा ईमानदारी और इंसानियत वो चट्टान बनकर खड़ा हो जाता है, जो दरिंदगी का लावा दुर्गा निवास में घुसने नहीं दे रही है। लाहौर के जौहरी मोहल्ले में धर्म और राजनीति के आगे इंसानियत घुटने टेक देगी या फिर सिकंदर मिर्जा अपने ईमान पर टिका रहेगा और बंटवारे में बेसहारा हो चुकी एक अंजान बूढ़ी औरत का बेटा बनकर कर्तव्य के पथ पर चलेगा, ये आपको लाहौर 1947 में देखने को मिलेगा। TimesNow NavBharat पर ये Entertainment News भी पढ़ें: Batwara 1947 Box Office Day 1 Prediction: डबल डिजिट में ओपनिंग लेगी सनी पाजी की फिल्म, इतना होगा कलेक्शन
फिल्म लाहौर 1947 में सनी देओल, प्रीति जिंटा और शबाना आजमी के हिस्से में सबसे ज्यादा सीन्स आए हैं और इन सभी ने दिल जीत लिया है। चीखने चिल्लाने वाले सनी देओल लाहौर 1947 में दिखाई जरूर देते हैं लेकिन सिर्फ वही बनकर नहीं रह जाते हैं। यहां वो एक ऐसे बेटे बनते हैं, जो मां के लिए किसी से भी भिड़ने की ताकत रखता है लेकिन खून-खराबे में उसका भरोसा नहीं है। सनी देओल की डायलॉग डिलीवरी कमाल की है और वो सीन्स में जान डाल देते हैं। प्रीति जिंटा के साथ उनकी केमिस्ट्री देखने वाली है। प्रीति जिंटा ने भी अच्छा काम किया है और सबको बताया है कि अगर उनकी उम्र के हिसाब से रोल लिखे जाएं, तो उनमें अभी बहुत सिनेमा बाकी है।
शबाना आजमी लाहौर 1947 की आत्मा हैं। वो दुर्गा देवी के उन जख्मों को तसल्ली बख्श उकेरती हैं, जो बंटवारे ने एक बूढ़ी मां के दिल-ओ-दिमाग पर दिए हैं। बेटे और बच्चों का इंतजार करती मां, जिसका सबकुछ लुट चुका है लेकिन फिर भी वो किसी का बुरा नहीं चाहती है... इस रोल को जिस ईमानदारी की जरूरत थी शबाना आजमी ने उसी ईमानदारी से इसे निभाया है।
फिल्म की सबसे हल्की कड़ी करण देओल और अभिमन्यु सिंह हैं। इन दोनों की कास्टिंग में डायरेक्टर राजकुमार संतोषी से भारी गलती हुई है, वरना लाहौर 1947 का स्तर कई गुना ऊंचा होता। लाहौर 1947 में जहां करण देओल एक्सप्रेशनलैस कैरेक्टर हैं तो अभिमन्यु सिंह ओवरएक्टिंग के बादशाह हैं, जिन्होंने अपनी टूटी-फूटी पंजाबी से दिल दुखाया है। अभिमन्यु को आखिरी बार इतना खराब कैरेक्टर प्ले करते कब देखा था ये तो याद नहीं लेकिन याकूब पहलवान का किरदार दिमाग में लम्बे वक्त तक रहेगा क्योंकि इसे उन्होंने इतने खराब तरीके से निभाया है।
अब बात करते हैं डायरेक्टर राजकुमार संतोषी की, जो सनी देओल के साथ घायल, घातक और दामिनी जैसी फिल्में बना चुके हैं। इन सभी फिल्मों की खास बात ये थी कि ये कहानियां मानवीय होने के साथ-साथ एंटरटेनिंग भी थीं। लाहौर 1947 भी मानवीय कहानी है लेकिन इससे एंटरटेनमेंट गायब है। ये राजकुमार संतोषी की सबसे कमजोर डायरेक्टिड मूवीज में से एक कहलाएगी, जिसमें सबकुछ बंटा-बंटा सा है। लाहौर 1947 को राजकुमार संतोषी वो रवानगी नहीं दे पाए हैं, जो सनी के साथ बनाई गई उनकी पिछली फिल्मों में नजर आई थी।
आखिर में सवाल ये है कि लाहौर 1947 देखनी चाहिए या फिर नहीं? इस फिल्म की परेशानी ये है कि ये सारी चीजें बोलकर बताती है, ना कि दिखाकर। अगर राजकुमार संतोषी ने स्क्रिप्ट पर इतनी मेहनत की होती कि उन्हें चीख-चीखकर ये कहने की जरूरत ना होती कि मां धर्म से ऊपर है और उसका प्यार हिन्दू-मुस्लिम के चश्मे से नहीं बल्कि दिल से महसूस किया जा सकता है तो ज्यादा बेहतर होगा। लाहौर 1947 कई अच्छे मैसेज देती है लेकिन ये मैसेज एंटरटेनमेंट की उस डोर से नहीं बंधे हैं, जो दर्शकों को सीट से हिलने नहीं देते हैं। हम अपनी ओर से लाहौर 1947 को 2.5 स्टार देते हैं।