'जाति' ये दो अक्षरों से बना शब्द एक प्रदत्त स्थिति भले हो, भले यह पैदाइश के वक्त से ही साथ नत्थी हो जाता हो, भले इसपर किसी का बस ना हो, भले समाजशास्त्र की किताबों के तमाम पन्ने इन्हीं दो अक्षरों से रंगे दिखते हों लेकिन ये महज ऐसी कोई पढ़ने की चीज नहीं है कि जिससे किसी हिंदुस्तानी का पाला न पड़ा हो। किताबों में जगह पाने की सबसे खास वजह ही इसकी सामाजिक महत्ता है। समाजशास्त्र की किताबों से कहीं पहले यह समाज का हिस्सा है और इससे कुछ उबरे तो ये राजनीति के हिस्से में चला जाता है।
फैसला जिससे मैट्रिक पास होने वालों की संख्या हो गई दोगुनी (तस्वीर साभार: PTI/@yadavakhilesh)
बिहार और जाति
इसी राजनीति के नजरिये से देखें तो आपको एक ऐसा राज्य मिलेगा, जहां जाने कबसे अगड़ा बनाम पिछड़ा, भूमिहार बनाम राजपूत जैसे कई जातिगत रंजिशों के उदाहरण मिलेंगे। ऐसे ही बिहार के समस्तीपुर जिले का एक छोटा सा गांव था पितौंझिया। 100 राजपूतों के घर और 50 अन्य जातियों के घरों के बीच कहीं एक घर नाई जाति का भी था। पितौंझिया गांव, 24 जनवरी 1924 की तारीख, उस नाई घर में जन्म हुआ कर्पूरी ठाकुर का। गोकुल ठाकुर जैसे साधारण नाई का वह बेटा, जो इसी बिहार में अपनी पृष्ठभूमि को ढोते हुए मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गए। समाज के जिस वर्ग से कर्पूरी आते थे उस वर्ग के व्यक्ति के लिए वह पायदान उस देशकाल परिस्थिति में लगभग असंभव बना देता था।
अपनी सादगी के लिए जाने जाते थे 'जननायक' (चित्र साभार: PTI)
साधु की भविष्यवाणी
पत्रकार संतोष सिंह और आदित्य अनमोल अपनी किताब 'जननायक कर्पूरी ठाकुर: बेजुबानों की आवाज' में लिखते हैं कि जब कर्पूरी बहुत छोटे थे तो गोकुल ठाकुर के घर एक साधु आया और कर्पूरी का माथा निहार कर यह भविष्यवाणी कर दी कि एक दिन यह लड़का प्रसिद्ध व्यक्ति बनेगा। हालांकि, गोकुल ठाकुर ने इस बात को रत्ती भर भी भाव नहीं दिया। उन्हें ये लगा कि मान सम्मान पाकर साधु यूं ही कुछ कह रहा है। साधु की बात को नजर अंदाज करते हुए गोकुल, अपने उस्तरे पर सान चढ़ाकर हजामत बनाने निकल पड़े।
पत्रकार संतोष सिंह और आदित्य अनमोल की किताब
अंग्रेजी बनाम शिक्षा
संतोष सिंह लिखते हैं कि बचपन में कर्पूरी ने अपने पिता से पढ़ने-लिखने के इरादे से कभी तख्ती मांगी थी। बेमन से गोकुल ठाकुर ने तख्ती और खल्ली (खड़िया) खरीद तो दी लेकिन इस हिदायत के साथ कि स्कूल जाने की जिद नहीं करनी है। वो साल दूसरा था जब कर्पूरी के हाथ पहली बार लेखनी लगी लेकिन 60 का दशक आने के बाद भी बिहार में शिक्षा व्यवस्था कुछ खास नहीं बदल पाई थी। शिक्षा का अधिकांश हिस्सा केवल सवर्ण जाति के बच्चों तक ही महदूद रह गया था। आजादी के दो दशक बीत जाने के बाद सरकार की कवायद थी कि शिक्षा हर वर्ग तक पहुंचे लेकिन पिछड़े वर्ग अब भी उच्च शिक्षा से पीछे ही रहे। इसके कई कारण थे, और कर्पूरी को जो इसमें सबसे बड़ा कारण नजर आया, वो थी अंग्रेजी। कर्पूरी को इसका अच्छी तरह पता था कि केवल अंग्रेजी ही शिक्षा का पैमाना नहीं है। इस मामले में वो लोहिया सा विचार रखते थे, जो जर्मनी, जापान, चीन जैसे देशों का उदाहरण देकर कहते थे कि इन्होंने अंग्रेजी की जगह अपनी भाषा को तरजीह दी और वे बेहतर कर रहे हैं।
पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के साथ कर्पूरी (चित्र साभार: PTI)
फैसला जो आज भी कायम है
साल 1967, उस समय बिहार के शिक्षा मंत्री कर्पूरी ठाकुर थे। ये वो समय था जब कोई दसवीं का इम्तिहान भी पास कर लेता तो एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती। कर्पूरी ठाकुर की राय पर सरकार ने दसवीं की बोर्ड परीक्षा से अंग्रेजी की अनिवार्यता को खत्म कर दिया। यह बहुत बड़ा कदम था। इस फैसले को शिक्षा का लोकतंत्रीकरण माना गया। अंग्रेजी हट जाने से उन निम्न तबके के लोगों ने भी कॉलेज का रुख किया, जो केवल इस भाषाई बोझ के तले दबे हुए थे। केवल निम्न वर्ग ही नहीं, इस फैसले का फायदा हर उस तबके को मिला जो केवल अंग्रेजी के कारण मार खा जाता था। 1967 से 1968 आते-आते बिहार स्कूल परीक्षा बोर्ड में पास होने वाले छात्रों की संख्या में लगभग दोगुनी बढ़ोतरी हो गई। इससे शिक्षा का दायरा भले बढ़ गया हो लेकिन इस फैसले की आलोचना भी खूब हुई। अंग्रेजी में फेल होकर मैट्रिक परीक्षा पास करने वाले लोगों का 'कर्पूरी डिवीजन' से पास कहकर मजाक उड़ाया जाता। गरीब गुरबों को इस स्तर पर खड़ा कर देना कोई आसान बात नहीं थी। सारी आलोचनाओं के बाद भी बिहार जैसे पिछड़े राज्य के लिए यह व्यवस्था काफी कारगर साबित हुई और आज भी बिहार बोर्ड के दसवीं की परीक्षा में अंग्रेजी का पर्चा पास करना अनिवार्य नहीं है। इस व्यवस्था को ना बदलने के कई कारण हो सकते हैं लेकिन 1967 से 1968 तक करीब छह महीने के अपने कार्यकाल के दौरान लिए गए इस फैसले के लिए कर्पूरी आज भी याद किए जाते हैं। साधु की भविष्यवाणी सच हो चुकी है।
