बिहार से लेकर तेलंगाना तक, तीन अलग-अलग राजनीतिक परिवार इस चुनाव में ऐसी हार से दो-चार हुए, जिसकी वजह सिर्फ विरोधी ताकत नहीं, बल्कि अपने ही घरों के भीतर पनपी कलह और टूट थी। शुक्रवार को बिहार विधानसभा चुनाव और उपचुनावों के नतीजे आए। जुबली हिल्स, महुआ और गौड़ा बौराम तीनों सीटों पर हुए घटनाक्रम ने एक बात स्पष्ट कर दी है कि जब परिवार और पार्टी के भीतर भरोसा डगमगा जाए, तो मजबूत से मजबूत गढ़ भी ढह जाते हैं। इन परिणामों ने न सिर्फ राजनीतिक समीकरण बदले, बल्कि यह भी दिखाया कि मतदाता अंततः स्थिर नेतृत्व और एकजुटता को प्राथमिकता देता है।
फैमिली फाइट का चुनावी असर
जुबली हिल्स: BRS में दरार और कांग्रेस की सेंधमारी
तेलंगाना की सबसे चर्चित सीट जुबली हिल्स कभी BRS का अजेय किला मानी जाती थी। लेकिन इस उपचुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार नवीन यादव ने लगभग 25 हजार वोटों के अंतर से जीत दर्ज कर पूरे राज्य की राजनीति को झकझोर दिया। BRS से इस हार की सबसे बड़ी वजह पार्टी के भीतर चल रहा विवाद और के. कविता का निलंबन भी रहा, जिससे शायद जनता के बीच गलत संदेश गया।
BRS के शीर्ष नेता के. चंद्रशेखर राव की बेटी के कविता ने चुनाव से ठीक पहले अपने ही भाइयों और पार्टी सहयोगियों पर कालेश्वरम परियोजना में पिता की छवि खराब करने का आरोप लगाकर संगठन के भीतर भारी उथल-पुथल मचा दी थी। स्थिति इतनी बिगड़ गई कि केसीआर को अपनी बेटी को ही निलंबित करना पड़ा। यह फैसला पार्टी अनुशासन बनाए रखने के लिए भले जरूरी रहा हो, लेकिन इसका राजनीतिक नुकसान साफ दिखा। मतदाताओं ने BRS को एक बिखरी हुई इकाई के रूप में देखा और कांग्रेस को मौका दिया।
महुआ: तेज प्रताप की बगावत और बिखरा वोटबैंक
बिहार की महुआ सीट पर तेज प्रताप यादव की हार भी घर की टूट का परिणाम साबित हुई। RJD से अलग होकर तेज प्रताप ने अपनी नई पार्टी बनाई और उसी सीट से चुनाव लड़ने का निर्णय लिया, जहां कभी वह RJD के उम्मीदवार के रूप में जीत हासिल कर चुके थे। लेकिन इस बार वह RJD के समर्थन के बिना मैदान में उतरे और नतीजा यह रहा कि वे पूरी तरह पिछड़ गए।
महुआ में यादव और मुस्लिम मतदाता हमेशा से RJD के पारंपरिक वोटर रहे हैं। तेज प्रताप के पास न तो संगठनात्मक ताकत थी और न ही स्वतंत्र वोटबैंक। उनकी उम्मीद थी कि RJD का कोर वोट बैंक उन्हें सहारा देगा, लेकिन माता-पिता और भाई तेजस्वी यादव से बढ़ती दूरी ने कहानी ही बदल दी। मतदाताओं ने इसे पार्टी में फूट के रूप में देखा, जिसका सीधा असर चुनावी नतीजों पर पड़ा। लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के उम्मीदवार संजय सिंह ने आराम से जीत हासिल की, जबकि तेज प्रताप मुकाबले में कहीं नहीं दिखे। यह हार सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि एक परिवार की गहरी दरार का सार्वजनिक प्रदर्शन बन गई।
गौड़ा बौराम: महागठबंधन की लड़ाई, सहनी परिवार की उलझन और अंत में समझौता
दरभंगा की गौड़ा बौराम सीट पर जो हुआ, वह बिहार की राजनीति में लंबे समय तक चर्चा में रहेगा। पहले यह सीट VIP के हिस्से में थी और पार्टी प्रमुख मुकेश सहनी के भाई संतोष सहनी मैदान में थे। लेकिन इसी बीच RJD के अफजल अली ने भी नामांकन कर दिया, जिससे महागठबंधन के भीतर फ्रेंडली फाइट की स्थिति बन गई। तेजस्वी यादव ने भी संतोष सहनी के लिए प्रचार किया, लेकिन जमीन पर दोनों दलों के कार्यकर्ता उलझे रहे।
परिवार और गठबंधन दोनों स्तरों पर मतभेद बढ़ते जा रहे थे। अंतिम समय में मुकेश सहनी ने बड़ा फैसला लेते हुए अपने भाई को मैदान से हटवा दिया और RJD उम्मीदवार को समर्थन दे दिया। यह त्याग भले गठबंधन धर्म निभाने के लिए किया गया हो, पर सहनी परिवार की आंतरिक दुविधा और असमंजस ने पूरे चुनाव को प्रभावित किया। संतोष सहनी और अफजल अली के बीच चली रस्साकशी ने इलाके में भ्रम की स्थिति रखी और कई वोट बिखर गए। अंततः इस सीट से BJP के सुजीत कुमार को 5600 वोटों से जीत मिली। अगर यहां महागठबंधन के दो उम्मीदवार ना होते, तो शायद शुरुआत से इकट्ठा कैंपेनिंग यह वोटों का अंतर पाट सकता था।
