एक साधु की भविष्यवाणी और शिक्षा का लोकतंत्रीकरण; क्या था कर्पूरी ठाकुर का वो फैसला जो आज भी है कायम

बिहार और राजनीति की जब भी बात होती है साथ में खुद ब खुद जाति का एंगल आ ही जाता है। सवर्णों और दलितों के वैमनस्य की आंच हमेशा दलितों को ही ज्यादा तपाती रही। ऐसे में समाज के निचले तबके से ही बिहार में एक ऐसा कद्दावर नेता हुआ जो जननायक कहलाया। हम बात कर रहे हैं कर्पूरी ठाकुर की, जो बिहार के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने। आइए जानते हैं उनसे जुड़ा एक किस्सा जिसमें जातिवादी समाज है, एक साधु है और एक फैसला है, जिसने राज्य के शिक्षा व्यवस्था की दशा बदल दी।

'जाति' ये दो अक्षरों से बना शब्द एक प्रदत्त स्थिति भले हो, भले यह पैदाइश के वक्त से ही साथ नत्थी हो जाता हो, भले इसपर किसी का बस ना हो, भले समाजशास्त्र की किताबों के तमाम पन्ने इन्हीं दो अक्षरों से रंगे दिखते हों लेकिन ये महज ऐसी कोई पढ़ने की चीज नहीं है कि जिससे किसी हिंदुस्तानी का पाला न पड़ा हो। किताबों में जगह पाने की सबसे खास वजह ही इसकी सामाजिक महत्ता है। समाजशास्त्र की किताबों से कहीं पहले यह समाज का हिस्सा है और इससे कुछ उबरे तो ये राजनीति के हिस्से में चला जाता है।

karpoori thakur

फैसला जिससे मैट्रिक पास होने वालों की संख्या हो गई दोगुनी (तस्वीर साभार: PTI/@yadavakhilesh)

बिहार और जाति

इसी राजनीति के नजरिये से देखें तो आपको एक ऐसा राज्य मिलेगा, जहां जाने कबसे अगड़ा बनाम पिछड़ा, भूमिहार बनाम राजपूत जैसे कई जातिगत रंजिशों के उदाहरण मिलेंगे। ऐसे ही बिहार के समस्तीपुर जिले का एक छोटा सा गांव था पितौंझिया। 100 राजपूतों के घर और 50 अन्य जातियों के घरों के बीच कहीं एक घर नाई जाति का भी था। पितौंझिया गांव, 24 जनवरी 1924 की तारीख, उस नाई घर में जन्म हुआ कर्पूरी ठाकुर का। गोकुल ठाकुर जैसे साधारण नाई का वह बेटा, जो इसी बिहार में अपनी पृष्ठभूमि को ढोते हुए मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गए। समाज के जिस वर्ग से कर्पूरी आते थे उस वर्ग के व्यक्ति के लिए वह पायदान उस देशकाल परिस्थिति में लगभग असंभव बना देता था।

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