SSC Success Story: कर्मचारी चयन आयोग (SSC) की परीक्षा पास करके अधिकारी बनने का सपना देखते हुए लाखों युवा परीक्षा देते हैं, लेकिन इसमें कुछ कहानियां ऐसी होती हैं जो सिर्फ सफलता की नहीं, बल्कि आत्मसम्मान की मिसाल बन जाती है। आज हम उत्तर प्रदेश के संभल जिले के रहने वाले एक ऐसे ही व्यक्ति के बारे में बात करने वाले हैं, जिसकी जीवन यात्रा एसएससी की तैयारी कर रहे लाखों छात्रों के लिए एक मिसाल बन गई है। हम बात कर रहे हैं, ईंट के भट्टे पर जन्म लेने वाले और बचपन से ही मजदूरी करने वाले सतीश की, जिसने अपनी गरीबी, अभावों और विपरीत परिस्थितियों को कभी अपने सपनों के आड़े नहीं आने दिया और उनकी मेहनत ने तब साकार हुई, जब एसएससी सीजीएल का रिजल्ट आया। परिणाम की घोषणा के दिन रिजल्ट चेक करने के बाद सतीश अपनी मां के गले लगकर फूट-फूटकर रोए। वे आंसू वर्षों के दर्द, अपमान और कठोर परिश्रम के बाद मिली उस कामयाबी के थे, जिसने उनके पूरे परिवार की तकदीर बदलकर रख दी।
SSC Success Story (Photo - AI)
ईंट के भट्टे पर बीता बचपन और तंगहाली का दौर
सतीश का परिवार बेहद गरीब था और प्रवासी मजदूर के रूप में काम करता था। उनका जन्म भी किसी अस्पताल या घर में नहीं, बल्कि ईंट के भट्टे पर हुआ था। नौ भाई-बहनों वाले इस बड़े परिवार में न तो शिक्षा का माहौल था और न ही बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं की कोई जानकारी थी। बचपन में जहां बच्चों के हाथों में किताबें होनी चाहिए थीं, वहां सतीश के हाथों में मिट्टी और ईंटें हुआ करती थी। वह माता-पिता के साथ परिवार की स्थिति सुधारन के लिए मजदूरी किया करते थे। इस परिवार में गरीबी का आलम यह था कि एक समय के खाने और एक जोड़ी कपड़ों के लिए भी भारी संघर्ष करना पड़ता था।
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मजदूरी, लाइट उठाने का काम और वह एक थप्पड़
सतीश जिस परिवेश में पले-बढ़े, वहां बच्चों को होशियार होते ही काम पर लगा दिया जाता था। सतीश ने भी कम उम्र में ही ईंट ढोने का काम शुरू कर दिया था। घर का खर्च चलाने के लिए वे दिन में ईंट के भट्टे पर मजदूरी करते थे और रातों को शादियों में भारी लाइटें उठाने का काम किया करते थे। एक रात शादी के कार्यक्रम में लाइट उठाते समय गलती से तार उनके हाथ से छूट गई और इतनी सी बात वहां मौजूद एक व्यक्ति ने सबके सामने उनके गाल पर एक जोरदार थप्पड़ जड़ दिया। यह थप्पड़ सिर्फ एक शारीरिक चोट नहीं था, बल्कि सतीश के स्वाभिमान पर भी एक करारा प्रहार था। बस फिर क्या, उसी दिन सतीश ने ठान लिया कि उन्हें इस जिल्लत भरी जिंदगी से हर हाल में बाहर निकलना है।
दिन में बेलदारी और रातों को पढ़ाई का संघर्ष
सतीश के लिए समारोह में हुई अपमानजनक स्थिति से बाहर निकलने का एकमात्र रास्ता शिक्षा ही था। सतीश ने दिन में अपने पिता के साथ बेलदारी का काम जारी रखा और शाम को थककर चूर होने के बावजूद साइकिल चलाकर ट्यूशन पढ़ने जाने का फैसला लिया। दिनभर की कड़ी मजदूरी के बाद शरीर आराम मांगता था और दर्द से टूटता था, लेकिन अपने आप से किए वादे के आगे यह दर्द कुछ नहीं था। आत्मसम्मान की तड़प उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित कर रही थी और इस प्रकार वह थकावट के बावजूद रोज रात को देर तक पढ़ाई करते थे।
पिता का निधन के बाद डिप्रेशन से जंग
सतीश के जीवन में अभी संघर्ष के दिन खत्म भी नहीं हुए थे कि साल 2018-19 के दौरान उनके पिता को कैंसर जैसी गंभीर बीमारी हो गई। सतीश दिन में मजदूरी करते, स्कूल की पढ़ाई संभालते और घर आकर बीमार पिता की सेवा करते थे। 10 मार्च 2019 को उनके पिता का निधन हो गया। उस कठिन समय में स्थिति इतनी भयावह थी कि घर में अंतिम संस्कार के लिए एक रुपया भी नहीं था। पिता के जाने के बाद परिवार पूरी तरह टूट गया और सतीश भी डिप्रेशन में चले गए।
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SSC CGL क्रैक कर बने असिस्टेंट अकाउंटेंट ऑफिसर
तमाम दुखों और असफलताओं के बावजूद सतीश ने खुद को संभाला और परिवार को अच्छी जिंदगी देन के लिए एक बार फिर सरकारी नौकरी की तैयारी शुरू की। इस बीच गणित विषय में परेशानी आई, लोगों ने ताने भी मारे कि मजदूरी करने वाला अफसर नहीं बन सकता, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। जब भी वे निराश होते, 'रुक जाना नहीं' गाना सुनकर खुद को रिचार्ज करते थे।
आखिरकार उनकी सालों की तपस्या रंग लाई। SSC CGL 2021 की परीक्षा में सफलता हासिल कर सतीश असिस्टेंट अकाउंटेंट ऑफिसर (AAO) के पद पर सिलेक्ट हो गए। जब रिजल्ट आया, तो वर्षों का संघर्ष और दर्द खुशी के आंसुओं में बदल गया। सतीश की यह कहानी साबित करती है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो गरीबी और विपरीत परिस्थितियां कभी आपकी सफलता का रास्ता नहीं रोक सकती और आपको आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती।
