अगर आप या आपके घर में कोई बच्चा CBSE बोर्ड में पढ़ता है, खासकर क्लास 8th या 9th में, तो ये खबर आपके लिए बेहद महत्वपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट में इस समय एक ऐसा मामला चल रहा है, जो आने वाले वर्षों में लाखों छात्रों की पढ़ाई का तरीका बदल सकता है। यह मामला है CBSE की नई तीन-भाषा नीति का, जिसे थ्री लैंग्वेज पॉलिसी कहा जा रहा है। CBSE की नई तीन-भाषा नीति को लेकर सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को सुनवाई हुई। इस बीच नई पॉलिसी को जिस तरह से लागू किया गया उस पर सवाल उठाए गए, इस पॉलिसी को लागू करने में आने वाली चुनौतियों पर चर्चा हुई और इंग्लिश विषय को लेकर भी दलील दी गई।
एक तरफ सरकार और CBSE का कहना है कि यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति यानी New Education Policy 2020 का हिस्सा है और इसका मकसद भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देना है। लेकिन दूसरी तरफ कई छात्र, पैरेंट्स और शिक्षा जगत से जुड़े लोग इस पर लगातार सवाल उठा रहे हैं। कहा जा रहा है कि सीबीएसई ने इस पॉलिसी को जिस तरह अचानक लागू किया, उससे स्कूलों, छात्रों और शिक्षकों पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है। इस पॉलिसी का विरोध करने वालों का कहना है कि देशभर के सभी स्कूलों की स्थिति एक जैसी नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
अमनदीप कौर और अर्पण रॉय चौधरी की ओर से सुप्रीम कोर्ट में इस पॉलिसी के खिलाफ याचिकाएं डाली गई हैं। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद ग्रोवर, गोपाल शंकरनारायणन और मुकुल रोहतगी ने इस पॉलिसी को लेकर कई गंभीर सवाल उठाए। अदालत में दलील दी गई कि इस नीति का उद्देश्य चाहे कितना भी अच्छा हो, लेकिन इसे लागू करने की तैयारी पूरी नहीं है। अदालत को यह भी बताया गया कि कई राज्यों में अभी तक नई भाषाओं की किताबें उपलब्ध नहीं हैं। वहीं, जिन भाषाओं को पढ़ाने की बात कही जा रही है, उनके शिक्षक भी बड़ी संख्या में मौजूद नहीं हैं। कई स्कूलों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर नई भाषा पढ़ानी है तो शिक्षक कहां से आएंगे?
सीबीएसई 3 भाषा नीति पर सुनवाई
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने तमाम दलीलें सुनने के बाद केंद्र सरकार, CBSE और NCERT को नोटिस जारी करते हुए 10 दिनों के भीतर जवाब मांगा है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 29 जुलाई को होगी। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस नीति पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है।
क्या है सीबीएसई थ्री लैंग्वेज पॉलिसी
CBSE ने 1 जुलाई 2026 से नई भाषा नीति लागू की है, जिसके तहत 9th क्लास में तीन भाषाएं पढ़ना अनिवार्य किया है। इन तीन भाषाओं को R1, R2 और R3 का नाम दिया गया है। सबसे महत्वपूर्ण शर्त ये है कि इन तीन भाषाओं में कम से कम दो भारतीय भाषाएं होना जरूरी है। यह भारतीय भाषाएं संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल 22 भाषाओं में से कोई दो हो सकती हैं। सीबीएसई ने 29 जून को एक सर्कुलर जारी किया है जिसमें इस लैंग्वेज पॉलिसी को विस्तार से बताया गया है। Check CBSE 3 Language Policy Circular PDF
ये 22 भाषाएं कौन सी हैं?
- असमिया
- बंगाली
- बोडो
- डोगरी
- गुजराती
- हिंदी
- कन्नड़
- कश्मीरी
- कोंकणी
- मैथिली
- मलयालम
- मणिपुरी
- मराठी
- नेपाली
- उड़िया
- पंजाबी
- संस्कृत
- संथाली
- सिंधी
- तमिल
- तेलुगू
- उर्दू
22 भाषाओं में अंग्रेजी नहीं
सीबीएसई से संबद्ध महाराजा अग्रसेन पब्लिक स्कूल, बुलंदशहर (उत्तर प्रदेश) के प्रधानाचार्य नरेंद्र मित्तल का कहना है कि इन 22 भाषाओं में अंग्रेजी शामिल नहीं है। ऐसे में अंग्रेजी पढ़ने वाले छात्रों के सामने क्या विकल्प हैं? अगर कोई छात्र पहले से भारतीय भाषा के रूप में हिंदी और तमिल पढ़ रहा है, तो तीसरी भाषा के रूप में उसे अंग्रेजी भाषा चुननी होगी। इसी तरह कोई छात्र पहले से तमिल और अंग्रेजी पढ़ रहा है, तो तीसरी भाषा भारतीय भाषा चुननी होगी। और अगर कोई छात्र इंग्लिश के साथ फ्रेंच, जर्मन, स्पेनिश या जापानी जैसी विदेशी भाषा पढ़ना चाहता है, तो उसे अतिरिक्त चौथी भाषा के रूप में ही चुना जा सकता है।
सीबीएसई की तीन भाषा नीति
छात्रों के लिए क्या वैध है और क्या नहीं?
- केस 1 (पास): हिंदी + संस्कृत (दो भारतीय भाषाएं) + अंग्रेजी (तीसरी भाषा) = वैध (Valid)
- केस 2 (पास): तमिल + मराठी (दो भारतीय भाषाएं) + अंग्रेजी (तीसरी भाषा) = वैध (Valid)
- केस 3 (फेल/अवैध): अंग्रेजी + फ्रेंच + हिंदी = अवैध (Invalid) (क्योंकि इसमें केवल एक ही भारतीय भाषा है, जबकि नियम के मुताबिक दो होनी अनिवार्य हैं)
9वीं और 10वीं के लिए क्या है नियम
हालांकि, सीबीएसई ने थ्री लैंग्वेज पॉलिसी को लेकर दसवीं कक्षा के छात्रों को राहत दी है। बोर्ड का कहना है कि सत्र 2027-28 से 10वीं में पढ़ने वाले छात्रों के लिए तीसरी भाषा का बोर्ड एग्जाम नहीं होगा, लेकिन छात्रों को स्कूल लेवल पर होने वाले असेसमेंट में पास होना अनिवार्य होगा। यदि छात्र इस असेसमेंट में पास नहीं होते हैं, तो उन्हें कक्षा 10वीं का पास सर्टिफिकेट जारी नहीं किया जाएगा। कक्षा 10वीं में पास सर्टिफिकेट हासिल करने के लिए उन्हें दोबारा असेसमेंट देना होगा और उसे क्लियर करना होगा। इसी तरह अगर छात्र क्लास 9th में तीसरी भाषा के असेसमेंट में फेल होगा, तो उसे 10वीं क्लास में प्रमोट तो कर दिया जाएगा, लेकिन 10वीं की पढ़ाई के साथ उसे 9वीं का असेसमेंट क्लियर करना होगा।
क्या है CBSE का तर्क
CBSE का कहना है कि यह पूरी तरह राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप है। बोर्ड का दावा है कि 28,848 स्कूलों में से 47.3 फीसदी स्कूल पहले से ही कक्षा 9 में दो या उससे अधिक भारतीय भाषाएं पढ़ा रहे हैं। अधिकांश स्कूलों में कम से कम एक भारतीय भाषा के टीचर पहले से मौजूद हैं। इसलिए बोर्ड का मानना है कि यह बदलाव पूरी तरह संभव है। साथ ही बोर्ड का कहना है कि विदेशी भाषाओं को हटाया नहीं गया है, बल्कि भारतीय भाषाओं को प्राथमिकता दी गई है। हालांकि भारत के मेट्रो शहरों के बाहर (Tier-2 और Tier-3 शहरों में) 8वीं और 9वीं अनुसूची की 22 भाषाओं (जैसे बोडो, संथाली, या डोगरी) को पढ़ाने वाले योग्य शिक्षक और NCERT किताबें रातों-रात उपलब्ध कराना स्कूलों के लिए सबसे बड़ी व्यावहारिक (Logistical) चुनौती है।
सीबीएसई थ्री लैंग्वेज पॉलिसी
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
कोर्ट ने नीति पर रोक लगाने से इसीलिए इनकार किया क्योंकि वे देखना चाहते हैं कि केंद्र सरकार और NCERT के पास इन 10 दिनों में इस बुनियादी ढांचे (Infrastructure) को लेकर क्या ठोस योजना है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के तहत इस नियम से जुड़े किसी भी बड़े अपडेट के लिए 29 जुलाई को होने वाली सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर नज़र रखें। छात्र और स्कूल प्रशासन आधिकारिक दिशा-निर्देशों के लिए cbse.gov.in पर जारी होने वाले सर्कुलर को ही अंतिम आधार मानें।
