मुख्यमंत्री : बाढ़ के कारण गई बिहार के 17वें मुख्यमंत्री बिंदेश्वरी दुबे की कुर्सी, वाजपेयी ने कसा था जोरदार तंज

बिहार विधानसभा चुनाव का प्रचार जोरों पर है और इस बीच हमारी मुख्यमंत्री सीरीज में आज हम कहानी लेकर आए हैं, राज्य के 17वें मुख्यमंत्री बिंदेश्वरी दुबे के बारे में। एक मजदूर नेता से मुख्यमंत्री के पद तक उनकी यात्रा बहुत ही बड़ी है। फिर उनकी कुर्सी जाने का किस्सा भी रोचक है। चलिए जानते हैं -

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के तहत प्रचार जोरों पर है और इसी के साथ हमारी स्पेशल 'मुख्यमंत्री' सीरीज भी आगे बढ़ रही है। इस सीरीज के तहत हम आपको बिहार के अब तक के सभी मुख्यमंत्रियों के बारे में विस्तार से बता रहे हैं। आज इस कड़ी में बिहार के 17वें मुख्यमंत्री बिंदेश्वरी दुबे की बारी है। ये वहीं बिंदेश्वरी हैं, जो तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की पसंद से मुख्यमंत्री बने थे। उनसे जुड़ा एक अहम किस्सा ये भी है कि उन्हें हराने के लिए बिहार के डॉक्टरों में प्रचार की कमान अपने हाथों में थाम ली थी। बात 1977 के विधानसभा चुनाव की है। देश आपातकाल के दौर से अभी बाहर निकला ही था। केंद्र में जनता पार्टी की सरकार बन चुकी थी और अब बिहार में विधानसभा चुनाव हो रहे थे। बिंदेश्वरी दुबे सातवीं बार बिहार की बेरमो सीट से उम्मीदवार थे। इमरजेंसी के दौरान संजय गांधी को खुश करने के लिए बिंदेश्वरी दुबे ने जिस तरह से डॉक्टरों को सताया था, उसका बदला डॉक्टरों ने इस चुनाव में लिया। उन्होंने बिंदेश्वरी दुबे को हराने की ठान ली और उनके खिलाफ प्रचार में कूद गए। डॉक्टरों का बिंदेश्वरी दुबे के खिलाफ प्रचार जनता पार्टी के मिथिलेश कुमार के काम आया। जब चुनाव के नतीजे आए तो बिंदेश्वरी दुबे को लगभग 12 हजार वोटों से हार का सामना करना पड़ा। चलिए जानते हैं बिंदेश्वरी दुबे और उनके सफर के बारे में विस्तार से -

17th CM of Bihar Bindeshwari Dubey.

बिहार के 17वें मुख्यमंत्री बिंदेश्वरी दुबे मजदूर नेता से सीएम की कुर्सी तक पहुंचे थे

बिंदेश्वरी दुबे का शुरुआती जीवन

14 जनवरी 1921 को भोजपुर जिले के महुआंव गांव में बिंदेश्वरी दुबे का जन्म हुआ था। उनका जन्म ब्राह्मण परिवार में हुआ था जो गांव के दुबे टोले में रहता था। लेकिन उनकी इस कहानी में एक ट्विस्ट ये है कि परिवार में दो जुड़वां बच्चों का जन्म हुआ था, जिनमें से एक बच्चा मरा हुआ पैदा हुआ और दूसरे की जान को भी खतरा था। पिता शिव नरेश और मां जानकी देवी ने बिंध्येश्वरी देवी से अपने बच्चे के लिए मन्नत मांगी। मां के आशीर्वाद से बचे बच्चे का नाम माता-पिता ने बिंदेश्वरी प्रसाद दुबे रख दिया। बिंदेश्वरी की शुरुआती पढ़ाई उनके गांव के स्कूल में हुई। पिता चाहते थे कि बिंदेश्वरी खेती-किसानी करे, लेकिन बिंदेश्वरी पढ़ना चाहते थे। एक दिन वह घर छोड़कर मामा के घर कटेया चले गए और मामा ने उनका एडमिशन पटना के माइकल हाई स्कूल में करवा दिया। अपना खर्च चलाने के लिए बिंदेश्वरी बच्चों को ट्यूशन बढ़ाते थे। 1936 में 10वीं बात करने के बाद वह साइंस कॉलेज चले गए। ट्यूशन के अलावा वह कारखाने में नाइट शिफ्ट भी करते थे। इसी दौरान उनकी शादी भी हो गई। पत्नी शिव शक्ति देवी से उन्हें चार बेटियां हुईं। 1938 में उनका सिलेक्शन पटना के बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में हो गया, जो आज NIT बिहार कहलाता है। बिंदेश्वरी जब फाइनल ईयर में थे तो पढ़ाई छोड़कर महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन से जुड़ गए। पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और उन्हें 2 साल जेल में काटने पड़े। रिहा होने के बाद वह बेरमो आ गए और कोयला खदानों में मैकेनिक का काम करने लगे। यहां मजदूरों पर अत्याचार होते देख वह बर्दाश्त नहीं कर पाए और नौकरी छोड़कर मजदूर नेता बन गए। फिर वह कोलियरी मजदूर संघ के वाइस-प्रेसिडेंट बन गए।

End of Feed