बिहार के मौजूदा और 22वें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की राजनीति को सोशल इंजीनियरिंग की मिसाल कहा जाता है। उनके शासन को उनकी पार्टी और गठबंधन के साथ ही कई बड़े पत्रकार और जानकार भी सुशासन कहते हैं। नीतीश कुमार साल 2000 में 7 दिन के लिए मुख्यमंत्री बने थे, जबकि उनकी पार्टी और गठबंधन के पास बहुमत भी नहीं था। इसके बाद 2005 में वह पूर्ण रूप से बहुमत के साथ मुख्यमंत्री बने। नीतीश कुमार अब तक कुल 9 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं और इस दौरान उन्होंने चार बार पलटी भी मारी। यानी कभी वह NDA का साथ छोड़कर कांग्रेस व RJD के साथ महागठबंधन बना लेते हैं तो कभी महागठबंधन को छोड़कर वापस NDA का दामन थाम लेते हैं। नीतीश कुमार के राजनीतिक जीवन की शुरुआत में एक समय ऐसा भी आया, जब एक के बाद एक लगातार दो चुनाव हारने के बाद उन्होंने राजनीति से सन्यास लेने का मन बना लिया था। फिर कुछ ऐसा हुआ कि वह तीसरी बार चुनाव लड़ने के लिए तैयार हो गए और चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे। बिहार चुनाव के मद्देनजर हम आपके लिए अपनी खास मुख्यमंत्री सीरीज के तहत राज्य के 22वें मुख्यमंत्री तक पहुंच गए हैं। चलिए जानते हैं नीतीश कुमार का सफरनामा।
बिहार के 22वें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, रिकॉर्ड 9 बार ले चुके हैं शपथ
जब नीतीश कुमार नहीं मुन्ना कहलाते थे
नीतीश कुमार का जन्म 1 मार्च 1951 को पटना के बख्तियारपुर में हुआ था। उनके पिता कविराज राम लखन सिंह आयुर्वेदिक वैद्य थे और मां परमेश्वरी देवी घर-परिवार व खेती की देखभाल करती थीं। नीतीश कुमार का बचपन का नाम मुन्ना था और माता-पिता इसी नाम से उन्हें पुकारते थे। पिता के पास जब इलाज के लिए ज्यादा मरीज आ जाते थे तो मुन्ना उनकी मदद करते थे, आयुर्वेदिक दवाओं की पुड़िया बनाते थे। आयुर्वेदिक डॉक्टर के साथ ही नीतीश के पिता कांग्रेस के एक्टिव सदस्य भी थे, इसलिए वह बचपन से ही राजनीति को अच्छे से समझ रहे थे। जब नीतीश कुमार की उम्र 6 साल हुई तो उन्हें बख्तियारपुर के गणेश हाईस्कूल में पढ़ने के लिए भेजा गया। 10वीं करने के बाद साल 1967 में उन्हें इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए पटना भेज दिया गया। उन्होंने पटना के बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में एडमिशन लिया, जिसे अब NIT पटना कहते हैं। यहां से उन्होंने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की।
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छात्र राजनीति से सिखाई पॉलिटिकल ABCD
नीतीश कुमार और उनके दोस्तों की टोली को कॉलेज में रसमंजरिया पार्टी कहा जाता था। इस पार्टी में अरुण सिन्हा, उदय कांत, नरेंद्र कुमार और कौशल मिश्र थे। उस समय कॉलेज छात्रों को आने-जाने में दिक्कत होती थी, क्योंकि उस रूट पर कोई बस नहीं चलती थी। नीतीश ने सरकार पर दबाव बनाने का प्लान बनाया। इधर कुछ छात्रों ने एक सरकारी बस रोकी और पुलिस को चकमा देकर उसे कॉलेज में ले आए। इस पर कुछ साथियों ने बस को जलाने की कोशिश की तो नीतीश कुमार ने उन्हें रोक दिया। बस फिर क्या था, नीतीश कुमार आंदोलन का केंद्र बन गए। जब आंदोलन और बढ़ा तो तत्कालीन मुख्यमंत्री केदार पांडेय ने छात्रों को मिलने के लिए बुलाया। नीतीश कुमार के नेतृत्व में कुछ स्टूडेंट्स उनसे मिलने गए और उनकी मांग मान ली गई। अब नीतीश कुमार कॉलेज के नेता बन गए थे। वह संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से भी जुड़ गए। 1972 में उन्होंने बिहार अभियंत्रण महाविद्यालय स्टूडेंट्स यूनियन नाम से एक यूनियन भी बनाई, नीतीश इसके पहले निर्विरोध अध्यक्ष भी चुने गए। इधर उनके पिता को नीतीश के राजनीति में सक्रिय होने का पता चला तो उन्होंने अपने मुन्ना को समझाया कि पहले पढ़ाई पूरी कर लो, उसके बाद राजनीति या किसी पेशे के बारे में सोचें।
जब नेवी की नौकरी के लिए पहुंचे नीतीश
नीतीश कुमार अपने कॉलेज के तीसरे साल में थे। घर की आय कम हो रही थी और पिताजी की सेहत भी ढलती जा रही थी। नीतीश कुमार ने पटना आकर पैसे कमाने का फैसला किया। तब कॉलेज में नेवी भर्ती परीक्षा हो रही थी। नीतीश कुमार ने भी परीक्षा दी और फाइनल इंटरव्यू के लिए सिलेक्ट हो गए। रुड़की में फिजिकल टेस्ट और फिर इंटरव्यू हुआ। नेवी अफसरों ने नीतीश कुमार का इंटरव्यू लिया और जब नीतीश कुमार जाने लगे तो इंटरव्यू पैनल के चेयरमैन ने कहा, 'नौजवान, वैसे तो तुम सही दिखते हो, लेकिन हो पक्के नेता! फौज की नौकरी कैसे करोगे?' इस पर जब नीतीश कुमार ने उनसे पूछा कि 'सर, आपने बिना बातचीत किए किस आधार पर मुझे नेता करार दिया?' चेयरमैन ने मुस्कुराते हुए कहा, 'बरखुरदार, तुम्हारी नेतागिरी का राज तुम्हारी आत्मविश्वास से भरी चाल खोल रही है।' खैर नीतीश कुमार का नेवी में सिलेक्शन नहीं हुआ और तय हो गया कि बिहार को सुशासन बाबू मिलेंगे।
जेपी आंदोलन से जुड़े नीतीश कुमार
इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद नीतीश कुमार रांची के बिजली विभाग में ट्रेनी इंजीनियर की नौकरी करने लगे। लेकिन उनका मन तो राजनीति में बस चुका था, इसलिए वह ज्यादा दिन तक नौकरी में नहीं टिक पाए और पटना लौट आए। नीतीश कुमार को जेपी ने संचालन समिति में जगह दी। आंदोलन के दौरान वह RSS प्रचारक के.एन गोविंदाचार्य के साथ रहे और संघ की किताबें पढीं। उन्होंने कार्ल मार्क्स को भी पढ़ा। 1975 में जब देश में आपातकाल लगाया गया तो नीतीश कुमार गांव-गांव छिपकर काम करने लगे। लगभग एक साल बाद 10 जून 1976 को उन्हें भोजपुर जिले के दुबौली गांव से गिरफ्तार किया गया। उन्होंने आरा, बक्सर और भागलपुर की जेलों में 9 महीने बिताए।
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की फाइल फोटो
दो हार और राजनीति छोड़ने का मन
अब नीतीश कुमार राजनीति को अपना सर्वस्व दे चुके थे। मई 1977 में पटना से 90 किमी दूर बेछली गांव में 8 दलितों और 3 सुनार की जलाकर हत्या कर दी गई। जिन 31 लोगों पर केस दर्ज हुआ उनमें से ज्यादातर कुर्मी थे। जून में विधानसभा चुनाव हुए और जनता पार्टी ने नीतीश कुमार को नालंदा की हरनौत सीट से अपना उम्मीदवार बना दिया। नीतीश के साथ रह चुके भोला प्रसाद सिंह ने उनके सामने निर्दलीय पर्चा भर दिया। भोला इस हत्याकांड के लिए कुर्मियों को निर्दलीय बताने लगे, क्योंकि हरनौत में कुर्मियों का दबदबा था। उधर नीतीश ने पीड़ितों का साथ दिया। इस चुनाव में नीतीश को हार का सामना करना पड़ा। 1980 के विधानसभा चुनाव में नीतीश ने एक बार फिर हरनौत से चुनाव लड़ा। उनके खिलाफ बेछली नरसंहार के आरोपी अरुण कुमार सिंह ने निर्दलीय चुनाव लड़ा, जिन्हें भोला और कुर्मी जाति का समर्थन हासिल था। नीतीश लगातार दूसरी बार चुनाव हार गए। हार के बाद वह चिड़चिड़े हो गए, घर में भी कलह रहने लगी। उस समय उनकी पत्नी मंजू गर्भवती थीं और वह अपने मायके चली गईं। जल ही वह सरकारी टीचर भी बन गई। 20 जुलाई 1980 को उनके इकलौते बेटे निशांत का जन्म हुआ। निशांत अपने नाना-नानी की देखरेख में ही पले। इस हार के बाद नीतीश ने राजनीति छोड़कर सिविल कॉन्ट्रैक्टर बनने का फैसला कर लिया।
चंद्रशेखर ने मनाया और मिल गई जीत
नीतीश कुमार ने तो राजनीति छोड़ने का मन बना लिया था। तभी समाजवादी नेता चंद्रशेखर ने उन्हें मदद और संरक्षण का वचन दिया। उन्हीं के कहने पर नीतीश कुमार ने थोड़ा और जोर लगाकर हरनौत से ही तीसरी बार विधानसभा चुनाव लड़ा। यह चुनाव लड़ने से पहले उन्होंने पत्नी मंजू के सामने कसम खाई कि इस बार हार मिली तो राजनीति छोड़कर नौकरी कोई धंधा करेंगे और साथ रहेंगे। इस वादे के साथ मंजू देवी ने अपनी बचत से उन्हें 20 हजार रुपये दिए। चंद्रशेखर और देवीलाल ने भी नीतीश की मदद की और वह तीसरी बार में 22 हजार वोटों से जीत गए। जीतकर जब नीतीश कुमार बख्तियारपुर पहुंचे तो उनका जोरदार स्वागत हुआ, लेकिन वहां पत्नी को न पाकर वह निराश हो गए। नीतीश कुमार ने आधी रात से समय एक साथी को मोटर साइकिल निकालने को कहा और मंजू देवी के पास उनके मायके पहुंच गए। मंजू देवी भी नीतीश को देखकर काफी खुश हुईं। इसके बाद उन्हें पटना में फ्लैट मिला और अब वह परिवार के साथ रहने लगे।
माननीय सांसद बने नीतीश कुमार
जनता पार्टी से टूटकर जनता दल बन चुका था और नीतीश कुमार ने 1989 में जनता दल के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ा। उन्हें उस समय कांग्रेस के कद्दावर यादव नेता रामलखन सिंह यादव के सामने बाढ़ सीट से उतारा गया। नीतीश कुमार से जीत की उम्मीद कम ही लोगों को थी, लेकिन उन्होंने 78 हजार वोटों से जीत दर्ज की। अब नीतीश पटना से दिल्ली आ गए और सालभर बाद वीपी सिंह सरकार में राज्यमंत्री बने, उन्हें कृषि मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली। 1991 के लोकसभा चुनाव में वह बाढ़ सीट से लगातार दूसरी बार चुनाव जीते और यह जीत पहले से भी ज्यादा बड़ी थी। वह पौने दो लाख वोटों से जीते।
सीएम लालू यादव से लड़ाई और अपनी पार्टी
साल 1992 की है, लालू यादव बिहार के मुख्यमंत्री बन चुके थे और नीतीश कुमार ने उन्हें यहां तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई थी। लेकिन दोनों में दूरियां अब बढ़ने लगी थीं। लालू यादव दिल्ली आए और बिहार भवन में रुके हुए थे। इसी दौरान नीतीश कुमार किसानों की कुछ मांगें लेकर शिवानंद तिवारी, ब्रिशन पटेल और ललन सिंह के साथ उनसे मिलने उनके कमरे में पहुंच गए। कुछ ही देर बाद लालू के कमरे में गाली-गलौज और मारपीट होने लगी। लालू यादव जोर-जोर से चिल्ला रहे थे। उन्होंने गार्ड्स बुलाकर नीतीश और अन्य को बाहर करने को कहा। नीतीश कुमार उस समय वहां से चले गए और लालू से दूरियां और बढ़ गईं। फिर 14 अक्टूबर 1994 को नीतीश कुमार ने जॉर्ज फर्नांडिस के साथ मिलकर समता पार्टी बना ली। 1995 के बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार ने बिना लालू के चुनाव लड़ा और जीते भी। समता पार्टी इस चुनाव में सिर्फ 7 सीटें ही जीत पाईं। इसके बाद नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ गठबंधन बनाया। 1999 में भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र की एनडीए सरकार में नीतीश को रेल और कृषि मंत्रालयों की जिम्मेदारी मिली। 2000 के बिहार विधानसभा चुनाव के बाद नीतीश कुमार पहली बार 7 दिन के लिए मुख्यमंत्री बने। लेकिन बहुमत का आंकड़ा नहीं होने पर उन्होंने इस्तीफा दे दिया और फिर नीतीश दिल्ली आकर अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मंत्री बन गए।
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार
जेडीयू का गठन और मुख्यमंत्री पारी
30 अक्टूबर 2003 को समता पार्टी, लोक शक्ति पार्टी और जनता दल से मिलकर जनता दल यूनाइटेड (JDU) का गठन हुआ। शरद यादव JDU के अध्यक्ष बने और पार्टी NDA में शामिल हो गई। 2005 के अक्टूबर में बिहार विधानसभा चुनाव हुए। NDA ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर पेश किया। लेकिन उनकी उम्मीदवारी पर जेडीयू में भी पेंच फंस गया। हालांकि, भाजपा नेता अरुण जेटली के काफी मनाने के बाद जेडीयू नेता मान गए। 22 नवंबर 2005 को चुनाव परिणाम घोषित हुए, जिसमें JDU को 88 और भाजपा को 55 सीटें मिलीं। नीतीश कुमार ने चुनाव नहीं लड़ा और वह बाद में विधान परिषद के सदस्य बने। 24 नवंबर 2005 को नीतीश कुमार ने पटना के गांधी मैदान में शपथ ली। फिर 2010 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू 115 सीटों पर जीती और भाजपा को कुल 91 सीटों पर जीत मिली। एक बार फिर नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने और इस बार भी उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा और विधान परिषद के सदस्य बने।
NDA से अलग हुए नीतीश कुमार
2014 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा ने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को 9 जून 2013 को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया। इससे नाराज होकर नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ 17 साल पुराना गठबंधन तोड़ दिया। उस समय उन्होंने मिट्टी में मिल जाने, लेकिन भाजपा के साथ वापस न जाने की बात कही। बिहार की 40 लोकसभा सीटों में से सिर्फ 2 सीटें ही जेडीयू को मिली। नीतीश कुमार ने हार की जिम्मेदारी लेते हुए मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया और भरोसेमंद जीतनराम मांझी को सीएम पद पर बिठा दिया।
फिर मुख्यमंत्री बने नीतीश कुमार
2015 के विधानसभा चुनाव से पहले नीतीश कुमार ने एक बार फिर कमान अपने हाथ में ली और मुख्यमंत्री बन गए। विधानसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस और RJD के साथ मिलकर महागठबंधन बनाया। इस चुनाव में जेडीयू को 71, RJD को 80 और कांग्रेस को 27 सीटें मिलीं। जबकि भाजपा को सिर्फ 53 सीटें मिलीं। नीतीश कुमार ने चुनाव नहीं लड़ा और वह विधान परिषद सदस्य बने और मुख्यमंत्री वही रहे। महागठबंधन में जल्द ही खटपट होने लगी और 2017 में तेजस्वी यादव पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे तो नीतीश कुमार ने इस्तीफा मांग लिया। जब तेजस्वी का इस्तीफा नहीं हुआ तो नीतीश कुमार ने स्वयं इस्तीफा देकर सरकार गिरा दी और एक बार फिर भाजपा के साथ NDA में शामिल होकर मुख्यमंत्री बन गए। 2020 बिहार विधानसभा चुनाव में NDA के साथ चुनाव लड़ा और JDU को 43 सीटों पर जीत मिली, जबकि भाजपा को 74 सीटें मिलीं। RJD 75 सीट जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी। कांग्रेस ने भी 17 सीटें जीतीं। नीतीश कुमार ने फिर मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। 9 अगस्त 2022 को नीतीश ने एक बार फिर NDA का साथ छोड़ दिया और मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर महागठबंधन में शामिल हो गए और मुख्यमंत्री पद की फिर से शपथ ली।
INDIA बनाकर NDA में लौटे नीतीश कुमार
2024 के आम चुनाव से पहले विपक्ष पार्टियों के गठबंधन का नेतृत्व करने के लिए नीतीश कुमार का नाम लिया जा रहा था। विपक्ष गठबंधन INDIA बनाने में उनकी अहम भूमिका रही। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले उन्होंने महागठबंधन का साथ छोड़ दिया और फिर से NDA में भाजपा के साथ चले गए। एक बार फिर उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। NDA ने बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में भी नीतीश को ही मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया है। अब देखना होगा कि 14 नवंबर को क्या परिणाम आता है। अगर जीते तो नीतीश कुमार रिकॉर्ड 10वीं बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे।
